मोदी-नीतीश में कौन किस पर भारी?

पिछले दो दिनों में जनता दल यूनाइटेड की <link type="page"><caption> लगातार बयानबाज़ी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130316_nitish_delhi_rally_sk.shtml" platform="highweb"/></link> के बीच भारतीय जनता पार्टी ने बिहार ईकाई की जो बैठक 18 अप्रैल को बुलाई है उसको लेकर राजनीतिक हलक़ों में बहुत सारी चर्चाएं हैं.
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के अहम सहयोगी दल जेडीयू और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साफ किया है कि हालांकि वो प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय करने के लिए बीजेपी को कुछ और वक़्त दे रहे हैं, लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं होंगे.
कई हलक़ों में कहा जा रहा है कि <link type="page"><caption> बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130401_modi_bjp_analysis_ml.shtml" platform="highweb"/></link> भारी दबाव में हैं और इसलिए उन्होंने गुरूवार की बैठक बुलाई है.
हालांकि पार्टी नेताओं का कहना है कि 18 तारीख़ की बैठक भी दूसरे राज्य ईकाईयों की जारी बैठकों का नतीजा है, 'हां, हो सकता है कि इस मामले पर उस दिन कुछ अधिक चर्चा हो.'
रविवार को पार्टी के झारखंड ईकाई की बैठक दिल्ली में हुई और मंगल के दिन इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के नेता पार्टी के नेताओं से मिलेंगे.
मोदी पर राय
राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप कौशल मानते हैं कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय किए जाने को लेकर ख़ुद पार्टी में कोई साफ़ विचार नहीं नजर आता है.
वो कहते हैं, "राजनाथ सिंह जहां एक तरफ नरेंद्र मोदी को देश का सबसे लोकप्रिय नेता मानते हैं, लेकिन दूसरी ओर उन्होंने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के मसले पर रूख़ साफ़ नहीं किया है. यानी वो अपने और दूसरे नेताओं के लिए भी संभावना बचाए रखना चाहते हैं."
प्रदीप कौशल का मानना है कि पार्टी में इस मामले को लेकर कोई जल्दी नहीं दिखती है.
पार्टी के क़रीबी कुछ लोग तो हंसते हुए कहते हैं कि इस मामले में जल्दी सिर्फ नरेंद्र मोदी को ही है.
प्रदीप कौशल कहते हैं कि बीजेपी में एक बड़े वर्ग की सोच ये भी है कि नरेंद्र मोदी का नाम साफ नहीं किया जाए, उन्हें चुनाव प्रचार समीति जैसी ईकाई का प्रमुख बनाकर उनकी ऊर्जा, तजुर्बे और कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में उनके समर्थन का फायदा उठाया जाए और बाद में सहयोगी दलों से ही मोदी के नाम पर उठे एतराज़ का फ़ायदा उठाकर ख़ुद सत्ता हासिल करने की ज़ुगत भिड़ाई जाए.
नीतीश की मुश्किल
उनका मानना है कि नीतीश कुमार चाहते हैं कि वो अनिश्चित्ता की स्थिति से बचें, क्योंकि इसका प्रभाव उनके वोटरों पर पड़ सकता है.
जेडीयू ने बीजेपी से कहा है कि वो प्रधानमंत्री वाले मसले पर स्थिति को साल के अंत तक साफ करें.

हालांकि अंग्रेज़ी अख़बार टेलीग्राफ़ के संपादक शंकर्षण ठाकुर कहते हैं कि बिहार ईकाई का एक धड़ा भी इस बात की कोशिश में है कि गठबंधन टूट जाए.
शंकर्षण ठाकुर बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और बीजेपी के अहम नेता के हालिया बयानों की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं कि जिसमें सुशील, नरेंद्र मोदी के नाम को लेकर थोड़ा नर्म देखे गए हैं.
लेकिन वो कहते हैं कि बीजेपी अगर नरेंद्र मोदी का नाम साफ करती है तो ये साफ है कि नीतीश कुमार के साथ उनका गठबंधन समाप्त हो जाएगा.
संभावित नुक़सान
मगर इसका दूसरा पहलू पेश करते हुए प्रदीप कौशल का कहना है कि पार्टी जानती है कि नरेंद्र मोदी का नाम आगे करने का साफ मतलब है कम से कम 80 सासंदो के समर्थन से हाथ धो देना क्योकि इस हालत में न सिर्फ जेडीयू, बल्कि दूसरे संभावित सहयोगी जैसे ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के जगनमोहन रेड्डी से भी हाथ धोना.
वो कहते हैं कि बीजेपी 1996 देख चुकी है और जानती है कि वो इस बात के लिए आश्वस्त नहीं रह सकती है कि अगर वो बड़ी पार्टी बनकर उभर भी जाती है तो दूसरे दल सत्ता में भागीदारी के लोभ में उसके पीछे खड़े हो जाएंगे.












