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राहुल गांधी के मामले में क्या बीजेपी ने कांग्रेस के सामने परोस दिया है मुद्दा?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बात वर्ष 1975 की है, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अयोग्य पाया था और उनकी संसद की सदस्यता समाप्त करने का फ़ैसला सुनाया था.
राजनीतिक हलकों में ऐसा कहा जाता है कि इस फ़ैसले के बाद ही देश में आपातकाल लागू करने का इंदिरा गांधी ने मन बना लिया था.
हालाँकि इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ जो मामला था वो राहुल गाँधी के मामले से बिल्कुल ही अलग था. वो चुनाव लड़ने से संबंधित था.
राहुल गांधी की सदस्यता को लोकसभा सचिवालय ने ख़त्म किया है. जबकि इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ उनके प्रतिद्वंद्वी राज नारायण ने याचिका दायर कर चुनावों में धांधली का आरोप लगाया था.
राज नारायण की याचिका में आरोप था कि 'इंदिरा गांधी के चुनाव एजेंट यशपाल कपूर ने रायबरेली की सीट पर हुए चुनाव में धांधली की थी.'
इस मामले की चर्चा इसलिए भी है क्योंकि इंदिरा गांधी की संसद की सदस्यता को दो बार निरस्त किया गया था.
एक बार रायबरेली से चुनाव लड़ने के बाद और दूसरी बार चिकमंगलूर से जीतने के बाद.
लेकिन इन दो मामलों की बात इसलिए हो रही है क्योंकि 1977-78 में जब इंदिरा गांधी को बतौर सांसद बर्ख़ास्त किया गया था, तो उसके बाद 1980 में हुए आम चुनावों में उन्हें बम्पर जीत हासिल हुई थी.
कांग्रेस के साथ खड़े विपक्षी दल
वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि 'बावजूद इसके कि इंदिरा गांधी की सदस्यता को दो बार जिस तरह से निरस्त किया गया, वो राहुल गाँधी के मामले से बिलकुल अलग है, लेकिन राहुल गांधी के मामले में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी साफ़ तौर पर अब दबाव में दिखने लगी है.'
वो कहते हैं कि जिस तरह से सरकार के सभी मंत्री और बड़े नेता बयान दे रहे हैं, उससे भी ये संकेत साफ़ तौर पर जनता के बीच जा रहा है कि सरकार अदानी के मामले में दबाव में आ गई है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी की सदस्यता जिस तरह निरस्त की गई, उस पूरे घटनाक्रम ने उन विपक्षी दलों को भी कांग्रेस के साथ खड़ा कर दिया है, जिन दलों ने कांग्रेस से दूरी बनाई हुई थी.
मिसाल के तौर पर तृणमूल कांग्रेस, भारत राष्ट्र समिति, जनता दल (यूनाइटेड) और समाजवादी पार्टी ने संसद में चल रहे गतिरोध के दौरान अदानी के सवाल पर एकजुटता दिखाई थी.
लेकिन जब राहुल गांधी संसद में बोलने के सवाल पर सरकार को अपनी पार्टी के साथ घेर रहे थे, तो इन दलों ने ख़ुद को कांग्रेस से अलग रखना बेहतर समझा.
सदस्यता ख़त्म होने से दूसरे दल सोचने पर हुए मजबूर
कांग्रेस ने भी दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी के बाद आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ दिल्ली की सड़कों पर पोस्टरबाज़ी शुरू की थी.
लेकिन सोमवार को राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता ख़त्म करने को लेकर वैसे दलों ने भी राहुल का समर्थन किया जो उनकी आलोचना कर रहे थे.
सोमवार को संसद में राहुल गांधी के समर्थन में आम आदमी पार्टी भी नज़र आई. राहुल गांधी के कांग्रेस कार्यालय में शनिवार को हुए संवाददाता सम्मलेन के दौरान कहा था कि वो 'सावरकर नहीं' हैं. ये उनके सहयोगी दल शिवसेना को ठीक नहीं लगा.
शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राहुल गांधी के बयान की निंदा करते हुए उन्हें (राहुल गांधी) नसीहत दी कि वो 'उकसावे में ना आएं' और इस तरह के बयान ना दें क्योंकि उद्धव ठाकरे ख़ुद सावरकर को 'अपना आदर्श' मानते हैं.
इसके बावजूद उद्धव ठाकरे की शिवसेना राहुल गांधी के साथ खड़ी नज़र आई.
जयशंकर गुप्त कहते हैं कि राहुल गांधी की सदस्यता ख़त्म करने के मामले ने विपक्ष के दूसरे दलों को भी सोचने को मजबूर कर दिया है.
वो कहते हैं, "पहले विपक्ष के दल अपने अलग-अलग स्टैंड पर चलते रहे. लेकिन राहुल गांधी के प्रकरण के बाद अब उन्हें भी लगने लगा कि ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है.
एक निचली अदालत ने जिस मामले में राहुल गांधी को दोषी क़रार दिया और दो साल की सज़ा सुनाई, उसी मामले में उसी अदालत ने एक माह तक अपने आदेश को निलंबित रखने का फ़ैसला भी दिया.
लेकिन अगले ही दिन राहुल गांधी की संसद सदस्यता ख़त्म कर दी गई. इसके साफ़ संकेत हैं राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए कुछ भी संभव हो सकता है."
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'विपक्ष में जान डालने की कोशिश'
राहुल गांधी के संसद में बोलने की मांग पर जनता दल (यूनाइटेड) ने भी ख़ुद को अलग रखा था.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी खुलकर कुछ नहीं कह रहे थे. लेकिन सोमवार को पार्टी के राज्यसभा सांसद अनिल हेगड़े भी कांग्रेस के नेताओं के बुलाने पर विरोध के लिए आयोजित बैठक में शामिल हुए.
इस बैठक में सोनिया गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ-साथ कांग्रेस के सभी सांसदों ने काले कपड़े पहन रखे थे.
लेकिन अभी तक विपक्ष के जिन नेताओं ने राहुल गांधी के प्रकरण से ख़ुद को दूर रखा है, उनमें मायावती, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक शामिल हैं.
जनता दल (यूनाइटेड) के दिल्ली स्थित राष्ट्रीय सचिव नीरज ने बीबीसी बात करते हुए ये स्वीकार किया कि राहुल गांधी के प्रकरण ने 'विपक्ष में जान डालने' का काम किया है.
वो कहते हैं कि इसलिए विपक्ष के दल मतभेदों के बावजूद कांग्रेस के साथ आए हैं, क्योंकि "भारतीय जनता पार्टी सत्ता का दुरुपयोग कर रही है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कुचल रही है."
उनका कहना था कि बैंकों का पैसा लेकर विदेश भागने वालों में कोई 'अन्य पिछड़े वर्ग' के व्यापारी नहीं थे.
"लेकिन भाजपा इस पर तिकड़म कर रही है. एक तरफ़ शिक्षा के अधिकार के तहत पहली से लेकर आठवीं कक्षा के ग़रीब बच्चों की केंद्र सरकार ने छात्रवृत्ति ख़त्म कर दी है और दूसरी तरफ़ वो पिछड़ों के हिमायती होने का ढोंग भी कर रही है.
कांग्रेस का रुख़
कांग्रेस के नेता संजय निरूपम कहते हैं कि राहुल गांधी के मामले में भारतीय जनता पार्टी ने जल्दबाज़ी से काम लिया है.
वो कहते हैं कि जो कुछ हुआ उससे आम लोगों की धारणा भी बन गई है कि ग़लत हुआ है.
बीबीसी से बातचीत में संजय निरूपम कहते हैं, "एक तो ये आदेश ही अप्रत्याशित है. मानहानि के मामले में दो साल की सज़ा सुनाए जाने का ये देश के इतिहास का पहला मामला है. इन सब मामलों में दो या तीन महीनों की सज़ा या फिर सिर्फ़ फटकार लगाकर मामले को ख़त्म किया जाता है. लेकिन जिस तरह घटनाक्रम हुआ, उससे लोगों के बीच ये भी साफ़ होता चला गया कि राहुल गांधी के ख़िलाफ़ क़ानून की आड़ लेकर जानबूझ कर ऐसा किया गया."
लेकिन निरूपम का कहना था कि जिस काम में कांग्रेस को ज़्यादा सफलता नहीं मिल पा रही थी, वो काम भाजपा ने कर दिया.
वो कहते हैं, "हम स्वीकार करेंगे कि हम पूरे विपक्ष को एकजुट करने में असफल रहे थे. लेकिन जो कुछ हुआ उसने पूरी विपक्षी पार्टियों को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है. वो नेता, जिन्होंने कांग्रेस से दूरी बना ली थी वो भी अब राहुल गांधी के मुद्दे पर उनके साथ समर्थन में खड़े हो गए हैं. चाहे ममता बनर्जी हों, अरविंद केजरीवाल हों या केसी राजशेखर रेड्डी हों."
निरूपम का कहना था कि सूरत की निचली अदालत के फ़ैसले को उच्च न्यायलय में चुनौती दी जाएगी और उन्होंने उम्मीद जताई है कि अदालत के फ़ैसले के बाद लोकसभा सचिवालय को राहुल गांधी की सदस्यता को निरस्त करने वाला आदेश वापस लेना पड़ेगा.
आक्रामक तेवर के ज़रिए ख़ुद को पुनर्स्थापित करेगी कांग्रेस?
राजनीतिक हलकों में राहुल गांधी के उस बयान की चर्चा भी हुई जब उन्होंने कहा कि 'वो जेल जाने से नहीं डरते' और अगर उन्हें 'आजीवन संसद से अयोग्य भी क़रार कर दिया जाता है' तब भी वो 'लोकतंत्र को बचाने के लिए' बोलते रहेंगे और 'सरकार से सवाल' पूछते रहेंगे.
इस बयान की अलग-अलग तरह से व्याख्या की जा रही है. कुछ मानते हैं कि राहुल के बयान से उनके आक्रामक तेवर के संकेत मिल रहे हैं.
कुछ विश्लेषकों को लगता है कि राहुल गांधी की सदस्यता निरस्त होने और उसके बाद उनके आक्रामक तेवर से लगने लगा है कि कांग्रेस आक्रामक रवैये के ज़रिए ख़ुद को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करेगी.
राजनीतिक टिप्पणीकार विद्या भूषण रावत मानते हैं कि जो आज भाजपा कर रही है, वैसा कभी कांग्रेस भी किया करती थी.
उनका कहना है, "यूपीए के दूसरे कार्यकाल में सरकार के मंत्रियों ने जमकर मनमानी की. यही वजह है कि कांग्रेस को इसका संगठन के स्तर पर नुक़सान हुआ और लोगों के बीच उसकी साख भी कम होती दिखी. इसमें कोई शक़ नहीं कि राहुल गांधी ने कांग्रेस में जान डालने की कोशिश की है और वो कामयाब भी होते दिख रहे हैं."
बीबीसी से चर्चा करते हुए रावत कहते हैं कि 'भारत जोड़ो यात्रा' से ही राहुल गांधी ने सरकार को घेरने का काम शुरू किया.
उनका कहना था, "फिर जिस तरह से वो सदन में बोलते रहे और अदानी को लेकर जिस तरह सरकार को घेर रहे थे, उससे सत्तारूढ़ दल की असहजता बढ़ती ही जा रही थी.
राहुल के बयान के बाद इसके संकेत मिलने लगे हैं कि वो कोई भी क़ुर्बानी देने का मन बना चुके हैं. जेल जाने का भी मन बना चुके हैं. इससे कांग्रेस को फ़ायदा ही होता दिख रहा है.
कांग्रेस के लिए सिर्फ़ यही एक विकल्प था अपने अस्तित्व को बचाने का. और वो विकल्प भाजपा ने उसे थाली में परोस दिया. अब देखना होगा कांग्रेस इसका कितना फ़ायदा उठा पाती है."
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