नीतीश-भाजपा ब्रेकअप का काउंटडाउन शुरु ?

नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का <link type="page"><caption> गठबंधन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130415_bjp_nitish_tussle_fma.shtml" platform="highweb"/></link> इन दोनों दलों के बिहारी नेताओं की नज़र में अब टूटने के कगार पर आ चुका है.

उनके बीच हो रही <link type="page"><caption> अनौपचारिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130414_nitish_jdu_dp.shtml" platform="highweb"/></link> चर्चा में खुलकर कहा जा रहा है कि बस एक और झटके का इंतज़ार है और वो झटका लगना भी लगभग तय हो चुका है.

उनके मुताबिक़ गुजरात के मुख्यमंत्री <link type="page"><caption> नरेन्द्र मोदी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130413_politics_pawar_dp.shtml" platform="highweb"/></link> को भाजपा की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किये जाने में जितना वक़्त लगेगा बस उतनी ही उम्र बची है इस गठबंधन की.

यह भी साफ़ दिखने लगा है कि रिश्ता तोड़ने और आगे की <link type="page"><caption> रणनीति</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130401_modi_bjp_analysis_ml.shtml" platform="highweb"/></link> बनाने में ये दोनों दल जुट चुके हैं. यह सवाल नहीं रहा कि पहल किसकी तरफ़ से होगी क्योंकि जदयू ने पहल कर दी है.

प्यार और तकरार का कॉकटेल

हाल ही दिल्ली में जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी को संबोधित करते समय नरेन्द्र मोदी को लेकर नीतीश कुमार का संयम जिस तरह टूटा, उसे एक भाजपाई गुट से ही प्रेरित माना जा रहा है.

भाजपा-जदयू गठबंधन की सरकार पिछले साढ़े सात साल से बिहार की सत्ता पर काबिज़ है. इस दौरान दोनों पार्टियों का रिश्ता प्यार और तकरार का अजूबा कॉकटेल नज़र आता रहा है.

कई बार लगा है कि यह गठबंधन अब टूटा कि तब टूटा. ऐसा ख़ासकर तब होता है, जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का ज़िक्र आते ही दोनों तरफ से तल्ख़ बयानों का सिलसिला शुरू हो जाता है.

फिर यही गरम रुख़ अचानक नरम पड़ने लगता है. इसकी वजह है कि गठबंधन टूट जाने से मौजूदा संयुक्त जनाधार में बिखराव और सत्ता-सुख छिन जाने का ख़तरा इन्हें गांठों के बावजूद बंधे रहने को विवश कर देता है.

'प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी'

सुशील कुमार मोदी, नीतीश कुमार
इमेज कैप्शन, बीते दिनों नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर सुशील मोदी ने भी तेवर तीखे किए हैं.

लेकिन इस बार भाजपा-जदयू की सत्ता-राजनीति में कूटनीति का घालमेल हो जाने से तालमेल ज़्यादा बिगड़ गया है. दोनों पक्षों के तेवर ऐसे दिखने लगे हैं, जैसे आर-पार की लड़ाई लड़ने का वक्त आ गया है.

जो स्थिति अबतक थोड़ी दबी -छिपी थी, वह बिलकुल सामने उभर आई है. जदयू की यह ज़िद बेअसर हो चुकी है कि नीतीश कुमार को जोड़े रखने के लिए भाजपा नरेन्द्र मोदी को 'प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी' बनाने का इरादा छोड़ दे.

इन दिनों यह सवाल भी ज़्यादा उभरा है कि क्या नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपाई अन्तःपुर में छिड़े अडवाणी-नरेन्द्र युद्ध में महज एक हथियार की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं?

नीतीश खेमे की तरफ़ से लालकृष्ण आडवाणी के समर्थन में दिए गए बयानों ने इस सवाल को काफ़ी बल दिया है. बाद में यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे प्रमुख भाजपा नेताओं ने भी इसी सुर में सुर मिलाये.

मोदी का बदला हुआ रुख

लेकिन बिहार में भाजपा के जितने भी नेता या कार्यकर्त्ता इस सिलसिले में मुखर हुए हैं, वे सभी नीतीश कुमार के नरेन्द्र मोदी विरोधी हालिया बयानों की सख्त मज़म्मत कर रहे हैं.

यहाँ तक कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सबसे विश्वस्त और तरफ़दार माने जाने वाले भाजपा नेता और उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का भी रुख़ अब बदला हुआ दिख रहा है.

उन्होंने दिल्ली में हाल ही नीतीश कुमार की नरेन्द्र मोदी विरोधी टिप्पणियों को अनर्गल और आपत्तिजनक माना है. भाजपा कोटे के अन्य मंत्रियों ने जदयू की धर्मनिरपेक्षता वाली बात को ढोंगी राजनीति कहा है.

उधर जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद शिवानंद तिवारी ने खुली चुनौती कुछ इन शब्दों में दी है, ''भाजपा को जो भी निर्णय लेना हो, ले सकती है. उसे किसी ने बाँध के तो रखा नहीं है. लेकिन इतना तय है कि जदयू को नरेन्द्र मोदी बतौर पीएम उम्मीदवार क़तई क़बूल नहीं होगा.''

तनातनी के माहौल में गठबंधन का अस्तित्व

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेता
इमेज कैप्शन, एनडीए में मोदी और नीतीश को लेकर दुविधा की स्थिति दिख रही है.

जदयू प्रवक्ता के इस तीखे तेवर के जवाब में भाजपा प्रवक्ता ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि शिवानंद जी को खुद भी पता नहीं होगा कि कल वो दल बदलकर किस पार्टी में जायेंगे.

शिवानंद तिवारी पहले लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल में थे. इस तू-तू मैं-मैं के बीच बिहार के सूचना और जनसंपर्क मंत्री वृषिण पटेल ने तो ये भी कह दिया, "यहाँ गठबंधन जैसा कुछ बचा हो, ऐसा लगता नहीं है क्योंकि जदयू अपने उसूल को भाजपा के हवाले नहीं कर सकता."

ज़ाहिर है कि यहाँ सत्ताधारी गठबंधन के दोनों ख़ेमों के बीच तनातनी के माहौल में गठबंधन का अस्तित्व सिर्फ नाम के लिए क़ायम है. नीतीश कुमार ' नो रिटर्न' की हद तक जा पहुंचे हैं.

जब नरेन्द्र मोदी को आगामी चुनावी ज़रूरतों के मद्देनज़र अपने शीर्ष पर बिठाना भाजपा की विवशता सी होती जा रही है तो फिर नीतीश कुमार को अपना रास्ता बदलना ही होगा . यह उन्हीं का बहुचर्चित ऐलान है.

वैसे जदयू अगर चाहे तो इस गठबंधन के बिना भी वह अपने मौजूदा विधायक संख्या बल के बूते बिहार की सत्ता में बने रह सकता है. उसे बहुमत के लिए सिर्फ छह विधायक जुटाने होंगे. कुछ दल बदलू तो इसी इंतज़ार में बैठे हैं.