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केजरीवाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट में मिली जीत से दिल्ली में क्या बदलेगा
- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- सुप्रीम कोर्ट में केजरीवाल सरकार और एलजी के बीच अधिकारों को लेकर जारी थी क़ानूनी लड़ाई.
- सर्वोच्च अदालत ने फैसला दिया है कि अधिकारियों की पोस्टिंग और ट्रांसफ़र का हक़ दिल्ली सरकार है.
- अब तक दिल्ली में सचिवों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार दिल्ली के लेफ़िनेंट गवर्नर को था.
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा- भूमि, लोक व्यवस्था और पुलिस का मामला केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में.
- दिल्ली में सभी प्रशासनिक मामलों से सुपरविज़न का अधिकार उपराज्यपाल के पास नहीं हो सकता.
- साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस मामले पर बंटा हुआ फ़ैसला सुनाया था.
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गुरुवार को दिल्ली सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि अधिकारियों के ट्रांसफ़र और पोस्टिंग का अधिकार दिल्ली सरकार के पास होना चाहिए.
चीफ़ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच ने इस मामले में सर्वसम्मति से फ़ैसला सुनाया है.
पांच जजों की इस संवैधानिक पीठ में चीफ़ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एम आर शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल थे.
पीठ ने कहा कि दिल्ली में सभी प्रशासनिक मामलों से सुपरविज़न का अधिकार उपराज्यपाल के पास नहीं हो सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार के हर अधिकार में उपराज्यपाल का दखल नहीं हो सकता.
पीठ ने कहा, "अधिकारियों की पोस्टिंग और ट्रांसफ़र का अधिकार लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार के पास होता है."
"भूमि, लोक व्यवस्था और पुलिस को छोड़ कर सर्विस से जुड़े सभी फैसले, आईएएस अधिकारियों की पोस्टिंग (भले ही दिल्ली सरकार ने किया हो या नहीं) उनके तबादले के अधिकार दिल्ली सरकार के पास ही होंगे."
इस फ़ैसले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है, "आठ सालों से हमारे हर काम को केंद्र सरकार ने इस नियम के ज़रिए रोका. शिक्षा में काम करना चाहा तो ऐसा सचिव नियुक्त किया जो काम में अड़ंगा लगाया. मोहल्ला क्लीनिक के लिए ऐसा स्वास्थ्य सचिव चुना जो काम ना होने दिया."
"मेरे हाथ बांध कर मुझे नदी में फ़ेंक दिया गया था लेकिन आपका यकीन था और हमारी लगन से हमने काम करना जारी रखा. आज मैं चीफ़ जस्टिस और बेंच में शामिल चार अन्य जजों का शुक्रिया अदा करता हूं. ये लोकतंत्र की जीत है, सत्य की जीत है."
इस फ़ैसले पर आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और पत्रकार रहे आशुतोष ने बीबीसी से कहा, "इस फ़ैसले के जनता के लिए मायने हैं ही लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी हैं. ये मामला केजरीवाल बनाम केंद्र सरकार का था और अब इस जीत के बाद केजरीवाल सरकार के इरादे तो इससे बुलंद होंगे ही."
उन्होंने आगे कहा, "ये एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें एलजी के माध्यम से केंद्र सरकार दिल्ली सरकार को काम नहीं करने दे रही थी, उन्हें कंट्रोल कर रही थी, अब इस फ़ैसले से ये साफ़ हो गया है कि दिल्ली सरकार ही दिल्ली के नौकरशाहों को देखेगी."
आशुतोष कहते हैं कि 'अगर दिल्ली की जनता वोट देकर सरकार बना रही है तो नौकरशाहों से काम कराने का जिम्मा भी उसका ही होना चाहिए. अगर सरकार काम ही नहीं करा पाएगी तो जनता को कैसे जवाब देगी. अगर जवाबदेही सरकार की है तो सचिव भी सरकार के अधीन ही होने चाहिए.'
आशुतोष मानते हैं कि इससे दिल्ली की जनता को फ़ायदा होगा.
वो कहते हैं, "इससे जनता को साफ़ नज़रिया मिलेगा. अब तक दिल्ली सरकार ये कह देती थी कि उसे काम नहीं करने दिया जा रहा, वो जो चाहती है वो एलजी करने नहीं दे रहे."
"अब कम से कम सचिव उनके होंगे, उनके नियंत्रण में होंगे तो उनकी जवाबदेही जनता के प्रति और दृढ़ होगी. वो ये नहीं कह पाएंगे कि अधिकारियों पर हमारा बस नहीं चलता इसलिए हम ये काम नहीं कर पाए क्योंकि अब ये ज़िम्मेदारी उनकी होगी."
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लंबे वक्त से चली आ रही केजरीवाल सरकार बनाम एलजी के अधिकारों की लड़ाई के एक पहलू पर अपना फ़ैसला सुना दिया.
सचिव स्तर के अधिकारियों पर दिल्ली सरकार का अधिकार होगा या एलजी का इस लंबी चली आ रही बहस का जवाब सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया है.
फ़ैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 239 (एए) के तहत दिल्ली को विधानसभा स्थापित करने का अधिकार मिला. इसके सदस्यों को दिल्ली की जनता चुनती है. अनुच्छेद 239एए की व्याख्या उसी तरह की जानी चाहिए जिससे लोकतंत्र को आगे बढ़ाया जा सके."
कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक सरकार में असली शक्ति जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में होनी चाहिए.
बेंच के मुताबिक़, अगर किसी राज्य में एक्ज़िक्युटिव पॉवर केंद्र और राज्य के बीच बंटा हुआ होता है तो ये देखना चाहिए कि राज्य के कामकाज पर केंद्र हावी ना हो जाए. अगर ऐसा होता है तो ये संघीय शासन प्रणाली और लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ़ होगा."
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, "अगर लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को अधिकारियों को निर्देश देने का अधिकार ही नहीं होगा तो ये जवाबदेही के 'ट्रिपल चेन के सिद्धांत' के साथ बेमानी होगी."
"आदर्श स्थिति तो ये है कि सर्विस से जुड़े मामले दिल्ली सरकार के पास होना चाहिए, अगर मंत्रियों का नीतियों को लागू कराने वाले अधिकारियों पर कोई हक़ नहीं होगा तो वो काम कैसे करा पाएंगे. "
राज्यपाल के अंतर्गत लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि से जुड़े मामले आएंगे, लेकिन आईएएस या संयुक्त कैडर सेवाएं दिल्ली सरकार के अंतर्गत आनी चाहिए जो नीतियों से जुड़े काम करती हैं.
क्या थाविवाद?
दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है लेकिन इसे अपनी विधानसभा बनाने का हक़ मिला हुआ है. संविधान के अनुच्छेद 239 (एए) के बाद दिल्ली को नेशनल कैपिटल टेरिटरी घोषित किया गया.
दिल्ली की सरकार का तर्क था कि चूंकि यहां पर जनता की चुनी हुई सरकार है इसलिए दिल्ली के सभी अधिकारियों के ट्रांसफ़र और पोस्टिंग का अधिकार भी सरकार के पास होना चाहिए.
चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने 18 जनवरी को मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे आज सुनाया गया.
फरवरी 2019 में, सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण की बेंच ने इस मामले पर बँटा हुआ फ़ैसला सुनाया था.
जस्टिस सीकरी ने अपने फ़ैसले में कहा है कि सरकार में निदेशक स्तर की नियुक्ति दिल्ली सरकार कर सकती है.
वहीं जस्टिस भूषण का फ़ैसला इसके उलट था, उन्होंने अपने फ़ैसले में कहा था कि दिल्ली सरकार के पास सारी कार्यकारी शक्तियां नहीं है. अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार उपराज्यपाल के पास होने चाहिए.
दो बेंच की पीठ के फ़ैसले में मतभेद होने के बाद असहमति वाले मुद्दों को तीन जजों की बेंच के पास भेजा गया था लेकिन बीते साल केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि ये मामला बड़ी संवैधानिक बेंच को भेजा जाए क्योंकि ये देश की राजधानी के अधिकारियों की पोस्टिंग और तबादले से जुड़ा है.
इसके बाद ये फ़ैसला पांच जजों की संवैधानिक पीठ को भेजा गया था और अब इस मामले में कोर्ट का फ़ैसला आया है.
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