आपबीती: इतना मारा कि दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई

अब तक आपने पढ़ा कि <link type="page"><caption> प्रीतम साहू</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130331_pirates_prisoner_v.shtml" platform="highweb"/></link> नें इंजीनियरिंग में स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद <link type="page"><caption> मर्चेंट नेवी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130331_pirates_prisoner_v.shtml" platform="highweb"/></link> में अपना करियर बनाने का सपना देखा और उन्होंने एक निजी माल वाहक जहाज़ पर नौकरी कर ली.
<link type="page"><caption> डायरी की पहली कड़ी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/04/130331_pirates_prisoner_v.shtml" platform="highweb"/></link>
अपने सफ़र के पहले ही चरण में उनके साथ वो सबकुछ हुआ, जो उन्होंने किस्से कहानियों में ही पढ़ा था.
वह उन 22 लोगों में थे जिन्हें <link type="page"><caption> सोमालिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130309_sailor_indian_sk.shtml" platform="highweb"/></link> के समुद्री डाकुओं ने साल भर से भी ज़्यादासमय तक बंधक बनाए रखा.
पूरा एक साल पानी में बिताने के बाद आखिरकार वे रिहा हुए और छत्तीसगढ़ में अपने घर, राजनंदगांव पहुंचे.
पेश है उनके अनुभवों की कहानी उन्ही की जुबानी जो बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के साथ बातचीत पर आधारित है.
प्रीतम साहू की डायरी की दूसरी कड़ी.
सोमालिया में बंदूक रखना आम बात है
छह दिनों के समुद्री सफ़र के बाद हम सोमालिया के पास पहुँच चुके थे. हमें पता चला यहां से 'बोसासो' करीब है.
फिर किनारे से कुछ मील की दूरी पर हमने पड़ाव दाल दिया. जहाँ हमने पड़ाव डाला वहां से बोसासो 40 नॉटिकल मील की दूरी पर था.
हम समुद्र में ही रहे. इस बीच, समुद्री डाकुओं का दल बदलता रहा.
गैन्नी हमसे बोलता रहता था कि सोमालिया पहुचने के बाद वह 20 दिनों के लिए अपने घर जाएगा और जब लौटकर आएगा तो हमें छोड़ दिया जाएगा.
हमारे पास उसकी बातों पर विश्वास करने के अलावा और चारा भी भला क्या था?
हमने जैसे ही पड़ाव डाला, हमारे जहाज़ पर 50 से 60 समुद्री डाकू सवार हो गए. सब लम्बे चौड़े और ख़तरनाक दिखने वाले लोग. सबके पास बंदूकें थीं.
समुद्री लुटेरे हमें सीमित खुराक देते थे

उन्होंने हमें बताया कि बंदूक रखना एक आम बात है. वो सोमालिया में हर जगह उपलब्ध हैं. दुकानों पर भी मिलती हैं.
वैसे हमें पहले दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन जाना था जहां हम डीज़ल, खाना और दवाइयां लेने वाले थे.
जहाज़ में सिर्फ तीन महीनों का ही खाना था जैसे फल, दाल, चावल, मीट, ब्रेड, मक्खन, जैम और चिकन.
एक दिन ऐसा भी आया कि हमारा खाना ख़त्म हो गया और हमें डाकुओं पर निर्भर हो जाना पड़ा, वे हमें सीमित खुराक देते थे.
वे सिर्फ चावल, मैदा, प्याज़ और आलू के अलावा तेल देते थे. कभी कभी जहाज़ पर बकरा लाया जाता था जिसे जहाज़ पर ही काटा जाता था.
रात में हम मछली पकड़ते थे. ऐसे हमारा खाना पकता था. मगर मेरे लिए समस्या थी कि मैं शाकाहारी हूं.
मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था
मैं अकेला शाकाहारी था जहाज़ पर. सिर्फ चावल और आलू पर ही अपना वक़्त गुजारा कर रहा था.
खाना ख़त्म था और साथ ही साथ दवाईयां भी ख़त्म हो गईं. जहाज़ पर अस्पताल का कमरा भी था जिसे समुद्री डाकुओं ने तहस नहस कर दिया था.
बीच बीच में वे जहाज पर एक डॉक्टर को लाया करते थे जो दवाईयां देकर चला जाता था. मगर वह अनुभवी डाक्टर नहीं था.
जहाज़ पर लोग बीमार पड़ने लगे. जयपुर का हमारा साथी तो काफी बीमार था. उसका वज़न बीस किलोग्राम तक घट गया.
मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था क्योंकि मैं पहले से ही दुबला पतला था. फिर भी मेरा वज़न आठ से दस किलो तक घट गया.
हमारे दूसरे नंबर के इंजीनियर थे 'मिस्टर किंग्स'. चूंकि वह नाईजीरियाई थे और मालिक के प्रतिनिधि थे, इसलिए उन्हें बहुत प्रताड़ित किया गया.
जहाज़ के मालिक ने हाथ खड़े कर दिए

कई बार उनके साथ मार पीट की गयी. कभी कभी उनकी कनपट्टी पर बंदूक रखकर कान के पास से गोली चलाई जाती थी.
एक दिन प्रताड़ना की वजह से उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे मर गए. वह 20 मार्च का दिन था. यह पिछले साल की बात है.
हमने उन्हें खुली हवा में ले जाने की बहुत मिन्नत की मगर समुद्री डाकू नहीं माने. वो बहुत क्रूर थे. शायद खुली हवा में ले जाकर हम उन्हें बचा पाते.
फिर हमने उनकी लाश को समुद्र में ही बहा दिया.
समुद्री डाकुओं ने शुरू में हमें और जहाज़ को छोड़ने के एवज में 25 अरब डालर मांगे. बाद में उनकी मांग घटकर 1.5 अरब डालर तक आ गई.
मगर हमारे जहाज़ के मालिक ने हाथ खड़े कर दिए. हमें उम्मीद थी कि मालिक पैसे देकर जहाज़ को छुड़ा लेगा.
लुटेरे सरकार पर दबाव बनाना चाहते थे
मगर उसके पीछे हट जाने से हमें सबसे ज़्यादा निराशा हुई और लगा कि अब कभी छूट नहीं पाएंगे.
जहाज़ के मालिक ने इस बारे में केरल की सरकार को एक फैक्स भेजकर साफ़ कह दिया कि वह पैसे देने की स्थिति में नहीं है.
फिर हमने भारत सरकार से गुहार लगाई. जब डाकुओं को पता चला कि भारत की सरकार से हमने गुहार लगाई है तो उन्होंने 1.5 अरब डालर की जगह अपनी मांग बढाकर तीन अरब डालर कर दी.
मालिक के पीछे हट जाने के बाद डाकू फिर से क्रूरता पर उतारू हो गए. 17 दिसंबर को उन्होंने हम सब को बांध दिया और हवा में गोलियां चलाने लगे.
उन्होंने बारी बारी से सबको अपने घरों पर फोन करने को कहा. वे घर वालों को डराना चाहते थे ताकि वो सरकार पर दबाव बना सके.
फिर एक दिन उन्होंने हमें कहा कि 20 तारीख को हमारा आखिरी दिन है. या तो हम रिहा कर दिए जाएंगे या फिर मार दिए जाएंगे.
उन्होंने कहा कि हमारा मालिक पीछे हट गया है इस लिए वो हमारे जहाज़ को डुबा देंगे और हमें एक दूसरे बंधक बनाए गए जहाज़ पर शिफ्ट कर देंगे.
प्रीतम की डायरी के अगले और अंतिम भाग में पढ़िए उन आखरी क्षणों के बारे में जब उन्हें आखिरकार रिहा किया गया












