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दलाई लामा विवाद: एनसीपीसीआर ख़ामोश, चाइल्ड-राइट्स कार्यकर्ताओं की राय बंटी
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तिब्बती आध्यात्मिक नेता और बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा हाल ही में एक विवाद के केंद्र में दिखे. उनसे जुड़ा एक ऐसा वीडियो वायरल हुआ जिसमें वो एक नाबालिग़ बच्चे के होंठ चूमते दिखे और होंठ चूमने के बाद उन्होंने उससे अपनी जीभ चूसने के लिए कहा.
इस वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं जिनमें लोगों ने इस पूरे प्रकरण को अनुचित और परेशान करने वाला बताते हुए दलाई लामा की कड़ी आलोचना की.
दलाई लामा के दफ़्तर की तरफ़ से एक बयान जारी किया गया जिसमें दलाई लामा ने उस बच्चे और उसके परिवार से माफ़ी मांगी और इस घटना पर अफ़सोस जताया.
साथ ही ये भी कहा गया कि दलाई लामा जिन लोगों से मिलते हैं उन्हें अक्सर मासूमियत से और मज़ाक़िया लहजे में चिढ़ाते हैं.
हम देख रहे हैं: एनसीपीसीआर
इस मामले पर मचे हंगामे के बीच बीबीसी ने नेशनल कमीशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) से सम्पर्क कर ये जानना चाहा कि क्या वो इस मामले में किसी तरह की कार्रवाई के बारे में सोच रहा है?
एनसीपीसीआर के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने कहा कि वो इस मामले को 'देख रहे हैं' और ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या दलाई लामा को कोई डिप्लोमेटिक इम्युनिटी या राजनयिक प्रतिरक्षा मिली हुई है.
किसी भी देश में रहने वाले या यात्रा कर रहे विदेशी राजनयिकों या नेताओं को डिप्लोमेटिक इम्युनिटी मिलती है जिसकी वजह से उस देश के क़ानूनों से उन्हें छूट मिलती है.
इस विवाद के सामने आने के चार दिन बाद भी एनसीपीसीआर की तरफ़ से इस मामले पर कोई बयान नहीं आया है.
बीबीसी ने कई चाइल्ड-राइट्स एक्टिविस्ट्स या बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं से इस मामले में बात करने की कोशिश की.
कई कार्यकर्ताओं ने इस विषय पर बात करने से इनकार कर दिया और जिन्होंने बात की भी उनसे ये ज़ाहिर हुआ कि इस विषय पर राय बंटी हुई है.
'जो हुआ वो ग़लत था'
शेखर महाजन एक ग़ैर-सरकारी संस्था 'सहयोग' के कार्यकारी निदेशक हैं और बाल-अधिकारों के क्षेत्र से सक्रिय तौर पर जुड़े हुए हैं.
उनका कहना है कि भारतीय संस्कृति में गले मिलना या माथे पर चूमना या सिर पर हाथ रखना प्यार जताने के तौर पर देखा जाता है. "लेकिन किसी बच्चे से अपनी जीभ चूसने को कहना दलाई लामा को शोभा नहीं देता."
ये भी कहा जा रहा है कि जीभ को मुंह से बाहर निकालने को तिब्बती संस्कृति में एक अभिवादन के तौर पर देखा जाता है.
इस पर शेखर महाजन कहते हैं, "इस वीडियो में बात केवल जीभ बाहर निकालने भर की नहीं है. जीभ को चूसने के लिए कहा जा रहा है. आप देख सकते हैं कि बच्चा हिचकिचा रहा है. इस तरह की बात को सही नहीं माना जा सकता."
महाजन कहते हैं कि इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. वे कहते हैं, "जो हुआ है वो ग़लत था. एनसीपीसीआर को क़ानूनी सलाह लेने के बाद इस मामले में कुछ न कुछ कार्रवाई ज़रूर करनी चाहिए."
'स्थानीय संस्कृति के सन्दर्भ को समझना ज़रूरी'
डॉ मृदुला टंडन, साक्षी नाम की एक ग़ैर-सरकारी संस्था से जुड़ी हैं और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करती हैं.
वे कहती हैं कि सामान्य परिस्थितियों में वो ऐसे किसी भी व्यक्ति की निंदा करेंगी जो एक बच्चे से इस तरह की बात करता है लेकिन इस मामले को हमें स्थानीय संस्कृति के संदर्भ में लेना होगा.
वे कहती हैं, "जहां तक मैं समझती हूँ, तिब्बती संस्कृति में अपनी जीभ बाहर निकालकर अभिवादन किया जाता है. मैं स्थानीय रीति-रिवाजों से बहुत परिचित नहीं हूँ."
डॉ टंडन एक छोटे शहर से आए लड़के का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि वो एक बड़े महानगर में आकर लड़कियों को पश्चिमी कपड़ों या छोटे परिधानों में देखकर अचंभित हो जाता है.
वे कहती हैं, "इसका मतलब यह नहीं है कि जब वह किसी को देखता है तो उसे परेशान करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे चेतावनी दी जानी चाहिए कि इस तरह की जगह में उससे यह उम्मीद नहीं की जाती है."
डॉ टंडन का मानना है कि इस घटना का मतलब बच्चे का उत्पीड़न करना नहीं था.
वे कहती हैं, "सांस्कृतिक मानदंड को लेकर ग़लतफ़हमी की वजह से ऐसा हो सकता है. लेकिन ये बच्चे के लिए थोड़ा चौंकाने वाला हो सकता है. वहीं वीडियो में बच्चा हैरान होता नहीं दिख रहा है."
'कोई और होता तो प्रतिक्रिया कुछ और होती'
शांता सिन्हा एक स्वतंत्र चाइल्ड-राइट्स एक्टिविस्ट हैं. वे नेशनल कमीशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स की पहली अध्यक्ष के तौर पर भी काम कर चुकी हैं.
वे कहती हैं, "यह कृत्य अपने आप में काफ़ी अनुचित था, इसमें कोई संदेह नहीं है. लड़के से जीभ चूसने को कहना बिलकुल अनुचित था. जो हुआ उससे भले ही बच्चे और उसके माता-पिता को कोई समस्या न हो पर मुझे लगता है कि यह फिर भी अनुचित था."
शांता सिन्हा का मानना है कि ज़िला अधिकारियों या सरकार के स्तर पर इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया जा सकता था.
वे कहती हैं, "पॉक्सो अधिनियम के तहत इस मामले को देखा जा सकता है और आगे बढ़ाया जा सकता है. फिर अदालतें ये तय कर सकती हैं कि ये यौन शोषण था या नहीं."
शांता सिन्हा कहती हैं कि वो चाहती हैं कि एनसीपीसीआर इस मामले में हस्तक्षेप करे लेकिन वो इस बात से हैरान भी नहीं हैं कि एनसीपीसीआर ने ऐसा नहीं किया.
वे कहती हैं कि इस घटना पर जो प्रतिक्रियाएं आई हैं उन पर इस बात का असर साफ़ दिख रहा है कि दलाई लामा एक जाने-माने और सम्मानित व्यक्ति हैं.
साथ ही उनका कहना है कि जिस बच्चे का चेहरा उस वीडियो में दिखाया गया उसे इससे सदमा ज़रूर पहुँचा होगा.
वे कहती हैं, "मैं उम्मीद करती हूँ कि इससे उसके भविष्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. वीडियो में उसका चेहरा दिखाना बिलकुल ग़लत था."
पहले भी विवादों में घिरे हैं दलाई लामा
दलाई लामा को करुणा और शांति पर उनकी शिक्षाओं के लिए जाना जाता है. लाखों लोग उनका सम्मान और अनुसरण करते हैं.
साल 1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. साल 1959 में तिब्बत से भागने के बाद से वो भारत में रह रहे हैं.
पिछले कुछ वर्षों में कई विषयों पर उनकी कुछ विवादास्पद टिप्पणियों ने न केवल क्रोध और आलोचना को जन्म दिया है बल्कि समानता और समावेशिता पर उनके रुख़ पर सवाल उठाने और बहस करने के लिए भी कई लोगों को मजबूर किया है.
साल 2015 में बीबीसी के क्लाइव मायरी के साथ एक साक्षात्कार में दलाई लामा से पूछा गया था कि क्या अगली दलाई लामा एक महिला हो सकती हैं. उन्होंने अन्य बातों के साथ-साथ यह कहते हुए प्रतिक्रिया दी कि अगर कोई महिला दलाई लामा आती है तो उसे बहुत आकर्षक होना चाहिए.
जब 2019 में बीबीसी की रजनी वैद्यनाथन द्वारा यही सवाल उनसे किया गया तो दलाई लामा ने हंसते हुए जवाब दिया, "अगर कोई महिला दलाई लामा आती है तो उसे और आकर्षक होना चाहिए."
इन टिप्पणियों पर हंगामे के बाद दलाई लामा के कार्यालय ने माफ़ी मांगते हुए कहा था कि तिब्बती आध्यात्मिक नेता का मक़सद किसी का अपमान करना नहीं था और अपने पूरे जीवन में दलाई लामा ने "महिलाओं के वस्तुकरण का विरोध किया" और लैंगिक समानता का समर्थन किया था.
साथ ही बयान में ये भी कहा गया था कि कभी-कभी ऐसा होता है कि अचानक से कही गई कोई बात जो किसी एक सांस्कृतिक संदर्भ में मनोरंजक हो सकती है वो दूसरे सन्दर्भ में लाए जाने पर अनुवाद में अपना हास्य खो देती है.
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