केले से बदलती कालाहांडी की किस्मत

- Author, पीएम तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, कालाहांडी से लौटकर
उड़ीसा के कालाहांडी ज़िले के किसान और किस्मत शब्द में कोई समानता नहीं सिवाय इसके कि दोनों के नाम का पहला अक्षर क से शुरू होता है.
किस्मत शुरू से ही कालाहांडी से रूठी रही है. यह ज़िला ग़रीबी और भुखमरी के लिए ही सुर्ख़ियों में रहा है. लेकिन अब यहाँ क से शुरू होने वाला एक शब्द कालाहांडी और किस्मत के बीच पुल बन गया है.
और वह चीज़ है केला. कालाहांडी के ग़रीब आदिवासी अब केले की खेती के ज़रिए अपनी किस्मत बदल रहे हैं.
कालाहांडी ज़िला अब तक सूखे और भुखमरी की वजह से ही सुर्खियाँ बटोरता रहा है. लेकिन अब बड़े पैमाने पर केले की खेती ने इलाक़े के किसानों की रूठी किस्मत के दरवाज़े खोल दिए हैं.
इलाक़े में पारंपरिक तौर पर धान की खेती होती थी. लेकिन सूखे की वजह से यह फ़सल खेतों में ही सूख जाती थी. अब ऐसा नहीं है.
सरकारी सहायता

राज्य सरकार की पहल पर किसान धान की जगह बड़े पैमाने पर केले की खेती कर रहे हैं. केले की नई-नई क़िस्मों की खेती से किसानों की तक़दीर और इलाक़े की तस्वीर बदलने लगी है.
अब कालाहांडी इलाक़े में लगभग 12 हज़ार एकड़ ज़मीन पर केले की खेती हो रही है. एक एकड़ ज़मीन पर केले की खेती के लिए एक किसान को औसतन साल में 30 हज़ार रुपए ख़र्च करने पड़ते हैं. इस पर उसे 70 हज़ार से एक लाख रुपए तक का मुनाफ़ा होता है.
कालाहांडी के रामेश्वर साहू ने तीन साल पहले केले की खेती शुरू की थी. अब वे हर साल एक से डेढ़ लाख रुपए कमा रहे हैं.
साहू बताते हैं, " मैंने अपने परिचितों से सुन कर काफ़ी झिझकते हुए केले की खेती शुरू की थी. पहले साल उन्होंने 40 हज़ार रुपए की पूंजी लगाई. साल के अंत में लागत काट कर मुझे एक लाख रुपए का मुनाफा हुआ था."
कालाहांडी में हार्टिकल्चर विभाग के उप-निदेशक धरणीधर महापात्र कहते हैं, " नेशनल फ़ार्मिंग मिशन के तहत केले की खेती के लिए किसानों को लगभग दो सौ हेक्टेयर ज़मीन दी गई है. इसके अलावा हर किसान को प्रति एकड़ 15 हज़ार रुपए की सब्सिडी दी जाती है. किसानों को यह रक़म तीन साल में लौटानी होती है. पहले साल आधा और उसके बाद दो समान किश्तों में."
उनका कहना है कि केले की इस खेती से इलाक़े में किसानों की खुशहाली एक बार फिर लौटने लगी है.












