
भारत के बहुत सारे मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं मिलता है.
तमिलनाडु में तक़रीबन 400 दलितों के एक समूह ने रविवार के दिन कोयंबटूर के 120 साल पुराने मरियम्मन मंदिर में प्रवेश किया.
शहर से लगभग 17 किलोमीटर दूर कलापत्ती में मौजूद इस मंदिर में अबतक दलितों को प्रवेश नहीं होने दिया जाता था.
ख़बरों के मुताबिक़ मंदिर में प्रवेश से पहले दोपहर में दलितों और मार्कसवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लगभग तीन हज़ार सदस्यों ने कलापत्ती क्षेत्र में एक रैली निकाली.
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद पीआर नटराजन ने बीबीसी हिंदी से कहा कि हालांकि ये मंदिर साल 1976 से ही प्रशासन की देखरेख में है फिर भी वहां दलितों को प्रवेश नहीं मिल पाता था इसलिए हमने इसका समाधान स्वयं ढ़ूँढ़ने की कोशिश की.
हस्तक्षेप
मंदिर में दलितों के प्रवेश और दलितों पर हो रहे दूसरे सामाजिक भेद-भाव के ख़िलाफ़ तमिलनाडु छूआछूत उन्मूलन मोर्चा और सीपीएम काफ़ी समय से काम करते रहे हैं.
तमिलनाडु छूआछूत उन्मूलन मोर्चा इस मामले पर शहर में कई बार विरोध रैलियां भी निकाली थीं और वो प्रशासन से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग भी उठाता रहा है.
पीआर नटराजन ने कहा, "दलितों को मंदिर के द्वार पर रोक दिया जाता था, अगर वो पूजा के लिए कहते तो पूजारी उनसे पैसे लेकर खुद किसी दुकान से प्रसाद मंगाते थे और फिर ही उसकी चढ़ावा भगवान पर चढ़ पाता था."
मोर्चा और सीपीएम ने रविवार को तमिलनाडु के कई दूसरे शहरों - एरोद, सलेम, वेल्लोर, त्रिचूर, मदुरई में भी रैलियां निकाली थीं.
अलग-अलग मामले
इन सब जगहों पर दलितों से जुड़े कई तरह के मामले जैसे, उनकी ज़मीन पर क़ब्ज़ा किए जाने से लेकर, उन्होंने अपने लिए जो मंदिर बनाए हैं उसपर ऊंची जाति के लोगों के कब्ज़े के मामले सामने आए हैं.
मोर्चा के अध्यक्ष पी संबत के हवाले से कहा गया है कि ये हुकूमत के लिए बड़े शर्म की बात है कि छूआछूत जैसी शर्मनाक प्रथा आज भी शहरी इलाक़ों तक में जारी है.
उनके मुताबिक़ कलापत्ती में ही तीन साल पहले एक ऊंची जाति के पास एक बस में बैठ जाने की सज़ा के तौर एक दलित पर हमला किया गया था.
इलाके़ में मौजूद अरूनतथियार समुदाय ये समझती थी कि ये उनके नसीब का हिस्सा है.








