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सिद्दीक़ कप्पन की ज़मानत के लिए किसी ने ज़मीन के काग़ज़ दिए तो किसी ने गाड़ी के
- Author, अमन द्विवेदी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल के पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन 28 महीनों बाद जेल से बाहर निकले तो सबसे पहले अपने परिवार और मीडिया से मिले. साथ ही वो उन दो लोगों से भी मिले जिन्होंने उनको जेल से बाहर लाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी.
5 अक्टूबर, 2020 को हाथरस गैंगरेप मामले की रिपोर्टिंग करने उत्तर प्रदेश जा रहे सिद्दीक़ कप्पन को राज्य पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था और उन पर यूएपीए लगाया था.
जेल से बाहर आने पर सिद्दीक़ कप्पन ने जिन दो लोगों से मुलाक़ात की उनमें से एक नाम डॉ. अलीमउल्ला ख़ान का है, जो उन्हें जेल लेने आए थे.
तो दूसरे थे कुमार सौवीर जो कप्पन का इंतज़ार होटल की लॉबी में कर रहे थे.
डॉ. अलीमउल्ला ख़ान पेशे से लेखक और पत्रकार हैं तो कुमार सौवीर भी बीते 43 सालों से उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.
ये दोनों अपने फ़ैसले को लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का एक हिस्सा बताते हैं. तो सवाल है कि क्या कुमार सौवीर कप्पन को पहले से जानते थे?
और क्या वे इससे पहले कभी सिद्दीक़ कप्पन से मिले थे?
इन सवालों के जवाब में कुमार सौवीर बीबीसी से कहते हैं, "ढाई साल पहले हाथरस की घटना के बाद सिद्दीक़ कप्पन को गिरफ़्तार किए जाने की ख़बर टीवी और अख़बारों में देखने पर उनके नाम से परिचित हुआ. उससे पहले न तो मैं सिद्दीक़ कप्पन को जानता था और न ही कभी उनसे पहले मिला था."
क्या डॉ. अलीमउल्ला कप्पन को पहले से जानते थे?
कप्पन को पहले से जानने के सवाल पर डॉ. अलीमउल्ला ख़ान कहते हैं, "मैं हाथरस की घटना से पहले भी सिद्दीक़ कप्पन को जानता था. एक दो बार दिल्ली में सिद्दीक़ कप्पन से मुलाक़ात हुई थी. लेकिन कोई ख़ास व्यावहारिक परिचय नहीं था."
सिद्दीक़ कप्पन की ज़मानत क्यों ली?
इस पर कुमार सौवीर कहते हैं कि मुझे पूरी तरह से भरोसा था की कप्पन इस मामले में निर्दोष हैं तो मैंने तय किया की मैं कप्पन के साथ खड़ा रहूंगा.
डॉ. अलीमउल्ला ख़ान कहते हैं, "अति-राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ बनने के लिए उन्होंने सिद्दीक़ कप्पन की ज़मानत ली है, क्योंकि जब देश में पत्रकारों, समाज सेवकों और लेखकों को सरकार के ग़लत कामों को उजागर करने पर जेल में डाला जाने लगेगा तो किसी को तो आवाज़ बनना पड़ेगा."
23 दिसंबर को मिली ज़मानत, बाहर निकलने में डेढ़ महीने कैसे लगे?
इस सवाल पर कुमार सौवीर कहते हैं, "मैं वेरिफ़िकेशन के लिए पहले 6 जनवरी को कोर्ट गया फिर 8 को गया फिर 13 जनवरी को भी गया. उसके बाद भी पुलिसवालों ने मुझे परेशान किया. मुझे ब्रेन स्ट्रोक था मैं एम्स में एडमिट था. उसके बाद भी वो मुझे थाने बुला रहे थे. मैंने मना किया तो कहा की पेपर खाली भेज देंगे. मेरी प्राथमिकता कप्पन की ज़मानत थी. तो मैं फिर से थाने गया."
63 वर्षीय कुमार सौवीर ज़मानत के बाद हुई रिहाई में देरी पर सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं, "ज़मानत लेने के 6 दिन बाद कप्पन को जेल से रिहा किया गया. कभी ये कहा जाता कि पेपर अदालत की तरफ़ से नहीं मिले तो कभी ये कि पुलिस की तरफ़ से नहीं आया. ये बहुत ही दुखद स्थिति है. सुप्रीम कोर्ट को देखना चाहिए कि न्याय प्रक्रिया को कैसे धीमा किया जा रहा है."
वहीं डॉ. अलीमउल्ला ख़ान कहते हैं, "जब हालात इतने ख़राब हो जाएं कि लिखने पढ़ने की आज़ादी पर रोक लगाई जाने लगे, तो उसका प्रतिरोध होना चाहिए. जब हम प्रतिरोध करते हैं तो हमें ये पता होना चाहिए कि यह हमारे साथ भी हो सकता है."
वो कहते हैं, "जब ज़मानत लेने के समय हमारा पुलिस वेरिफिकेशन हो रहा था उस वक़्त हमसे भी कहा गया था, लेकिन हम लोकतंत्र को बचाने के लिए और नागरिकों के अधिकारों के लिए लड़े हैं और आगे भी लड़ेंगे."
अधिकारों की लड़ाई में सब कुछ दांव पर क्यों लगाया?
कुमार सौवीर ने सिद्दीक़ कप्पन की 1 लाख रुपये के बेल बॉन्ड के लिए अपनी खेती की ज़मीन के पेपर लगाए हैं तो डॉ. अलीमउल्ला ख़ान ने अपनी चार पहिया गाड़ी के काग़ज़ात जमा किए हैं.
लाखों की ज़मीन के पेपर क्यों जमा किए?
इस पर कुमार सौवीर कहते हैं, "हम नहीं चाहते कि पैसों की कमी का सवाल आए और जेल से रिहाई में देरी लगे इसलिए बक्शी का तालाब इलाके की अपनी पूरी ज़मीन के पेपर जमा कर दिए."
जब इन दोनों पत्रकारों से ये पूछा गया कि सिद्दीक़ कप्पन के जेल से बाहर आने पर उनसे और उनके परिवार से मिलकर कैसा लगा?
तो कुमार सौवीर कहते हैं, "एक पत्रकार का काम होता है किसी से मिलकर उसके हाव-भाव, चेहरे और बातों को देखकर आदमी के अंदर की सच्चाई का पता लगाना और कप्पन की बातों से, व्यवहार से मुझे यकीन है कि उन पर लगे आरोप झूठे थे."
कुमार सौवीर ईडी के तरफ़ से लगाए गए मनी लॉन्ड्रिंग के मुक़दमे पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "सिद्दीक़ कप्पन के बैंक अकाउंट में ईडी को केवल 45 हज़ार रुपये मिले. 45 हज़ार के रुपये को मनी लांड्रिंग के रूप में कैसे देख सकते हैं."
डॉ. अलीमउल्ला ख़ान दायर मुक़दमों पर कहते हैं, "ये पूरी तरह से सरकार की तरफ़ से अपने गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए किया गया दमन है. ईडी के केस में 5 हज़ार रुपये का ट्रांजैक्शन (खाते से लेन देन) है जो कि अपने आप में एक मज़ाक है. 5 हज़ार रुपये पर ईडी का केस कहां बनता है."
दिसंबर 2022 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कप्पन को ज़मानत देते हुए कहा था कि उनके अकाउंट में पांच हज़ार के ट्रांसफ़र के अलावा किसी तरह का अन्य ट्रांसफ़र नहीं हुआ है. अलीमउल्ला ख़ान उसी का संदर्भ दे रहे थे.
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