धरने पर हिंदुस्तान!

    • Author, अंकित पांडे
    • पदनाम, फ़ोटो पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

जंतर-मंतर को ख़ास बनाते हैं अलग-अलग प्रांतों से आए लोग, जो यहां हफ़्तों-महीनों से और कुछ तो कई सालों से यहां टिके हैं.

जंतर मंतर धरना प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, रामइंद्र के लिए पिछले 17 साल से जंतर मंतर ही उनका घर बन चुका है. वह विश्व व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं और इसे लेकर हड़ताल पर हैं. उन्हें पुलिस ने कई बार हटाया, पर वह फिर लौट आते हैं. दुनिया बदले न बदले, रामइंद्र नहीं बदले हैं. जंतर मंतर से वह इस दुनिया को संबोधित करते रहते हैं.
जंतर मंतर धरना प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, मनीराम को उनके गांव में जान का ख़तरा था. प्रशासन ने उनकी शिकायत नहीं सुनी तो वह सीधे जंतर मंतर आए और धरने पर बैठ गए. अब उनका दिन-रात यहीं बीतता है. अगर आपको जानना हो कि मनीराम की कहानी क्या है, तो आप इस बोर्ड पर लिखी पूरी दास्तान जान सकते हैं.
जंतर मंतर धरना प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, जंतर मंतर लिंगभेद में यक़ीन नहीं रखता. उसके दिल में हर किसी के लिए जगह है, चाहे फिर वो समलैंगिक ही क्यों न हों. इसलिए जब उन्हें सरकार या अदालत से कोई अपील करनी होती है, तो वो जंतर मंतर चले आते हैं.
जंतर मंतर धरना प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, उत्तर प्रदेश का ज़िला बुंदेलखंड काफ़ी समय से सूखे की मार झेल रहा है. बुंदेलखंड के किसानों को अपनी बेहाली उजागर करने के लिए जंतर मंतर सही जगह लगी. उन्हें उम्मीद है कि किसी दिन तो किसी हुकमरान के कानों तक उनकी कहानी पहुंचेगी.
जंतर मंतर धरना प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, हरियाणा में दलितों पर अत्याचार और बलात्कार इस हद तक जा चुके हैं कि अब ये अख़बारों की सुर्खी भी नहीं बनते. इसलिए दलित समाज भी आवाज़ बुलंद करने के लिए आ पहुंचा है जंतर मंतर.
जंतर मंतर धरना प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, जंतर मंतर पर आपको बड़ी तादाद में सामाजिक और राजनीतिक कारणों से सताई गई और परेशान महिलाएं मिलेंगी, जिनकी उनके राज्य में कोई सुनने को तैयार नहीं.
जंतर मंतर धरना प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, प्रदर्शन की सबको इजाज़त है. इस मामले में पूरा लोकतंत्र है. आप किसी भी वजह से भी धरने पर बैठ सकते हैं. तस्वीर में दिखाई दे रहे व्यक्ति आसाराम बापू की जेल से रिहाई की मांग को लेकर महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं.
जंतर मंतर धरना प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, जंतर मंतर कभी वीरान नहीं होता क्योंकि समस्याएं पीछा नहीं छोड़तीं और अंतिम समाधान कोई नहीं है. तारीख़ें बदलती रहती हैं और लोग यहां पहुंचते रहते हैं, इस उम्मीद में कि 'वो सुबह कभी तो आएगी..'