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खालिस्तानी नेता से पाकिस्तान के लाहौर में हुई पुरानी मुलाक़ात की कहानी
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
शिरोमणि अकाली दल के लोकसभा सांसद सिमरनजीत सिंह मान ने खालिस्तान की मांग करने वाले अमृतपाल सिंह के बारे में कहा है कि उन्हें आत्मसमर्पण करने के बदले पाकिस्तान चले जाना चाहिए.
माना जाता है कि खालिस्तानी अलगाववादियों और पाकिस्तान के रिश्ते पुराने हैं.
29 सितंबर, 1981 को खालिस्तानी गुट 'दल खालसा' के संस्थापक गजिंदर सिंह उन पांच लोगों के लीडर थे जिन्होंने 111 यात्रियों और चालक दल के छह सदस्यों को ले जा रहे इंडियन एयरलाइंस के एक विमान का अपहरण कर लिया था और उसे लाहौर में उतरने के लिए मजबूर किया था.
उन्होंने जरनैल सिंह भिंडरावाले और खालिस्तान आंदोलन के कई अन्य सदस्यों की रिहाई की मांग की थी. पाकिस्तान की एक अदालत ने उन्हें और उनके अन्य चार साथियों को दोषी पाया और आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई. 14 साल जेल में बिताने के बाद 1994 को उन सभी को रिहा कर दिया गया था.
भारत में वो वांटेड की लिस्ट में काफ़ी ऊपर हैं. भारत सरकार ने पाकिस्तान से उन्हें वापस करने की मांग कई बार की है लेकिन पाकिस्तानी सरकार इस बात से इनकार करती है कि गजिंदर सिंह और उनके साथी पाकिस्तान में हैं.
पिछले साल सितंबर में सोशल मीडिया फ़ेसबुक पर उनकी एक तस्वीर आई थी जिससे ये पता लगा कि वो अब भी पाकिस्तान में ही हैं.
गजिंदर सिंह से मुलाक़ात
गजिंदर सिंह से मेरी मुलाक़ात महज़ संयोग था. मैं भारत के बंटवारे की 50वीं वर्षगांठ पर रिपोर्टिंग करने अगस्त 1997 में लंदन से पाकिस्तान गया हुआ था. इस सफर में लाहौर मेरा पहला पड़ाव था.
खालिस्तान आंदोलन और पंजाब में उग्रवाद पर कुछ साल की रिपोर्टिंग का अनुभव था इसलिए जब एक स्थानीय पत्रकार ने मेरी मुलाक़ात गजिंदर सिंह से कराने की पेशकश की तो मैं तैयार हो गया.
अगले दिन वो मेरे होटल में आए. मेरे सामने एक ऐसा व्यक्ति बैठा था जिसकी भारत को तलाश थी और जिसके बारे में पाकिस्तानी सरकार ये मानने से इनकार कर रही थी कि उसने गजिंदर सिंह को पनाह दे रखी है.
गजिंदर सिंह कहीं से भी किसी विमान का अपहरण करने वाले गुट के लीडर नहीं लग रहे थे. सिखों की पारंपरिक पोशाक पहने और बातों में सहजता दिखाते हुए वो कहीं से भी ऐसे चरमपंथी नहीं लग रहे थे जिनकी एक मुल्क को तलाश थी.
इससे पहले मैं कश्मीर और पंजाब में कई चरमपंथियों से मिल चुका था लेकिन गजिंदर सिंह उनसे अलग नज़र आ रहे थे. वो एक खालिस्तानी विचारक की छवि देने में कामयाब नज़र आ रहे थे.
गजिंदर सिंह ने बताया था कि उनका परिवार चंडीगढ़ में रहता है. इंटरव्यू के दौरान उनका भावनात्मक रूप भी सामने आया जब उन्होंने अपनी इकलौती संतान, अपनी बेटी के बारे में बात की.
उन्होंने बताया कि 1981 में विमान के अपहरण के समय उनकी बेटी एक साल की थी. उन्होंने कहा, "वो अब 17 साल की हो गई है और मुझे दुःख है कि मैंने उसे बड़ा होते नहीं देखा".
गजिंदर सिंह से थोड़ी देर तक बातचीत करने के बाद ही ये अंदाज़ा हो गया था कि उनके इतिहास का अध्ययन गहरा था और उनकी अंग्रेज़ी, पंजाबी, उर्दू और हिंदी भाषाओं पर अच्छी पकड़ थी.
उन्होंने भरोसे के साथ सिखों के लिए एक आज़ाद खालिस्तान देश की वकालत की. उनका तर्क था कि मुसलमानों को पाकिस्तान मिल गया और हिन्दुओं को भारत इसलिए सिखों को खालिस्तान न मिलना, "दक्षिण एशिया के इतिहास में सबसे बड़ा अन्याय" है.
हिंसा के इस्तेमाल को वो ग़लत मानने को तैयार नहीं थे. मैंने जब उनसे पूछा कि आप खालिस्तान आंदोलन के एक विचारक हैं तो वापस जाकर देश के नागरिकों के सामने अपनी बात क्यों नहीं रखते?
उनका जवाब था ये एक रणनीतिक फ़ैसला है और यहां रहकर भी वो आंदोलन चला रहे हैं. मैंने जब कहा कि एक विमान का अपहरण करके और बंदूक के ज़ोर पर आपका आंदोलन कामयाब कैसे हो सकता है तो उनका कहना था कि वो विश्व समुदाय का ध्यान पंजाब के मसले की तरफ़ दिलाना चाहते थे.
उनका कहना था कि भारत सरकार से इंसाफ की उन्हें और उनके साथियों को कोई उम्मीद नहीं है.
हिंसा का नया दौर
उस समय भारतीय पंजाब में हिंसा काफ़ी कम हो गई थी और कई जानकार ये कहने लगे थे कि आंदोलन की कमर तोड़ दी गई है.
मैं भी यही सोच रहा था लेकिन गजिंदर सिंह ने मुझे ये कहकर हैरान कर दिया कि आंदोलन ज़िंदा है और जल्द ही भारत के जम्मू इलाक़े में बम धमाकों का एक सिलसिला शुरू किया जाएगा.
इस बात को जताने के लिए कि उनके लोग पंजाब और जम्मू में सक्रिय हैं उन्होंने जम्मू शहर के तीन घरों के नाम और पते दिए और कहा कि मैं उनसे उनका नाम लेकर मिल सकता हूँ. मैंने उनसे जम्मू जाकर मुलाक़ात भी की, जिसका ज़िक्र आगे चलकर करेंगे.
गजिंदर सिंह से जब बातचीत ख़त्म हुई तो उनसे मिलने उनके कई सिख साथी आए. ये वो लोग थे जिन्होंने 1981 और इसके बाद 1984 के इंडियन एयरलाइंस के विमान के अपहरण के जुर्म में पाकिस्तानी जेलों में 12-14 साल गुज़ारे थे और अब वो जेल से बाहर रह रहे थे.
उनके कुछ साथी जर्मनी और यूरोप के अन्य देशों में चले गए थे. गजिंदर सिंह के साथियों में उनकी तरह पढ़े-लिखे लोग नहीं थे और वो तर्क के साथ बातचीत नहीं कर पाते थे.
इसके बाद गजिंदर सिंह चले गए. उनके सभी साथी मुझे मेरे होटल से कुछ दूर एक हॉलनुमा बड़े कमरे में ले गए. इसकी दीवारों पर वो अख़बार लगे हुए थे जिनमें पंजाब में पुलिस मुड़भेड़ में मारे गए सिखों की तस्वीरें और ख़बरें छपी थीं. इन्हीं पर आधारित ऑडियो और वीडियो कैसेट भी थे.
ये कमरा ब्रेनवाश कैम्प की तरह लगा, मुझे बताया गया कि उस कमरे में भारत से आए सिख जत्थों को लाया जाता है और बताया जाता है कि सिखों पर भारत में कितना अत्याचार हो रहा है.
चरमपंथी पिता-पुत्र की जोड़ी
उस हॉल के बाहर कुछ और सिखों से मुलाक़ात हुई जिनमें से कुछ नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर से आए हुए थे. एक पिता-पुत्र की जोड़ी से भी मिला जिनके नाम अब मुझे याद नहीं हैं. ये लोग कराची से आए थे.
उन्होंने मुझे बताया था कि वो दोनों भारतीय पंजाब में बम धमाकों में हिस्सा ले चुके हैं. वो अब अफ़सोस कर रहे थे कि अवैध रूप से अब वो पंजाब नहीं जा सकते क्योंकि अब सीमा पर तीन-लेयर की दीवार खड़ी कर दी गई है.
सीमा पर बैरियर लगाए जाने से पहले भारत सरकार हमेशा दावा करती थी कि सिख चरमपंथी पाकिस्तान से भारत की सीमा में घुस आते हैं और बाड़ के निर्माण के बाद यह लगभग बंद हो गया.
उन्होंने मुझसे कहा था कि वो बाड़ लगने के पहले और बाद अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए दिल्ली और पंजाब वैध रूप से पासपोर्ट लेकर जाया करते थे.
उनका कहना था कि दिल्ली की पार्लियामेंट स्ट्रीट पर पंजाब नेशनल बैंक में उनका एक अकाउंट भी था जिसमें 16 लाख रुपए जमा थे. मैंने खाते और रकम की तस्दीक नहीं की.
पिता की कहानी ये थी कि जब वो 12 साल के थे तो देश का बंटवारा हुआ था और दंगाइयों की भीड़ ने उनके माता-पिता की हत्या उनके सामने कर दी थी. वो बेहोश हो गए थे और जब उन्हें होश आया तो कराची में ख़ुद को एक मुस्लिम परिवार के बीच पाया, उस मुस्लिम परिवार ने उनका धर्म परिवर्तन नहीं किया और उनकी परवरिश एक सिख की तरह की और उनकी शादी भी एक सिख महिला से कर दी.
मुसलमानों के साथ उनका रिश्ता मिला-जुला था जिसमें प्यार और नफ़रत दोनों थे. वह एक भ्रमित व्यक्ति थे जिसका फ़ायदा शायद उन लोगों ने उठाया जो उन्हें पंजाब में बम धमाके करने भेजते थे. उन्होंने इस बात को स्वीकार भी किया कि उनका इस्तेमाल हुआ.
जम्मू के अनुभव
लंदन लौटने से पहले मैं गजिंदर सिंह के दिए पतों पर जम्मू पहुंचा. वो तीनों परिवार एक-दूसरे के क़रीब ही थे. वो संभ्रांत इलाक़ों में से एक था और शहर के बीचों-बीच था. ये तीनों परिवार अपनी कोठियों में रह रहे थे.
मुझे तीनों परिवारों में प्रवेश काफ़ी मुश्किल से मिला. जब मैंने गजिंदर सिंह का हवाला दिया तब मुझे अंदर आने दिया गया. इनमें से दो परिवार व्यापारी थे और एक जम्मू-कश्मीर सरकार का एक उच्च अधिकारी था जिसने मुझसे दोस्ती करने की कोशिश भी की.
ये तीनों परिवार खालिस्तान आंदोलन से जुड़े थे और एक आज़ाद खालिस्तान का सपना देख रहे थे. उनका बाद में क्या हुआ, मुझे इसकी जानकारी नहीं है.
इसके बाद मैं चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गया, जहां उस समय के पंजाब पुलिस चीफ़ पीसी डोगरा से मिलकर उन्हें बताना चाहता था कि गजिंदर सिंह ने फिर बम धमाके करने की योजना बनाने का दावा किया है. मुझे नहीं मालूम था कि उनके दावे में कितनी सच्चाई थी.
मैं पंजाब डीजीपी से मिल नहीं सका लेकिन अपने एक सहयोगी पत्रकार से सारी बातें साझा कीं. इसके बाद मैं जैसे लंदन वापस लौटा उसके कुछ दिनों के अंदर ही लगातार कई बम धमाके हुए.
जम्मू तवी में सियालदह एक्सप्रेस में भी बम धमाका हुआ जिसका ज़िक्र लाहौर में किया गया था. कुछ लोग मारे भी गए थे. बाद में चंडीगढ़ में मेरे साथी पत्रकार ने मुझे बताया कि उन्होंने मेरी बात पंजाब डीजीपी तक पहुंचा दी थी. शायद समय पर एक्शन लेने से कई जानें बचा ली गईं वरना जानों नुक़सान और ज़्यादा हो सकता था.
मुझे समझ में आ गया कि गजिंदर सिंह के दावे झूठे नहीं थे. मुझे ये भी अंदाज़ा हो गया कि वो भले ही पाकिस्तान में हों उनकी पहुंच भारत में थी.
मुझे ये भी लगा कि गजिंदर सिंह और उनके साथियों का पाकिस्तान में रहना, लाहौर में ब्रेन-वाशिंग सेंटर का होना और भारत में बम धमाकों का होना, इन सबके पीछे अकेले गजिंदर सिंह का हाथ नहीं हो सकता.
मुझे नहीं मालूम कि अब वो कहां हैं लेकिन छह महीने पहले उनकी फ़ेसबुक पेज पर एक तस्वीर आई थी जो पाकिस्तान में एक गुरुद्वारे के बैंकग्राउंड में ली गई थी जिससे ये अंदाज़ा लगता है कि वो अब भी पाकिस्तान में हैं.
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