नीतीश कुमार के जनसंख्या वाले बयान पर बिहार में सियासत गर्म

नीतीश कुमार

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इमेज कैप्शन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्य में 'समाधान यात्रा' कर रहे हैं.
    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

बिहार की सियासत का ज़ुबानी घमासान हर रोज़ एक नया रंग ले रहा है. ताज़ा विवाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक बयान को लेकर शुरू हुआ है.

नीतीश कुमार ने एक ढंग से बढ़ती आबादी के लिए महिलाओं के शिक्षित न होने से जोड़ा था. उन्होंने कहा था कि अगर महिलाएं पढ़ी होंगी तभी समस्या का हल होगा.

लेकिन इसके लिए नीतीश कुमार ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, उसे लेकर बीजेपी नीतीश कुमार पर हमलावर है और उनके बयान को महिलाओं का अपमान बता रही है.

नीतीश कुमार इन दिनों बिहार में 'समाधान' यात्रा कर रहे हैं. इसमें वो राज्य के अलग-अलग ज़िलों में सरकारी योजनाओं की समीक्षा कर रहे हैं. इस यात्रा में जनता की समस्या का समाधान भी ज़मीनी स्तर पर तलाशा जा रहा है.

यात्रा के दौरान शनिवार को वैशाली में सीएम नीतीश कुमार की ज़ुबान से कुछ ऐसा निकल गया जो 'समाधान' यात्रा के दौरान एक समस्या बन गई.

इसी दौरान उन्होंने कहा, "महिलाएं पढ़ लेंगी तभी ये प्रजनन दर घटेगा. असली चीज़ तो वही है...मर्द रोज़ रोज़...अगर महिलाएं पढ़ी होती हैं तो उनको सब चीज़ का ज्ञान होता."

बीजेपी नीतीश कुमार से माफ़ी मांगने की मांग कर रही है. बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी ने ट्वीट कर इसे अभद्र और लिंग के आधार पर भेदभाव वाला बयान बताया है.

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विरोध की राजनीति या नीतीश की ज़ुबान फ़िसली?

बिहार विधान परिषद में विरोधी दल के नेता सम्राट चौधरी ने ट्वीट किया है, "मुख्यमंत्री श्री कुशासन कुमार जी ने जिन अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया वह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है. ऐसे शब्दों का प्रयोग कर वह मुख्यमंत्री पद की गरिमा को कलंकित कर रहे हैं."

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बीजेपी के आरोपों पर जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने भी पटलवार किया है. नीरज कुमार का आरोप है कि बीजेपी बढ़ती जनसंख्या को केवल धर्म के नज़रिए से देखती है इसलिए उसे जनसंख्या रोकने के लिए शिक्षा की ज़रूरत महसूस नहीं होती.

नीरज कुमार का कहना है, "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बातों पर बीजेपी की प्रतिक्रिया वोट की राजनीति है. दरअसल बीजेपी बढ़ती जनसंख्या को धार्मिक उन्माद की तरफ़ ले जाना चाहती है. बीजेपी इसे धर्म से जोड़ती है. जबकि जनसंख्या नियंत्रण शिक्षा में सुधार और सामाजिक बदलाव से ही हो सकता है और बांग्लादेश इसका एक बेहतरीन उदाहरण है."

वहीं बीजेपी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट किया है, "यह सही है कि पढ़ी लिखी महिलाएँ अपने शरीर और परिवार नियोजन पर ज़्यादा अधिकार रखती हैं लेकिन नीतीश कुमार इस बात को बेहतर तरीक़े से कह सकते थे."

अमित मालवीय का मानना है कि इससे यह भी पता चलता है कि जेडीयू भी महिलाओं की शादी की उम्र कम से कम 21 साल करने के पक्ष में है.

नीतीश कुमार की छवि बिहार में महिला समर्थक रही है. उन्होंने राज्य में महिलाओं के लिए साइकिल योजना शुरु की थी.

जातिगत जनगणना का श्रेय लेने की होड़

नीतीश कुमार

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पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण और महिलाओं की मांग पर शराबबंदी को भी महिलाओं के लिए नीतीश सरकार की ख़ास नीति के तौर पर देखा जाता रहा है. लेकिन जनसंख्या नियंत्रण पर नीतीश की ज़ुबान से निकली बात को महिलाओं के ख़िलाफ़ पेश किया जा रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, "अगर नीतीश कुमार जनसंख्या रोकने के मामले में पुरुषों को ग़ैर ज़िम्मेदार और महिलाओं को ज़िम्मेदार बताते तो यहां तक ठीक था. लेकिन उससे आगे की बात, लगा जैसे कोई सेमीपोर्नोग्राफ़िक बात हो रही है."

नचिकेता नारायण मानते हैं कि यह मूल रूप से ज़ुबान का फिसलना था. नीतीश कुमार आमतौर पर बहुत नाप तौलकर बोलते हैं, लेकिन विपक्ष हमेशा ऐसे मौक़े की तलाश में रहता है कि आप कोई ग़लती करें.

बढ़ती जनसंख्या पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह बयान उस दिन दिया है, जिस दिन से यानि 7 जनवरी बिहार में जातिगत जनगणना शुरू हुई है. दरअसल इस मुद्दे पर भी बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी की तरफ़ से लगातार बयानबाज़ी हो रही है. इस मुद्दे पर हर पार्टी क्रेडिट लेने की होड़ में दिख रही है.

सुशील कुमार मोदी ने ट्वीट कर दावा किया है कि जातीय जनगणना कराने का फ़ैसला एनडीए सरकार का था, महागठबंधन सरकार का नहीं.

बिहार बीजेपी के अध्यक्ष संजय जायसवाल ने जातिगत जनगणना में उपजातियों की गिनती की भी मांग की है. उनका आरोप है कि नीतीश सरकार जातिगत जनगणना में आंकड़े छुपाना चाहती है. वहीं उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे पर बीजेपी पर आरोप लगाया है कि वो ग़रीब, दलित विरोधी और अमीरों की पार्टी है उसे दिक़्क़त है कि ग़रीब लोग मुख्यधारा में शामिल हो जाएंगे.

तेजस्वी यादव का कहना है, "बीजेपी को कुछ समझ में नहीं आता है. राज्य के लोगों की क्या स्थिति है, क्या हमें नहीं पता होना चाहिए. कौन ग़रीब है, कौन भूमिहीन है, कौन कचरा ढोता है,... कौन से समाज की दयनीय स्थिति है. जब पता नहीं नहीं होगा तो आप किस दिशा में काम कीजिएगा."

जातिगत जनगणना की इस बहस में पूर्व सांसद और जन अधिकारी पार्टी के प्रमुख पप्पू यादव भी कूद गए हैं. पप्पू यादव ने जातियों के साथ ही बेरोज़गारों की गिनती की भी मांग की है.

आबादी रोकने में महिलाओं की भूमिका

बिहार की महिलाएं

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भारत के ग्रामीण इलाक़ों में अब भी कई परिवारों को में ऐसी सोच है कि जितने कमाने वाले होंगे, उन्हें उतना फ़ायदा होगा. यानि ज़्यादा आबादी लोगों को ज़्यादा आर्थिक सुरक्षा की भावना देता है.

पटना के एएन सिंहा इस्टीट्यूट के में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास कहते हैं, "कृषि प्रधान समाज में ऐसा होता है क्योंकि खेतों पर काम करने के लिए भी लोग चाहिए. गांव वालों को यह भी लगता है कि कुछ लोग शहर जाकर कमाएंगे तो घर के हालात ठीक होंगे."

विद्यार्थी विकास का कहना है कि जनसंख्या रोकने के लिए महिलाओं की शिक्षा पर नीतीश कुमार 8-10 साल से लगातार बात कर रहे हैं और इसका असर भी दिखता है.

विद्यार्थी विकास मानते हैं, "शिक्षा एक 'प्राकृतिक गर्भ निरोधक' है. पढ़ी लिखी महिलाएं दो से ज़्यादा बच्चे नहीं चाहती हैं. कुछ मामलों में ज़रूर घरवालों के दबाव में दो बेटियों के बाद भी बेटा पाने के लिए तीसरी संतान को जन्म देती हैं."

विद्यार्थी विकास बताते हैं कि साल 2004-05 में बिहार में एक क्लास में औसतन 36 लड़कियां होती थीं और 64 लड़के होते थे. लेकिन अब कई ज़गहों पर यह अनुपात 50:50 का दिखता है. कई बार क्लास में लड़कियां ही ज़्यादा दिखती हैं.

नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे यानि एनएफ़एचएस के आंकड़ों के मुताबिक़ 2019-20 में बिहार में शहरी इलाक़ों में महिलाओं की फ़र्टिलिटी रेट (प्रजनन दर) 2.4 है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह दर 3.1 है.

एनएफ़एचएस के आंकड़े बताते हैं बिहार में महिलाओं के प्रजनन दर में लगातार गिरावट हो रही है. 2015-16 में शहरी इलाक़ों में यह दर तीन थी जबकि ग्रामीण इलाकों में 3.4 थी. इस बीच यह अनुमान लगाया गया है कि इसी साल यानि अप्रैल 2023 में भारत चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा.

हाल के दशकों में भारत में भी फ़र्टिलिटी रेट (प्रजनन दर) में काफ़ी गिरावट देखी गई है. साल 1950 में भारत में प्रजनन दर जहां 5.7 थी, वहीं आज भारत की एक महिला औसतन दो बच्चों को जन्म देती है. लेकिन प्रजनन दर के घटने की दर धीमी है.

इसलिए जनसंख्या विशेषज्ञों का कहना है कि आमदनी के बढ़ने और स्वास्थ्य एवं शिक्षा की बेहतर सुविधाएं मिलने के कारण भारतीय महिलाएं पहले की तुलना में अब कम बच्चे पैदा कर रही हैं.

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