एक ब्रितानी संगीतकार के तिहाड़ पहुंचने की दास्तां

- Author, गीता पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
लगभग हर शनिवार दिल्ली से सटे किसी इलाके के धुँए से भरे नाइटक्लब के एक कमरे में स्टीफ़ान के को संगीत कार्यक्रम पेश करते देखा जा सकता है.
जिस रात मैं उन्हीं में से एक नाइटक्लब पहुँची तो स्टीफ़ान जैज़ बास्टर्ड्स नाम के एक बैंड के साथ कार्यक्रम पेश कर रहे थे.
अंदर जाने के लिए मैंने 300 रुपए दिए. पैसे देने के बाद मेरी कलाई पर एक मोहर लगा दी गई.
उत्साही प्रशंसक
कमरा ठसाठस भरा था. कुछ लोग ज़मीन पर बैठे थे. बाकी खड़े थे. कुछ उत्साही लोग डांस भी कर रहे थे.
दर्शकों के बीच बैठे व्यवसायी अतुल खन्ना कहते हैं,''यह बैंड अलग है, ये बहुत प्रगतिशील है. आप देखिए कि वे किस तरह भीड़ से जुड़ जाते हैं.''
कार्यक्रम के अंत में मैंने स्टीफ़ान को बताया कि पिछली बार मेरी कलाई पर मोहर तब लगी थी जब मैं कुछ क़ैदियों का इंटरव्यू करने <link type="page"><caption> तिहाड़ जेल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130503_tihar_clash_sm.shtml" platform="highweb"/></link> गई थी.

वह कहते हैं,''कितना विचित्र है. मैंने तिहाड़ जेल में तीन हफ्ते गुजारे हैं.''
स्टीफ़ान बाजार पर शोध करने वाली एक कंपनी के परियोजना निदेशक के रूप में 2006 में भारत आए थे.
दक्षिण लंदन के क्रॉयडन में पैदा हुए स्टीफ़ान को बचपन से ही संगीत से लगाव है. उनके पिता एक जैज़ बैंड में ड्रम बजाते थे. वह कहते हैं कि उन्हें पता था कि वे संगीतकार बनेंगे.
वह कहते हैं, ''भारत में पहली बात जो मैंने की वो थी 'एंपरर मिंग' नाम के एक बैंड की शुरुआत करना.''
बैंड का निर्माण
अगले तीन साल में उन्होंने कई दूसरे बैंड बनाए. इन्हीं में से एक था स्का बेंगर्स. जमैका की स्का संगीत पद्धति पर आधारित ये भारत का पहला बैंड था.
साढ़े तीन साल बाद स्टेफ़ान ने नौकरी छोड़कर खुद को संगीत और थियेटर के लिए समर्पित कर दिया.
लेकिन एक घटना ने उनकी ज़िंदगी बदल दी. स्टीफ़ान का पासपोर्ट गुम गया.
उन्होंने यह सोचकर इसकी शिकायत नहीं की कि एक न एक दिन तो उन्हें अपना खोया हुआ पासपोर्ट मिल ही जाएगा.
दिसंबर 2011 की शुक्रवार की शाम पुलिस ने उनका दरवाजा खटखटाया और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.
कागजों पर दस्तख़त कराने, अंगूठे का निशान लगवाने और मेडिकल जांच के लिए उन्हें कई दफ्तरों में ले जाया गया.
स्टीफ़ान बताते हैं कि उन्हें 60 कैदियों वाली एक बैरक में रखा गया. वहां हर कैदी ने उन्हें बधाई दी.
वो कहते हैं कि वहां विदेशी कैदियों की संख्या अधिक नहीं थी, इसलिए "मैं उनके लिए नया था. सब लोग यह जानना चाहते थे कि मैं कहाँ से हूं और जेल क्यों आया हूँ."
स्टीफ़ान बताते हैं, ''उनमें से बहुतों को यह जानकार निराश हुई कि मैं वीजा संबंधी अनियमितता की वजह से <link type="page"><caption> जेल आया हूँ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130318_prisoner_escape_ra.shtml" platform="highweb"/></link>. उनकी नजर में ये कोई बहुत गंभीर बात नहीं थी.''
कुछ दिन वाद उन्हें एक दूसरी बैरक भेज दिया गया जो क़रीब खाली थी.
जेल का जीवन
स्टीफ़ान बीते दिनों को याद करते हुए कहते हैं हैं,''वहाँ कोई गद्दा नहीं था, केवल कुछ कंबल थे. सर्दी का मौसम था. फांसी लगा लेने के डर से मुझे बेल्ट या जूते का फीता रखने की भी इजाजत नहीं थी. बैरक की लाइट भी हमेशा जलती रहती थी.''
''तेज़ रोशनी के बाद भी यह जीवन का एक काला अध्याय था. मुझे इस बात का कोई अनुमान नहीं था कि वहां कितने दिन रहना होगा. इसलिए सकारात्मक बने रहने का हरसंभव प्रयास करता था. ऐसा नहीं करने पर हिम्मत टूट जाने का डर था. इसलिए मैंने जेल में म्यूजिक वार्ड के बारे में पूछताछ की.''
जेल में स्टीफ़ान का अधिकांश समय म्यूजिक वार्ड में गुज़रा, वहाँ वो एक कनाडाई कैदी के साथ अन्य कैदियों को संगीत सिखाते थे.

बहुत से कैदियों में संगीत की प्रतिभा थी. उन्हें प्रशिक्षण देने भर की जरूरत थी. म्यूजिक वार्ड के एक जर्जर ड्रम और कीबोर्ड से दोनों ने कैदियों को प्रशिक्षण देना शुरू किया.
तीन हफ़्ते बाद उनके साथियों ने उनकी जमानत की व्यवस्था कर दी. जेल से रिहा होते समय स्टेफ़ान बहुत निराश थे.
जेल में कार्यक्रम
वह कहते हैं,''मैं जेल में कैदियों के लिए एक कार्यक्रम आयोजित करने के बारे में सोच रहा था. मै इससे पैसे जमा कर म्यूजिक वार्ड के वाद्य यंत्रों को भी बदलना चाहता था.''
जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने वाद्य यंत्रों के एक विक्रेता से संपर्क कर कैदियों के लिए वाद्य यंत्र दान करने की अपील की.
पिछले साल अप्रैल में <link type="page"><caption> तिहाड़</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/12/111206_tihar_mall_ar.shtml" platform="highweb"/></link> का यह पूर्व कैदी एक बार फिर जेल गया. लेकिन एक कैदी के रूप में नहीं. उन्होंने बताया,''मैंने वहाँ दीप प्रज्ज्वलित किया, भाषण दिया. मुझसे वीआईपी की तरह व्यवहार किया गया.''
तिहाड़ में उनका कार्यक्रम बहुत सफल रहा. इसमें पुलिस उत्पीड़न, भ्रष्ट राजनेताओं और अन्य मुद्दों पर गाने गाए गए. उनके कार्यक्रम देखने-सुनने के लिए क़रीब 1,000 क़ैदी वहां मौज़ूद थे. कैदियों ने उनका उत्साह बढ़ाया, तालियाँ बजाईं और डांस किया.
कार्यक्रम को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने जगह दी.
तिहाड़ जेल के प्रवक्ता सुनील गुप्त ने बीबीसी से कहा, ''कार्यक्रम अच्छा था और कैदियों ने उसका आनंद लिया.''
वो कहते हैं कि एक क़ैदी के रूप में स्टेफ़ान का व्यवहार अच्छा था और "हमें उनके खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं मिली."
<italic><bold>(बीबीसी हिन्दी के <link type="page"><caption> एंड्रॉएड ऐप</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> के लिए क्लिक करें. आप हमें<link type="page"><caption> फेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi?fref=ts" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold></italic>












