अशिक्षितों के लिए खोले कॉल-सेंटरों के दरवाज़े

- Author, पारुल अग्रवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत का एक हिस्सा तेज़ी से तरक्की कर रहा है और दुनियाभर में उनके लिए आगे बढ़ने के मौके पैदा हो रहे हैं लेकिन इस दौड़ में ग्रामीण इलाके और वहां रहने वाले लोग कहीं पिछड़ से गए हैं.
तेज़ी से बदलती दुनिया में आगे बढ़ने के लिए नए से नए हुनर सीखना बेहद ज़रूरी है. हमारी इस कड़ी में पढ़िए कहानी एक ऐसे मिशन की जिसने गांवों के लिए देश-दुनिया के दरवाज़े खोल दिए हैं.
''मेरा नाम राजेश भट है और मैं ‘हेड्स हैल्ड हाई’ नाम के एक ऐसे मिशन के साथ जुड़ा हूं जिसका मकसद है भारत के सुदूर गांवों को तकनीकी क्रांति से जोड़ना है.
इस मिशन के ज़रिए हम अशिक्षित-निरक्षर नौजवानों को कॉल सेंटरों में काम करने लायक बनाते हैं.
साल 2007 में मैंने बंगलौर में अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़ दी और असंभव को संभव बनाने का लक्ष्य लिए इस मिशन के साथ जुड़ गया.

बंगलौर और हैदराबाद जैसे शहरों में हमने देखा है कि किस तरह आईटी क्षेत्र में खुली नौकरियों ने हर घर की तस्वीर बदल दी. हमने सोचा कि अगर ऐसी ही एक एक कोशिश भारत के गांवों में भी की जाए तो ये क्रांतिकारी हो सकता है.
हमने बीपीओ उद्योग को गांवों तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया और ग्रामीण इलाकों में मुफ्त प्रशिक्षण शिविर लगाने की योजना बनाई. इस काम के लिए आर्थिक मदद मिली बंगलौर के कुछ व्यापार संगठनों से. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी.
खेतों से दफ़्तर तक
अपने पहले प्रयोग के लिए हमने भारत के दक्षिणी इलाकों को चुना. ट्रेनिंग के लिए कई गांवों में साक्षात्कार हुए और बड़ी संख्या में नौजवान आगे आए.
गांवों में फैली निरक्षरता. ज़्यादातर नौजवान कभी स्कूल नहीं गए थे और अंग्रेज़ी बोलना उनके लिए एक सपने जैसा था.
उम्मीदवारों का चयन हमने उनकी पढ़ाई-लिखाई के आधार पर नहीं उनके आत्म-विश्वास को देखकर किया. हम चाहते थे ऐसे लोग जो सार्वजनिक रुप से दूसरों से बात करने में आत्मविश्वास दिखाएं. उनमें टूट कर मेहनत करने का जज़्बा और इतनी लगन की वो प्रशिक्षण अधूरा छोड़ कर न जाएं.
गांव में रहने वाले नौजवानों को रोज़गार दिलाने और उनके लिए एक नई दुनिया की खिड़कियां खोलने के लिए खास तरह की ट्रेनिंग इजाद की गई.
नाटकों और गीत संगीत के अलावा भाषा ज्ञान से जुड़ी रोचक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया. नतीजे चौंकाने वाले थे.

इन लोगों को जब पहली बार 6 से 8 हज़ार रुपए की नौकरियां मिलीं तो किसी को विश्वास नहीं हुआ. बचपन से आजतक इन्हें स्कूल भेजने से कतराने वाले इनके परिजन अब सबको पढ़ने की सलाह देते हैं.
आठ लोगों के हमारे पहले बैच में शामिल हुए रमेश की कहानी ये बयां करती है कि मौका मिलने पर अंग्रेज़ी तो क्या किसी क्षेत्र में ग्रामीण इलाके पीछे नहीं.
वो कहते हैं, ''मैं कभी स्कूल नहीं गया और बचपन से खेतों में गाय-भैंस चराने का काम करता था. सूखे के दिनों में मुझे वो काम भी महीं मिल पाता था. इस प्रशिक्षण के दौरान मैंने बहुत मेहनत की. आज जब मैं खुद को देखता हूं तो सबसे ज़्यादा खुशी इस बात की है कि गांव के लोग अब मुझ जैसा बनने का सपना देखते हैं.''
कोप्पल में ट्रेनिंग का हिस्सा रही चंदना के लिए ये नई ज़िंदगी की शुरुआत है.
चंदना कहती हैं,''ये वाकई एक चमत्कार है. इस प्रशिक्षण ने मेरी ज़िंदगी बदल दी है. मेरे माता-पिता और गांववालों ने कभी सोचा नहीं था कि मैं इस तरह अंग्रेज़ी बोला करूंगी और दफ्तर जाऊंगी. इस प्रशिक्षण ने मुझे अंग्रेज़ी बोलना ही नहीं सिखाया बल्कि ज़िंदगी जीने के काबिल बनाया है.''
हमारी कोशिश को जो सफलता मिली है उसने दिखा दिया है कि गांव में नौजवानों को अगर सही रास्ता और अवसर मिलें तो कई सपने हैं जो सच हो सकते हैं. यही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है.''












