पीएम मोदी की छवि को नुक़सान पहुंचाने के लिए विपक्ष ने चलाया नेगेटिव कैंपेन: बीजेपी - प्रेस रिव्यू

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अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी ने कहा है कि विपक्ष ने 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत रूप से' नुक़सान पहुंचाने के लिए नकारात्मक अभियान चलाया, लेकिन उनकी कोशिशों को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने बेअसर साबित किया.

बीजेपी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मीडिया को पार्टी के राजनीतिक संकल्प के बारे में बताया.

उन्होंने कहा, "विपक्ष ने एक नकारात्मक अभियान चलाया था जिसमें व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री को नुक़सान पहुंचाने के लिए अपमानजनक भाषा और नकारात्मक लहजा इस्तेमाल किया गया.

कई मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे और उन्होंने अपनी टिप्पणी से उन प्रयासों को नाकाम साबित किया- चाहे वो रफ़ाल का मुद्दा हो, नोटबंदी का मामला हो, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट हो या फिर आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को आरक्षण देने की बात हो."

उन्होंने कहा, "पीएम मोदी के देश को लेकर जो नेक और सच्चे इरादे हैं, उस पर कोर्ट ने मुहर लगाई. प्रधानमंत्री एक ऐसी साफ़-सुथरी छवि वाले नेता साबित हुए जो देश के लिए काम करते हैं."

पार्टी के इस राजनीतिक संकल्प को केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने पेश किया और इसका समर्थन उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, कर्नाटक बीजेपी के वरिष्ठ नेता गोविंद करजोल ने किया. इस संकल्प में इसे लेकर भी पीएम मोदी की तारीफ़ की गई कि उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की साख बढ़ाई है.

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बीजेपी

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इस साल होने वाले नौ राज्यों के चुनाव में बीजेपी की जीत की तैयारी- नड्डा

बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को लेकर ही द हिंदू में छपी ख़बर में कहा गया है कि पार्टी ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि साल 2023 में होने वाले कुल नौ विधानसभा चुनावों में बीजेपी की ही जीत होनी चाहिए और साल 2024 में होने वाले आम चुनाव के लिए इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव का ख़ास महत्व है.

बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि पार्टी को "उन राज्यों में सत्ता में लाने के लिए काम करना होगा जहां वह विपक्ष में है और जहां वह सत्ता में है, उसे पार्टी के लिए अभेद्य क़िला बनाना होगा."

इस साल त्रिपुरा, नगालैंड, मेघालय, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिज़ोरम और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं.

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सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में राजनीतिक दख़ल नहीं होने देगा

कोलकाता से प्रकाशित होने वाले अख़बार द टेलीग्राफ़ के पहले पन्ने पर छपी ख़बर कहती है कि सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति के लिए अपनाई जाने वाली प्रणाली कॉलेजियम में किसी भी तरह का 'राजनीतिक' दख़ल नहीं होने देगा.

अख़बार टेलीग्राफ़ ने एक 'विश्वसनीय सूत्र' के हवाले से ये जानकारी दी है. बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार लंबे वक्त से कॉलेजियम में सरकार के प्रतिनिधि को शामिल करने की बात कर रही है.

एक अन्य सूत्र ने अख़बार से बात करते हुए कहा, "एक बार पांच जजों की बेंच ने नेशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन यानी एनजेएसी को रद्द कर दिया है तो कोई सवाल ही नहीं उठता कि इन न्यायिक फ़ैसलों पर कोई प्रशासनिक कार्रवाई की जाए. ये उम्मीद रखना कि कॉलेजियम इसे अपना लेगी ये किसी व्यक्ति कि न्यायिक मामलों की समझ पर सवाल उठाता है."

बीते दिनों कई मीडिया रिपोर्ट्स सामने आईं जिनमें कहा गया कि 6 जनवरी को क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने भारत के चीफ़ जस्टिस को एक पत्र लिखा था जिसमें कॉलेजियम में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि को शामिल करने की अपील की गई है.

सूत्र ने अख़बार से कहा कि "इस तरह के पत्र 2014, 2016. 2017, 2018 और 2019 में भी चीफ़ जस्टिस को लिखे जा चुके हैं."

कॉलेजियम भारत के चीफ़ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों का एक समूह है. ये पाँच लोग मिलकर तय करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में कौन जज होगा. हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति भी कॉलेजियम की सलाह से होती है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस, हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस और राज्य के राज्यपाल शामिल होते हैं.

केंद्र सरकार साल 2014 में ही संविधान में 99वाँ संशोधन करके नेशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन (एनजेएसी) अधिनियम लेकर आई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के मूल ढांचे में परिवर्तन बताते हुए साल 2015 में रद्द कर दिया था.

गूगल

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सुप्रीम कोर्ट का गूगल से सवाल- भारत और यूरोप के लिए अलग-अलग मानक क्यों?

अंग्रेज़ी अख़ाबर बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अमेरिका की सर्च इंजन कंपनी गूगल से पूछा कि भारत में एंड्रॉयड डिवाइस के मानक यूरोप से अलग क्यों हैं?

कोर्ट भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) के आदेश के ख़िलाफ़ गूगल की अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसके तहत गूगल पर एंड्रॉयड मार्केट में अपनी प्रभावी स्थिति का दुरुपयोग करने के कारण उस पर 1,338 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है.

गूगल के पास सीसीआई के निर्देशों का पालन करने के लिए तीन महीने का समय है और ये समयसीमा 19 जनवरी को पूरी हो रही है.

सीसीआई की तरफ़ से पैरवी कर रहे भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एन वेंकटरमन ने कहा, "गूगल ने सीसीआई के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दिसंबर में समयसीमा समाप्त होने से एक दिन पहले याचिका दायर की. गूगल अपने भारतीय ग्राहकों और दूसरे देशों के ग्राहकों के बीच भेदभाव कर रहा है."

अदालत ने गूगल से यह स्पष्ट करने के लिए कहा कि क्या वह भारत में वही नियम लागू करेगी जैसा कि उसने विदेशों में किया था और क्या कंपनी जो कर रही थी वो सीसीआई के निर्देशों के अनुरूप था या नहीं.

इस मामले पर बुधवार को फिर से सुनवाई होगी.

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