You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
रविदास जयंती: रैदासियों का कुंभ जहां सजता है आस्था का मेला
- Author, विक्रांत दुबे
- पदनाम, वाराणसी से बीबीसी हिंदी के लिए
संत गुरु रविदास की 646 वीं जयंती पर उनकी जन्मस्थली वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुँचे हैं.
एक तरफ़ तो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लाखों आस्थावान लोग इस भीड़ का चेहरा हैं तो दूसरी तरफ़ विदेशों में रहने वाले रैदासियों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ रही है.
माघ पूर्णिमा के दिन सन् 1398 में वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर गांव में संत रविदास का जन्म हुआ था. उनके अनुयायियों ने जन्मस्थली पर एक मंदिर का निर्माण कराया है. यहां मत्था टेकने के लिए हर साल लाखों की संख्या में देश विदेश से रैदासी आते हैं.
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) से सटे इस गांव में उमड़ी भीड़ को देखकर अनुयायियों में संत के प्रति आस्था का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
नब्बे के दशक से यहाँ आने वालों की भीड़ बढ़नी शुरू हुई. दो हज़ार के दशक में यूपी में बनी मायावती की सरकार ने इसका राजनीतिक महत्व बढ़ाने के साथ ही जन्मस्थली को रैदासियों के लिए प्रभावशाली केंद्र का भी स्वरूप दिया.
लिहाज़ा विदेशों में रहने वाले रैदाससियों के आने की संख्या भी बढ़ी है.
लगातार 16वें साल पहुंचे
हॉलैंड से आयी नवविवाहिता चरण बदन बग्गा कहती हैं, "ये हमारे गुरु की ही कृपा है कि आज हम यहां हैं. गुरु की जन्म्स्थली पर आकर मैं जीवंत हो उठी हूं. एक अजीब सी फ़ीलिंग होती है. यहां आकर सब कुछ भूल गयी हूं. तक़रीबन हर किसी के मन में संत के प्रति कुछ ऐसा ही भाव है."
कुछ इसी तरह की ख़ुशी 41 साल से दुबई में रह रहे फ़र्नीचर कारोबोरी रामपाल को भी है. संत रविदास के दरबार में हाज़िरी लगाते हुए यह उनका 16वां साल है.
रामपाल कहते हैं कि यहां मत्था टेकने पर उन्हें एक अजीब सा सुकून मिलता है.
वो कहते हैं कि यहां आने का मक़सद गुरु के चरणों में शीश नवाना तो है ही, इसके साथ उन्हें अपने समाज के लोगों की सेवा और उनके लिए कुछ बेहतर करने का जज़्बा भी उन्हें यहां आने की प्रेरणा देता है.
बनारस का दूसरा स्वर्ण मंदिर?
संत रविदास जन्मस्थली में मत्था टेकने आने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. हर उम्र के लोगों की अपने गुरु में आस्था है.
पिछले कुछ साल में संत रविदास का मंदिर परिसर भव्य हुआ है. मंदिर के शिखर को संत के अनुयायियों ने स्वर्ण मंडित करा दिया.
मंदिर में 130 किलो के सोने की पालकी, 35 किलो के सोने का दीपक और तक़रीबन इतने ही वज़न का सोने की छतरी भी है.
यह सब गुप्तदान के ज़रिये हो रहा है. मंदिर को बनारस के दूसरे स्वर्ण मंदिर के रूप में देखा जा रहा है.
संत रविदास जन्मस्थली में प्रबंधक की भूमिका निभा रहे रणबीर सिंह बताते हैं कि हर साल गुरु के दर्शन के लिए आने वालों की संख्या बढ़ रही है.
उनके अनुसार इस साल तक़रीबन पांच लाख श्रद्धालुओं ने हाज़िरी लगाई है.
समाज को एकजुट करना है मक़सद
संत रविदास ने समाज में व्याप्त ऊंच-नीच, अंधविश्वास, पांखड आदि बुराइयों को ख़त्म कर एक समभाव समाज की बात की थी. इसका उन्हें ख़ासा विरोध झेलना पड़ा था.
युवा रैदासी जालंधर से आये सुखविंदर कहते हैं, "हम अपने लोगों को सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक पहलुओं के प्रति अवगत कराते हैं."
"समाज के लोगों को हर तरह से मज़बूत करने का संदेश हम यहां से लेकर जाते हैं, जिससे कि समाज में इस तरह की बुराइयों का अंत हो सके."
वो कहते हैं, "शायद इसी का परिणाम है कि जाति का बंधन टूट रहा है. लोग अपने अधिकारों के प्रति अवेयर हो रहे हैं."
पंजाब मूल के ही दुबई में रह कर रोज़ी रोटी कमा रहे मनजीत पिछले 25 सालों से सीर गोवर्धन आ रहे हैं.
मनजीत कहते हैं, "हमारे गुरु संत रविदास गुरुमहाराज की शिक्षा थी कि समाज के हर व्यक्ति को 'कुल्ली गुल्ली जुल्ली' (रोटी कपड़ा और मकान) मिले."
कनाडा में रह रहे एनआरआई रतन सिंह कहते हैं, "हमारे गुरु ने छोटे बड़े में भेदभाव नहीं किया. जातिवाद के ख़िलाफ़ संदेश दिया तो हम उनके अनुयायी भी उन्हीं के बताये रास्ते पर चल रहे हैं."
ये भी पढ़ें -
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)