मोहन भागवत का नाम आने से संघ 'असहज'

आडवाणी के मानने की घोषणा करते बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह
    • Author, राजेश जोशी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

<link type="page"><caption> नरेंद्र मोदी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/12/121219_modi_profile_aa.shtml" platform="highweb"/></link> को केंद्रीय मंच पर लाने के फ़ैसले से नाराज़ भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी को मनाने में सर संघचालक <link type="page"><caption> मोहन भागवत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/02/130207_rss_modi_vr.shtml" platform="highweb"/></link> की भूमिका की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार किए जाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ असहज महसूस कर रहा है.

संघ के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति ने बीबीसी हिंदी को बताया, “हम अब इसे रिग्रेट कर रहे हैं. सर संघचालक का नाम नहीं लिया जाना चाहिए था.”

आरएसएस के नेता हमेशा ही संघ को एक अराजनीतिक और सांस्कृतिक संगठन बताते रहे हैं और कहते रहे हैं कि उनका राजनीति से कोई लेना देना नहीं रहा है और न ही वे बीजेपी के कामकाज में कोई दख़ल देते हैं.

अब राजनाथ सिंह की इस घोषणा का सीधा अर्थ ये निकाला जा रहा है कि संघ कितना भी इनकार करे पर बीजेपी की नकेल दरअसल उसके हाथ में ही है.

आपको याद होगा कि 11 जून को बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने लालकृष्ण आडवाणी के घर पर एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान बीजेपी के आंतरिक संकट के दूर होने की घोषणा की थी.

उन्होंने कहा था, “<link type="page"><caption> राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/01/130124_hindutva_extremist_list_fma.shtml" platform="highweb"/></link> के सर संघचालक जी से आज उनकी (आडवाणी) बातचीत हुई है और उसके पश्चात उन्होंने ये फ़ैसला किया है जो भी पार्टी का निर्णय होगा उसे मैं मानूँगा.”

यही नहीं उन्होंने एक लिखित बयान भी मीडिया को दिया जिसमें सर संघचालक मोहन भागवत से आडवाणी की बातचीत का ज़िक्र था.

<link type="page"><caption> भारतीय जनता पार्टी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130611_advani_resignation_bjp_ns.shtml" platform="highweb"/></link> पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पकड़ और प्रभाव पर कभी किसी को शक नहीं रहा पर ये बयान देकर भारतीय जनता पार्टी ने एक तरह से स्वीकार कर लिया है कि उसके अंदरूनी मामलों से संघ का अच्छा ख़ासा दख़ल रहता है.

सरसंघचालक मोहन भागवत

<link type="page"><caption> </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130611_advani_resignation_bjp_ns.shtml" platform="highweb"/></link>नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के फ़ैसले को बीजेपी ने आडवाणी की नाराज़गी के बावजूद वापस नहीं लिया. और संघ इससे ख़ुश है.

संघ की ओर से मीडिया से बात करने वाले राम माधव ने बीबीसी से कहा, “कौन योग्य है- कौन नहीं, ये निर्णय पार्टी ही करेगी. पार्टी के सभी नेताओं ने साथ बैठकर गोवा में निर्णय किया. अपनी पार्टी, देश और कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं के हित में ये निर्णय किया होगा, तो हमें वो सही निर्णय ही लगता है.”

राजनीति और संघ

पर राजनीति से संघ का द्वंद्वात्मक रिश्ता रहा है.

इसीलिए जनसंघ के शुरुआती दिनों में राजनीति की दिशा में क़दम बढ़ा रहे स्वयंसेवकों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सर संघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने एक महत्वपूर्ण सलाह दी थी.

उन्होंने कहा था कि आप राजनीति के क्षेत्र में चाहे जितना ऊपर उठें, लेकिन आपको वापस धरती पर ही आना होगा.

अपने कई भाषणों में उन्होंने संघ की ओर से राजनीति में भेजे गए स्वयंसेवकों के बारे में टिप्पणियाँ कीं.

जनसंघ के गठन के बाद 5 मार्च 1960 को उन्होंने इंदौर में स्पष्ट किया कि राजनीति में जाने वाले स्वयंसेवकों की डोर दरअसल संघ के हाथों में ही रहेगी.

उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि कुछ स्वयंसेवक राजनीति में काम करते हैं, जहाँ उन्हें बैठकें आयोजित करनी होती हैं, नारे लगाने होते हैं और जुलूस निकालने होते हैं. हमारे काम में इन सबकी कोई जगह नहीं है. एक नाटक के पात्रों की तरह जो भूमिका निभाने को कहा जाए उसे अच्छी तरह से निभाया जाना चाहिए. पर कुछ स्वयंसेवक नट की भूमिका से आगे बढ़कर अपने दिलों में अति उत्साह ले आते हैं. यहाँ तक कि वो फिर हमारे काम के नहीं रहते.”

इन बयानों की रोशनी में बीजेपी के बुज़ुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी की आरएसएस के प्रति शिकायतों को अच्छी तरह समझा जा सकता है कि वो बीजेपी के हर काम में दख़ल देता है.

आडवाणी की नाराज़गी

सन 2005 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान जब आडवाणी ने मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता बताया था तो आरएसएस ने तुरंत उनके पर कतर डाले. आखिरकार उन्हें बीजेपी अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा.

पर आख़िर संघ बार-बार इस बात को क्यों दोहराता है कि उसका राजनीति से कोई सरोकार नहीं है?

इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि काफ़ी दिलचस्प है.

महात्मा गाँधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर लगे प्रतिबंध को हटाते समय तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संघ के नेताओं से वचन लिया था कि उसका एक खुला संविधान होगा और वो राजनीति में दख़ल नहीं देंगे.

इससे पहले आरएसएस रहस्य की परतों में रहने वाला संगठन था, जिसका न कोई संविधान था और न ही सदस्यता रजिस्टर. सदस्यता रजिस्टर तो आज भी नहीं है पर संघ ने अपना संविधान ज़रूर बना रखा है और पदाधिकारियों को नियमित रूप से आम सहमति से ‘चुना’ भी जाता है.

महात्मा गाँधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे लेकिन आरएसएस नेताओं का कहना है कि उन्होंने महात्मा गाँधी की हत्या से पहले ही संघ छोड़ दिया था.

सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी चिट्ठियों में इस बात पर अफ़सोस जताया था कि महात्मा गाँधी की हत्या पर संघ के लोगों ने ख़ुशी ज़ाहिर की और मिठाइयाँ बाँटीं.

बहरहाल, प्रतिबंध हटाने के लिए रखी गई शर्तें संघ नेताओं ने मानीं और तभी से संघ सीधे-सीधे राजनीति में नहीं उतरता पर बीजेपी के ज़रिए राजनीति को ‘दिशा देता है’.

लेकिन संघ को जानने वाले लोग ये भी जानते हैं कि दूसरे सर संघचालक गोलवलकर को राजनीति और मीडिया से घोर अरुचि थी. पुराने लोग बताते हैं कि जब एक बार एक प्रेस फोटोग्राफ़र ने उनकी तस्वीर लेनी चाही तो गोलवलकर ने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढाँप लिया था.

इसलिए आडवाणी को मनाने में सर संघचालक की भूमिका पर मीडिया के सामने राजनाथ सिंह के बयान देने पर संघ की असहजता को समझा जा सकता है.