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राहुल गांधी की संसद सदस्यता ख़त्म होने की टाइमिंग पर उठने वाले सवाल
- Author, चंदन सिंह राजपूत
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
साल 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान कर्नाटक के कोलार में दिए गए भाषण को लेकर सूरत की एक अदालत ने राहुल गांधी को दो साल की सज़ा सुनाई. इसके तुरंत बाद उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गई.
इसके बाद एक तरफ विपक्ष के कई नेता राहुल गांधी के समर्थन में उतरे, तो दूसरा तरफ सत्ताधारी बीजेपी के नेताओं ने कहा कि जो हुआ क़ानून के मुताबिक़ हुआ.
आपराधिक मानहानि के मामले में अधिकतम दो साल की सज़ा का प्रावधान होता है.
'स्वराज इंडिया' के अध्यक्ष योगेंद्र यादव राहुल गांधी की लोकसभा अध्यक्षता रद्द होने पर सवाल उठा रहे हैं. वो इसकी क्रोनोलॉजी की बात कर रहे हैं, वे राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में उनके साथ शामिल रहे हैं.
योगेंद्र यादव की नज़र में क्रोनोलॉजी
योगेंद्र यादव कहते हैं, "राहुल गांधी ने जो भाषण दिया था उसे आप कह सकते हैं कि वो तंज था, व्यंग्य था, आप कह सकते हैं ज़रूरत से ज़्यादा तीखा था. लेकिन उसके बाद जो हुआ आप उसे समझिए. 16 अप्रैल को बीजेपी के एक विधायक पूर्णेश मोदी ने इस मामले को लेकर मानहानि की शिकायत की. दो मई को इस मामले की एफ़आईआर दायर हुई और मुक़दमा शुरू हुआ."
मुक़दमे के दौरान पूर्णेश मोदी ने कोर्ट से कहा कि जब-जब मुक़दमे की सुनवाई हो तब आदेश होना चाहिए कि राहुल गांधी सुनवाई के दौरान हाज़िर हों.
लेकिन तत्कालीन जज ने हर पेशी में राहुल गांधी के हाज़िर रहने का आदेश देने से इनकार कर दिया. इसके बाद हाई कोर्ट ने इस मामले में स्टे ऑर्डर दे दिया.
योगेंद्र यादव कहते हैं, "एक बार किसी मामले में स्टे लग जाता है, फिर सालों तक मामला रुक जाता है लेकिन पूर्णेश मोदी का मुक़दमा अचानक तेज़ी से चलने लगा, और चला ही नहीं बल्कि घोड़े की रफ़्तार से दौड़ने लगा."
लोकसभा में राहुल गांधी के सात फ़रवरी के भाषण को योगेंद्र यादव अहम मानते हैं, "इस भाषण के बाद से 16 फ़रवरी को याचिकाकर्ता पूर्णेश मोदी ने हाईकोर्ट से स्टे वापस लेने की मांग की. 27 फ़रवरी को मामले की सुनवाई फिर से शुरू हुई, जबकि आम तौर पर इस देश में किसी मुक़दमे की दोबारा सुनवाई होने में सालों साल लग जाते हैं लेकिन यहाँ पर 10 दिन के भीतर सुनवाई शुरू हो गई. केवल सुनवाई शुरू नहीं हुई बल्कि एक नए जज इसकी सुनवाई करने लगे जिनकी हाल ही में प्रोमोशन की घोषणा हुई है."
वो कहते हैं, "आप कह सकते हैं कि ये सामान्य बात है या असामान्य बात है. मैं उनके जजमेंट का उनके प्रमोशन से कोई संबंध नहीं जोड़ रहा लेकिन अरुण जेटली ने एक बार संसद से ऐसा कुछ कहा था. इसलिए उसका ज़िक्र कर रहा हूँ."
अरुण जेटली ने संसद में कहा था कि जजों को मिलने वाला किसी भी तरह का लाभ उनके अगले या पिछले फ़ैसलों से जुड़ा हो सकता है.
बीजेपी का नज़रिया अलग
बीजेपी के प्रवक्ता और वरिष्ठ वकील अमिताभ सिन्हा ने बीबीसी से कहा, "पहले हारने वाला पक्ष इस बात की मर्यादा रखता था कि हारने के बावजूद पब्लिक में कोई टिप्पणी नहीं करता था लेकिन भारत में अब एक नया ट्रेंड शुरू हुआ कि न्यायपालिका अगर आपके हक़ में फ़ैसला नहीं देती है, तो न्यायपालिका पर ही सवाल कर दिए जाते हैं."
वो आगे कहते हैं, "ये एक इंसानी फ़ितरत है कि जो जीतता है वो खुश होता है और जो हार जाता हैं वो अपनी कुंठा निकालता है. इसी कुंठा की वजह से हारने वाला पक्ष न्यायपालिका के ऊपर प्रश्नचिन्ह खड़े करता है."
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ आए कोर्ट के आदेश के बाद कहा था कि हमें पता था कि ऐसा होने वाला है, जज को बदला जा रहा था.
इस बयान को लेकर अमिताभ सिन्हा कहते हैं, "न्यायपालिका के तबादलों में सरकार का कोई रोल नहीं होता, चाहे वह ज़िला न्यायालय हो, हाईकोर्ट हो या सुप्रीम कोर्ट हो. हालांकि इस विषय में काफ़ी बातचीत हो रही है. आज के समय का सच ये है कि न्यायपालिका पूरी तरह से स्वायत्त है और जजों की नियुक्ति में राज्य या केंद्र की कोई भूमिका नहीं होती है."
तुरंत फ़ैसला और तुरंत कार्रवाई
योगेंद्र यादव कहते हैं, "नए जज 27 फ़रवरी को मामले को सुनना शुरू करते हैं और 23 मार्च को मामले में आदेश आ जाता है. इस मामले में राहुल गांधी को अधिकतम संभव सज़ा देते हैं, आदेश आने के बाद लोकसभा सचिवालय 24 घंटे के भीतर इस मामले को संज्ञान में लेते हुए राहुल गांधी की सदस्यता रद्द कर देता है."
अमिताभ सिन्हा कहते हैं, "रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट के सेक्शन 8 (सी) में स्पष्ट तरीके से बताया गया है कि किसी भी स्तर पर चुने हुए जनप्रतिनिधि को यदि दो साल या दो साल से ज़्यादा की सज़ा हो जाती है तो फै़सला सुनाए जाने के साथ ही वह सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है. उसके आगे की जो भी तक़नीकी कार्रवाई है वो लोकसभा सचिवालय कभी भी कर सकता है, इसमें टाइमिंग देखने जैसा कुछ नहीं है. स्पीकर के ऑफिस से नोटिफिकेशन जारी होने के पहले ही क़ानूनी तौर पर कोर्ट के आदेश के बाद राहुल गांधी सदस्यता खो चुके थे."
स्टे लगा हुआ केस अचानक शुरू कैसे हो गया?
स्टे लगे होने के बावजूद अचानक मामले के खुलने पर योगेंद्र यादव सवाल खड़े करते हैं.
वो कहते हैं, "ये केस एक साल से रूका हुआ था तब किसी को इसकी चिंता नहीं थी तो अचानक कैसे इसकी चिंता शुरू हो गई. ये केस ठंडे बस्ते में था तो अचानक कैसे शुरू हो गया. केस से स्टे क्यों हटाया गया?"
योगेंद्र यादव इस मामले की सुनवाई की ज़ल्दबाज़ी की ओर इशारा करते हैं.
वो कहते हैं, "आम तौर पर अगर मामले की सुनवाई हो तो हम उम्मीद करते हैं कि तत्परता हो, इसकी हमें शिकायत तो नहीं करनी चाहिए लेकिन यहाँ तो मामले को एक महीने में ही सुन लिया गया."
अमिताभ सिन्हा का कहना है, "आजकल कोर्ट में मुवक्किल और उनके वकील की मदद से किसी भी मामले सुनवाई में तेज़ी लाई जा सकती है. ये एकपक्षीय आदेश नहीं था, इस मामले में दोनों पक्षों ने अपनी बात रखी और फिर फै़सला दिया गया. ऐसे आपराधिक मानहानि के मुकदमों में कोर्ट आम तौर पर माफ़ी मांगने का मौका देती है. राहुल गांधी को भी मौक़ा दिया गया."
राहुल गांधी को इतनी अभूतपूर्व सज़ा क्यों
योगेंद्र यादव कहते हैं, "जानकार बताते हैं कि मानहानि के मामले में आम तौर पर या तो सज़ा होती नहीं है, अगर होती है तो बहुत सांकेतिक सज़ा होती है."
योगेंद्र यादव कहते हैं, "दो साल की सज़ा देने का अर्थ ये है कि मानहानि मामले में राहुल गांधी का अपराध सबसे संगीन है, संयोग की बात ये है किसी भी आपराधिक मामले में दो साल की सज़ा ही संसद से सदस्यता रद्द होने का मानदंड भी है. अगर राहुल गांधी को दो साल से थोड़ी कम सज़ा दी जाती तो राहुल गांधी की सदस्यता को ख़त्म नहीं किया जा सकता था. ये कितना दिलचस्प संयोग है."
वहीं अमिताभ सिन्हा कहते हैं, "ये इंडिपेंडेंट कोर्ट का इंडिपेंडेंट फै़सला है और आईपीसी के प्रावधानों के मुताबिक़ है. आईपीसी के धारा 499 और 500 में इस बात को कहा गया है कि इसके लिए दो साल तक की सज़ा हो सकती है. एक बात ये भी है कि ये कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है सज़ा कितनी देता है, हो सकता है कोर्ट इनके(राहुल गांधी) घमंड से नाराज़ हो गया हो."
वो कहते हैं, "कोर्ट ने इन्हें दो बार माफ़ी मांगने के लिए कहा, कुछ लोगों के नाम के लिए उन्होंने पूरे समाज को टार्गेट किया है, तो अब सज़ा को भुगतें."
राहुल गांधी की संसद की सदस्यता को ख़त्म करने को लेकर बीजेपी का कहना है कि अगर किसी आपराधिक मामले में सज़ा मिल जाती है तो इसमें संसद की सदस्यता रद्द होना नियमों के अनुसार है.
योगेंद्र यादव कहते हैं, "इसमें दो पेंच हैं. पहला ये है कि आर्टिकल 103 के मुताबिक़ अगर किसी भी कारण से किसी सांसद की सदस्यता रद्द हो जाती है तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को इस बारे में एक आदेश जारी करना पड़ेगा,आदेश जारी करने से पहले राष्ट्रपति चुनाव आयोग से इसकी राय लेंगे."
"दूसरा पेंच ये है कि इससे पहले जितने भी मामलों का हवाला दिया जा रहा है, उन सबमें नोटिस जारी होने से पहले कम से एक-दो महीने का वक़्त दिया गया. आदेश आने और नोटिस आने के बीच में एक से डेढ़ महीने का समय दिया जाता है. ऐसा तो कुछ नही हुआ? राय कहाँ ली गई?"
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(योगेंद्र यादव के विचार उनके वीडियो ब्लॉग से लिए गए हैं)
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