दुनिया में हर सातवां शख़्स भूखा सोने को मजबूर

    • Author, वर्तिका तोमर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

विश्व खाद्य संगठन का कहना है कि दुनिया भर में हर दिन 20 हज़ार बच्चों के पेट में रोटी का निवाला नहीं जाता और भूख उन्हें निगल जाती है.

संगठन की रिर्पोट के अनुसार हर साल 1 अरब 30 करोड़ टन खाद्य पदार्थ की बर्बादी होती है और हर सातवां व्यक्ति भूखा सोता है. अगर इस बर्बादी को रोका जा सके तो कितनों कर पेट भरा जा सकता है, इसका अंदाज़ा इन आंकड़ों से आसानी से लगाया जा सकता है.

पांच जून को मनाए जाने वाले विश्व पर्यावरण दिवस का इस साल का संदेश भी यही कहता है कि 'सोच समझ कर खाऐं और अनाज बचाएं'.

करोड़ों टन खाद्यान्न की बरबादी

ग्लोबल हंगर इंडेक्स यानि विश्व भूख सूचकांक में भारत का 67वां स्थान है. मुल्क में हर साल 251 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है लेकिन है.

इंडियन इंस्टिच्यूट आफ पब्लिक एडमनिस्ट्रशन के प्रोफेसर सुरेश मिश्रा की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के कारण खराब हो जातीं हैं.

भारत में हर साल 50 हजार करोड़ रूपए का खाद्य पदार्थ बर्बाद होता है.
इमेज कैप्शन, भारत में हर साल 50 हजार करोड़ रूपए का खाद्य पदार्थ बर्बाद होता है.

लेकिन केवल वितरण प्रणाली ही भूख की गुनहगार नहीं है. उत्पादन, प्रसंस्करण से लेकर खाद्य पदार्थों के सेवन तक कई स्तरों पर मौजूद कमियां भी इसके लिए उतनी ही ज़िम्मेदार हैं.

कुछ समय पहले ही कृषि और खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री तारिक अनवर ने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया था कि भारत में हर साल 50 हजार करोड़ रूपए का खाद्य पदार्थ बर्बाद हो जाता है.

खाना फेंकने की बढ़ती आदत

प्रोफेसर सुरेश की रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत में के साथ ही लोग खाने के प्रति असंवेदनशील हो रहे हैं. खर्च करने की क्षमता के साथ ही खाना फेंकने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है.

रिपोर्ट में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक विवाहस्थलों के पास रखे एमसीडी के कूड़ाघरों में 40 प्रतिशत से अधिक खाना फेंका पाया जाता है. सामाजिक सम्मेलनों, रेस्तरां में होने वाली बर्बादी का स्तर और भी भयावह है. जितने ज्यादा लोग, जितनी तरह के व्यंजन उतना अधिक खाना खराब होता है.

सरकार की तरफ से इस दिशा में कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया है लेकिन कुछ सामाजिक संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता इसे रोकने के लिए क़ानून बनाए जाने की मांग करते रहे हैं.

खाने की बरबादी को रोकने के लिए कुछ सामाजिक संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता क़ानून बनाए जाने की मांग करते रहे हैं.
इमेज कैप्शन, खाने की बरबादी को रोकने के लिए कुछ सामाजिक संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता क़ानून बनाए जाने की मांग करते रहे हैं.

क़ानून या जागरुकता?

सामाजिक कार्यकर्ता वंदना शिवा ने बीबीसी से बातचीत में शादी-ब्याह और सामाजिक सम्मेलनों में होने वाली खाने की बर्बादी को रोकने के लिए क़ानून बनाने की सरकार से मांग की.

लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित खाद्य सुरक्षा आयोग के प्रमुख सलाहकार बिराज पटनायक कहते हैं कि सरकार द्वारा क़ानून बनाना समस्या का हल नहीं होगा बल्कि इससे लाइसेंस राज और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा और समाज में इसके लिए जागरूकता के बिना इसका उपचार संभव नहीं है.

कुछ सामाजिक संगठन लाखों लोगों का निवाला बचाने के लिए आगे आ रहे हैं. वह बर्बादी की सभी जगहों से बचा हुआ खाना इकठ्ठा करके ज़रूरतमंदों तक पहुंचा रहे हैं. ऐसे ही एक ग़ैर-सामाजिक संगठन दिल्ली फूडबैंकिंग नेटवर्क ने अपने शुरूआती 217 दिनों में ही 10 हज़ार लोगों तक 73 हज़ार किलोग्राम खाना पहुंचाया.

अगर ये प्रयास नहीं किया जाता तो लगभग 37 लाख रूपए का ये बचा हुआ खाना किसी की भूख नहीं मिटा पाता.

ये तो मात्र एक उदाहरण है, और भी कई हाथ हैं जो दूसरों का पेट भरने के लिए बढ़ रहे हैं.

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