'नौशाद, गुलाम अली को नहीं रोका, हमें क्यों?'

भारत प्रशासित कश्मीर में लड़कियों के बैंड प्रगाश के खिलाफ जारी फ़तवे के बाद बैंड की एक सदस्य ने सवाल उठाया है कि सुप्रसिद्ध कलाकारों - नौशाद, ग़ुलाम अली और मेंहदी हसन जैसे अन्य मुसलमानों के खिलाफ ऐसा फ़तवा क्यों जारी नहीं किया गया?
गौरतलब है कि हाल में कश्मीर के ग्रैंड मुफ्ती बशीरुद्दीन अहमद और कुछ संगठनों ने लड़कियों के इस बैंड के प्रदर्शनों का विरोध करते हुए उनके खिलाफ़ फ़तवा जारी किया था.
जहाँ भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया पर इसका जमकर विरोध किया गया है वहीं लड़कियों ने बैंड को भंग करने की घोषणा की थी जिस पर वे अब भी कायम हैं.
बीबीसी से विशेष बातचीत में जहाँ उन्होंने कश्मीरियों की भावनाओं का आदर करते हुए बैंड भंग करने के फैसले पर कायम रहने की बात कही है वहीं उन्होंने कुछ अहम सवाल भी उठाए हैं.
बीबीसी से बैंड की सदस्य ने क्या कहा:
''हमें नहीं मालूम था कि इस्लाम में संगीत हराम है.
कश्मीर के बहुत सारे आर्टिस्ट हैं जो अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन उनके ख़िलाफ़ तो फ़तवा नहीं जारी किया गया. उन्हें कभी नहीं रोका गया.
संगीतकार नौशाद एक मुसलमान हैं, उन्हें तो नहीं रोका गया.
ग़ुलाम अली, मेंहदी हसन, वो सब मुसलमान हैं...उन सबको नहीं रोका गया लेकिन हमें रोका जा रहा है.
हम मुफ्ती साहब और कश्मीरियों की भावनाओं का आदर करते हैं, और इसलिए हम अपने बैंड को बंद कर रहे हैं.
मुझे नहीं मालूम हमें क्यों रोका जा रहा है? वो कहते हैं कि ये इस्लाम के ख़िलाफ़ है, मर्द इससे उत्तेजित होते हैं.
अगर मर्द हमारे संगीत से उत्तेजित हो जाते हैं तो मैं यही कहूंगी कि मुस्लिम मर्द उतने मज़बूत नहीं हैं.
इस्लाम इतना कमज़ोर नहीं है कि उसे हमारे संगीत से कोई खतरा हो."
<bold>'ये नज़रिया ठीक नहीं'</bold>
"उनका नज़रिया ठीक नहीं है लेकिन जब उन्होंने फ़तवा जारी कर दिया है तो हम संगीत छोड़ रहे हैं.
कश्मीर में कोई भी हमारा समर्थन नहीं कर रहा है.
जो लोग ये कह रहे हैं कि हम मुफ़्ती साहब की बात को इतनी अहमियत क्यों दे रहें हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि फ़तवा उनके ख़िलाफ़ नहीं जारी किया गया है.
हमारे माता-पिता की तरफ़ से हम पर कोई दबाव नहीं है.
हम बैंड के लोगों ने आपस में बातचीत की और सब इसके लिए राज़ी थे कि जब हमारे खिलाफ फ़तवा जारी हो गया है तो हम अपने बैंड को भंग कर दें.
ये हमारा जुनून था, जिसे हम आगे भी करते रहना चाहते थे."
<bold>(कश्मीरी युवतियों के बैंड- प्रगाश की एक सदस्य की बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)</bold>












