ग्लोबल पावर में बदलती भारतीय कंपनियाँ

साल 2000 में मुझे लंदन में रहे पाँच साल हो चुके थे. तब ब्रिटेन के अख़बारों में भारत की ख़बरें कम ही छपती थीं.
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उस साल गर्मी के महीने में एक धमाकेदार खबर सभी अख़बारों के पहले पन्ने पर छपी कि भारतीय समूह टाटा ने ब्रिटने के विख्यात चाय के ब्रांड टेटली का अधिग्रहण कर लिया है.
यकीन नहीं आया, सिर्फ मुझे ही नहीं बल्कि पूरे ब्रिटेन को. सभी की ज़ुबान पर एक ही सवाल था - ये कैसे हो सकता है कि 114 मिलियन अमरीकी डॉलर की एक कंपनी अपने से तीन गुना बड़ी कंपनी को ख़रीद ले?
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टाटा ने ब्रिटेन की चाय कंपनी नहीं खरीदी थी बल्कि टेटली का बड़ा नाम और ब्रांड खरीदा था.
उस दिन लंदन के एक कैफे में मैंने चाय पी, और उस दिन मुझे चाय का ज़ायका बड़ा अच्छा लगा.
रतन टाटा ने उस दिन कहा था,"ये एक साहसी क़दम है और मुझे उम्मीद है दूसरी भारतीय कंपनियां भी इसी तरह के क़दम उठा सकेंगी".
उस साल से अब तक टाटा समूह ने लगभग 40 अरब डॉलर निवेश करके 50 विदेशी कंपनियां खरीद ली हैं.
रतन टाटा और टाटा समूह के नक्शों कदम पर दूसरी कई भारतीय कंपनियां चल पडीं और आज 450 से अधिक विदेशी कंपनियां उनकी झोली में हैं.
ऊँची उड़ान
अधिग्रहणों पर मार्किट रिसर्च एजेंसी क्रोल एडवाइज़री की आई ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि महत्वाकांक्षी भारतीय कंपनियाँ अब देश के बाहर ऊंची उड़ानें भर रही हैं.
साल 2000 से लेकर 2012 तक ये भारतीय कंपनियां दुनिया के लगभग हर कोने में अधिग्रहण करती आ रही हैं.
क्रोल एडवाइज़री के अनुसार अकेले साल 2012 में भारतीय कंपनियों ने करीब 11 अरब अमरीकी डॉलर ख़र्च कर कुल 72 अधिग्रहण किए.
विदेशों में निवेश करने वाले सिंगापुर स्थित भारतीय उद्योगपति बीके मोदी कहते हैं,"पिछले दस सालों में कई भारतीय कंपनियों ने बाहर देशों में निवेश किया है, हिस्सेदारी खरीदी है. हर क्षेत्र में भारतीय कंपनियां ग्लोबल बनती जा रही हैं. आज रुझान ये है कि अगर आप ग्लोबल नहीं है तो आप पीछे छूट गए."
क्रोल एडवाइज़री की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते नौ सालों में सबसे अधिक निवेश या अधिग्रहण ब्रिटेन स्थित कंपनियों में किया गया है. इसके बाद अमरीका का नंबर आता है.
प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिग्रहणों के कारण दस अरब अमरीकी डॉलर के अधिग्रहण के साथ नाइजीरिया तीसरे स्थान पर है. ऐसे ही पाँच अरब डॉलर की राशि इन कंपनियों ने कज़ाकिस्तान में लगाई है.
इसके अलावा ब्राज़ील, जर्मनी, सिंगापुर, इंडोनेशिया इटली और ऑस्ट्रेलिया में भी इन कंपनियों हिस्सेदारी ख़रीदी है या अधिग्रहण किए हैं.
कारण
क्रोल एडवाइज़री भारत की डायरेक्टर रेशमी खुराना कहती हैं,"इस रुझान के कई कारण हैं. पहला ये कि भारत सरकार अगले साल चुनाव की वजह से नयी नीतियों पर ध्यान नहीं दे रही है, निवेश का माहौल सही नहीं होने के कारण वो भारतीय कंपनियां बाहर जाकर निवेश कर रही हैं.दूसरा कारण ये है कि पश्चिमी देशों में आर्थिक कठिनाइयों के कारण कंपनियां दिक्कत में हैं और भारतीय कंपनियों के लिए उन्हें ख़रीदने का ये सही मौक़ा है और तीसरा कारण ये है कि अब भारतीय कंपनियों को ग्लोबल स्टेज पर काम करने का काफी अनुभव हो गया है".
वैसे ऐसा नहीं है कि सभी भारतीय अधिग्रहण कामयाब ही हुए. हवाई अड्डा बनाने वाली भारतीय कंपनी जीएमआर को पिछले साल मालदीव से निकलना पड़ा.
इसी तरह बोलीविया की लोहे की खानों में निवेश करने वाली भारतीय कंपनी जिंदल स्टील को वहाँ से बाहर होना पड़ा.
वैसे विशेषज्ञ कहते हैं इन झटकों के बावजूद भारतीय कंपनियों का मनोबल काफी ऊंचा है.












