छत्तीसगढ़ में ईसाइयों के धर्मांतरण और हिंसा का पूरा सच क्या है - ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, कोंडागांव, छत्तीसगढ़ से बीबीसी हिंदी के लिए

"उन्होंने उन सबको पीटा जो ईसा मसीह को मानते हैं. मेरे पति को बेदम होने तक मारा गया. पहले लात-घूंसे से फिर डंडे से. इतने पर भी मन नहीं भरा तो टायर से उन्हें मारने लगे. हम सब अपनी जान बचा कर गाँव की सरहद से दूर भागते रहे, भागते रहे. वो तब तक हमारा पीछा करते रहे, जब तक हम उनकी नज़रों से ओझल नहीं हो गए."

कोंडागाँव ज़िले के किबई बालेंगा गाँव की 22 साल की रामबती का गला बार-बार रुँध जाता है. वो आँखों में भर आए आँसुओं को बहुत मुश्किल से संभालती हैं.

अपने दूधमुंहे बच्चे को एक हाथ में थामे रामबती हर आने-जाने वाले से पूछती हैं कि उनके पति गोपाल मरावी को अस्पताल से कब छुट्टी मिलेगी?

रामबती और उनके पति गोपाल मरावी, कोंडागाँव और नारायणपुर ज़िले के उन सैकड़ों आदिवासियों में शामिल हैं, जिनका कहना है कि गाँव के रीति-रिवाज को नहीं मानने और ईसा मसीह की प्रार्थना करने का आरोप लगा कर, उन पर संगठित भीड़ ने हमला किया और उन्हें गाँव से बेदखल कर दिया गया.

इस हमले में घायल कुछ लोगों को कोंडागांव और नारायणपुर ज़िले के सरकारी अस्पतालों में भर्ती किया गया है.

इन दोनों ज़िलों के लगभग 33 गाँवों के लोगों ने अलग-अलग सामुदायिक भवन, चर्च, प्रार्थना घर और खेल स्टेडियम में शरण ले रखी है. पीड़ित लोगों का आरोप है कि ईसाई धर्म से नाराज़ कई गाँवों के लोगों ने संगठित हो कर हमला किया.

कहीं मारपीट की गई, कहीं घरों में तोड़फोड़ की गई. कहीं प्रार्थना घर तोड़ दिया गया तो कहीं ईसाई धर्म को मानने वालों को गाँवों से ही निकाल दिया गया.

बालेंगा गाँव की रहने वाली कमितला नेताम आठ माह की गर्भवती हैं. घर में वो अकेली हैं जो ईसाई धर्म को मानती हैं.

कमितला के अनुसार, 18 दिसंबर को बालेंगा और आसपास के कई गाँवों के आदिवासियों ने गाँव में बैठक बुलाई और फिर ईसाई धर्म को मानने वालों को घरों से बुला कर उनकी डंडों से पिटाई शुरू हुई.

कमितला कहती हैं, "भीड़ ने ईसाई धर्म में आस्था रखने वाले सभी लोगों को तत्काल गाँव छोड़ कर जाने का आदेश सुनाया. इसके बाद हम लोगों के साथ मारपीट शुरू हुई. मेरे पति ने सुरक्षा के लिहाज से कहा कि मुझे गाँव छोड़ देना चाहिए. मैं भीड़ से बचती-बचाती, अपना पेट संभालती भागती रही.

गाँव से लगे हुए जंगल में घुसी तो भीड़ वहाँ भी आ गई. किसी तरह एक चट्टान के पीछे छुप गई. अंधेरा घिरने लगा तब जा कर भीड़ वापस लौटी. मैंने पूरी रात जंगल में गुज़ारी."

कमितला के अनुसार, तड़के वे कई किलोमीटर पैदल चल कर कोंडागाँव शहर के एक प्रार्थनाघर तक पहुँचीं. उसके बाद से वे उसी प्रार्थना घर में रह रही हैं.

छत्तीसगढ़ में ईसाई आबादी

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, छत्तीसगढ़ की कुल आबादी 2.55 करोड़ है
  • 4.90 लाख जनसंख्या ईसाइयों की है
  • ईसाई कुल आबादी का 1.92 फ़ीसदी हैं
  • 2001 में यह संख्या कुल आबादी का 1.92 फ़ीसदी थी

32 प्रतिशत आदिवासी जनसंख्या वाले छत्तीसगढ़ में, पिछले कई सालों से भारतीय जनता पार्टी ईसाई संगठनों पर आदिवासियों के धर्मांतरण का आरोप लगाती रही है.

हाल के दिनों में बड़ी संख्या में पिछड़ा वर्ग, विशेषकर साहू समाज के लोगों ने भी ईसाई धर्म में अपनी आस्था दिखाई, जिसके बाद राज्य के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने भी इस मामले पर सार्वजनिक नाराज़गी जताई थी.

इसी साल मई में साहू समाज की एक बैठक में ताम्रध्वज साहू ने साहू समाज में तेज़ी से हो रहे धर्म परिवर्तन को लेकर कहा था कि 'आख़िर धर्म परिवर्तन करने से कोई श्रेष्ठ कैसे हो सकता है?'

उन्होंने तंज़ कसते हुए कहा था कि 'नए धर्म में जाने वालों को क्या स्वर्ग और हम नहीं जाएँगे तो क्या हमें नर्क मिलेगा?'

हालांकि राज्य सरकार धर्मांतरण के ऐसे आरोपों से इनकार करती रही है. राज्य सरकार के मंत्री इन घटनाओं को विपक्ष की राजनीति से जोड़ कर देखते हैं.

दरअसल राज्य में विधानसभा चुनाव में 10 महीने का समय बचा है. सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी एक-दूसरे पर सांप्रदायिकता बढ़ाने की कोशिश का

आरोप लगा रहे हैं.

छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फ़ोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल बताते हैं कि किसी का धर्मांतरण केवल कलेक्टर की अनुमति से ही किया जा सकता है. लेकिन राज्य में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है, जिनका धर्मांतरण नहीं हुआ है, फिर भी वे नियमित रूप से चर्च जाते हैं.

आज की तारीख़ में राज्य में रोमन कैथोलिक वर्ग की जनसंख्या 2.25 लाख और मेनलाइन चर्च, जिसमें चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया, मेनोनाइट्स, ईएलसी, लुथरन आदि शामिल हैं, इनकी जनसंख्या 1.5 लाख है.

इसके अलावा असंगठित पैराचर्च हैं, जिसमें कोई क़ानूनी धर्मांतरण नहीं होता. लेकिन ये लोग नियमित रूप से चर्च जाते हैं. इसे चर्च का प्रभाव क्षेत्र माना जा सकता है. इनकी जनसंख्या लगभग नौ लाख है.

अरुण पन्नालाल कहते हैं, "भाजपा शासनकाल के 15 सालों में हमारे समाज पर हमले या प्रताड़ना की छिटपुट घटनाएँ सामने आती थीं. जो घटनाएँ होती थीं, उन पर एफ़आईआर दर्ज होती थी.

अगर रिकार्ड देखें तो ईसाई समाज पर इस दौरान हमले की कुल 17-18 घटनाएँ हुईं. लेकिन कांग्रेस सरकार के केवल तीन सालों में ईसाइयों पर हमले और प्रताड़ना के 380 मामले हुए. इसके बाद हमने ऐसे मामलों की गणना बंद कर दी क्योंकि वर्तमान सरकार तो ऐसे मामलों में एफ़आईआर तक दर्ज़ नहीं कर रही है."

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ईसाई समुदाय से जुड़े 250 से अधिक आदिवासियों ने हाल ही में एक चिट्ठी भी लिखी.

चिट्ठी में छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्म में आस्था रखने वालों के साथ हुई प्रताड़ना, धमकी या तोड़-फोड़ का विस्तार से वर्णन किया गया है.

इस चिट्ठी के अनुसार, केवल बस्तर संभाग में दिसंबर के महीने में 37 तो नवंबर में 45 घटनाएँ हुईं.

लेकिन 18 दिसंबर को कोंडागाँव और नारायणपुर ज़िले में ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों पर हमले की एक के बाद एक घटनाओं ने सारे आँकड़ों को पीछे छोड़ दिया.

अंतिम संस्कार भी मुश्किल

कोंडागाँव ज़िले के कोदागाँव की आसमती का कहना है कि वो बीमार रहती थीं. इलाज के बाद भी ठीक नहीं हुईं तो उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया. उनका दावा है कि इसके बाद से वे ठीक हो गईं.

अब उनका आरोप है कि 18 दिसंबर को उनके गाँव में, आसपास के कई गाँवों के आदिवासी जमा हुए और उनकी डंडों से बुरी तरह से पिटाई की गई. उन्हें इस हिदायत के साथ गाँव से बाहर निकाल दिया गया कि अगर वे दोबारा गाँव की सरहद में नज़र आईं तो उनके परिवार को 50 हज़ार रुएये का जुर्माना देना पड़ेगा.

आसमती का कहना है कि वे किसी भी हालत में ईसाई धर्म को नहीं छोड़ना चाहतीं. उन्हें डर है कि अगर उनकी मौत हो गई तो उनके शव का क्या होगा?

असल में राज्य में पिछले कुछ महीनों में ऐसी कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जब ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को गाँव में अंतिम संस्कार करने की अनुमति नहीं मिली.

शव अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा में सड़ते रहे. कुछ जगहों में तो ईसाई धर्म अपना चुके लोगों के दफ़नाए शवों को खोद कर बाहर निकाल दिया गया. बटराली, केसकाल के राधेश्याम कुंजाम ने बीबीसी को बताया कि उनके पिता का रायपुर के सरकारी अस्पताल में बीमारी से निधन हो गया था. बीमारी से जुड़े सारे काग़ज़ात भी उनके पास हैं.

9 दिसंबर को उन्होंने पिता का शव अपनी ज़मीन पर दफ़नाया, लेकिन अगले ही दिन गाँव के लोगों ने सरकारी अफ़सरों के साथ मिल कर शव को बाहर निकलवा दिया.

कहानी गढ़ी गई कि पिता की अकाल मृत्यु हुई है, इसलिए पोस्टमॉर्टम ज़रूरी है.

राधेश्याम कुंजाम का कहना है कि इसके बाद पिता के शव का क्या हुआ, उन्हें इसकी जानकारी नहीं है.

हालाँकि छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फ़ोरम के कोंडागाँव ज़िले के अध्यक्ष सिद्धू का कहना है कि गाँव वालों के विरोध के कारण शव को गाँव की ज़मीन से निकाला गया और उसे प्रशासन की देखरेख में केसकाल के मसीही समाज के क़ब्रिस्तान में दफ़ना दिया गया.

रानापाल गाँव की सन्नो ईसाई धर्म को नहीं मानतीं. लेकिन उनकी जेठानी को मारपीट कर गाँव से निकाला गया तो वो भी अपनी जेठानी के साथ कोंडागाँव के एक प्रार्थनाघर में आ गईं.

सन्नो कहती हैं, "मैं चाहती तो गाँव में रह सकती थी. लेकिन मैं अपनी जेठानी को अकेले नहीं छोड़ सकती थी. वो अपना धर्म मानें, मैं अपना धर्म. इसमें किसी को क्या दिक़्क़त हो सकती है? लेकिन मेरी जेठानी को गाँव से बाहर निकाल दिया गया."

इसी तरह कोदागाँव की दसमती सलाम कहती हैं, "गाँव में बैठक करके हमारा पूरा सामान घर से बाहर निकाल दिया गया और कहा गया कि जहाँ परमेश्वर का राज है, वहाँ जा कर रहो. गाँव वालों ने कहा कि गाँव में दोबारा लौट कर आई तो मार देंगे."

दसवीं तक की पढ़ाई कर चुकी दसमती सलाम दहशत में हैं.

उनका कहना है कि उनके आसपास के कई गाँवों में लोगों पर हमले हुए हैं और चर्चों को तोड़ा गया है.

दसमती को आशंका है कि वे गाँव लौटीं तो उन पर फिर से हमला हो सकता है या उन्हें हिंदू बनाया जा सकता है.

उनकी ये आशंका निर्मूल भी नहीं है.

मदमनार गाँव में रिपोर्टिंग के दौरान जानकारी मिली कि गाँव के लगभग 20 परिवारों को ईसाई से हिंदू बनाया जा चुका है. कुछ और गाँवों में भी आदिवासियों की 'घर वापसी' हो चुकी है.

राज्यपाल को भी इस बारे में एक चिट्ठी दी गई है, उसमें भी इस बात का उल्लेख है.

टूटा हुआ प्रार्थनाघर

कोंडागाँव से नारायणपुर जाने वाले मुख्यमार्ग पर चिमड़ी गाँव है.

जानकारी के मुताबिक़, पिछले रविवार को इस गाँव में ईसाई धर्म को मानने वाले 20 परिवारों को गाँव से निकाल दिया गया और उनके घरों में तोड़फोड़ की गई. एक प्रार्थनास्थल को भी तोड़ दिया गया.

गाँव के एक बुज़ुर्ग ने कहा कि 'जिन लोगों को गाँव से भगाया गया है, उन्हें पहले भी चेतावनी दी गई थी कि वे ईसाई धर्म छोड़ दें. लेकिन उन्होंने हमारी बात नहीं मानी.'

बुज़ुर्ग ने कहा, "उन्होंने हमारी देवगुड़ी में आना बंद कर दिया था. वे आदिवासी रीति रिवाज के ख़िलाफ़ हो गए थे. हमारे पुजारी ने कहा कि गाँव का देवता नाराज़ हो सकता है.

ऐसे में उन्हें गाँव से बाहर निकालने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं था. हमने तय किया है कि अब उन्हें किसी भी हालत में गाँव में नहीं लौटने दिया जाएगा."

चिमड़ी गाँव की मुख्य सड़क पर ही ईसाइयों का एक प्रार्थना घर है जिसे आदिवासियों ने तोड़ दिया. प्रार्थनाघर की एसबेस्टस की छत अब ज़मीन पर है और दीवार पर ईसा मसीह की तस्वीरों वाला एक कैलेंडर फड़फड़ा रहा है.

एक नौजवान से बात करने की कोशिश करता हूं, उसका सीधा जवाब होता है- पुलिस ने बात करने से मना किया है.

इलाक़े में रिपोर्टिंग करते हुए पुलिस के सवाल-जवाब से बीबीसी की टीम को भी दो-चार होना पड़ा.

चिमड़ी गाँव के जिस प्रार्थनाघर में तोड़-फोड़ हुई, उसके ठीक सामने गाँव के रोज़गार सहायक मेहतर कोर्राम का घर है.

वे कहते हैं कि 'मुझे डॉक्टर ने ज़्यादा घूमने या बात करने से मना किया है. इसलिए जिस दिन ईसाइयों के प्रार्थनाघर को तोड़ा गया, मैं घर से बाहर ही नहीं निकला.'

प्रार्थनाघर से कोई 100 मीटर की दूरी पर आदिवासियों का देवस्थल है. वहाँ भारी जमावड़ा था. गाँव के लोग किसी मुद्दे पर बैठक कर रहे थे. लेकिन गाँव के आदिवासी इस मुद्दे पर कुछ भी बोलना नहीं चाहते.

क्या क्या है आरोप?

छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फ़ोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल ईसाई धर्म में आस्था रखने वालों पर हमले के लिए राज्य सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

अरुण पन्नालाल का कहना है कि भाजपा और संघ की भूमिका जगज़ाहिर है, लेकिन इसे अब राज्य सरकार का भी समर्थन मिल रहा है.

ईसाई धर्म अपना चुके लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर करने के लिए राज्य में प्रदर्शन हो रहे हैं.

अरुण पन्नालाल कहते हैं, "जिन गाँवों पर हमला हुआ, वहाँ मसीही समाज में आस्था रखने वालों ने समय रहते पुलिस को सूचना दी थी. ग्राम टेमरू में फागू राम, सुकलाल, सन्तु बहादुर ने 16 दिसंबर को बयानार थाने में नामज़द शिकायत दी थी कि गाँव की एक बैठक में उन पर हमले की तैयारी की जा रही है.

इस पर कोई कार्रवाई तो नहीं हुई, बल्कि 18 दिसंबर को हुए हमले के बाद मार खाए और अस्पताल में भर्ती लोगों को ही जाँच करने के लिए नोटिस जारी कर दिया गया."

छत्तीसगढ़ में सर्व आदिवासी समाज के उपाध्यक्ष सरजू टेकाम का कहना है कि आदिवासी समाज सांस्कृतिक हमलों से डरा हुआ है. आदिवासी समाज को ईसाई और हिंदू बनाने की कोशिश में उसकी मूल पहचान को ख़त्म करने की साज़िश रची जा रही है.

सरजू टेकाम कहते हैं, "भाजपा और संघ ने गाँव-गाँव में अलग-अलग नाम से संगठन बना लिए हैं और आदिवासियों के भगवाकरण की कोशिश हो रही है. कोंडागाँव और नारायणपुर ज़िले में जो हमले हुए हैं, उसके पीछे भी भाजपा से जुड़े संगठन ही हैं."

सरजू टेकाम का कहना है कि इतने हमलों के बाद भी राज्य सरकार इन मामलों में कोई सख़्त कार्रवाई इसलिए नहीं कर रही है क्योंकि वह भी संघ के एजेंडे पर ही चल रही है.

टेकाम कहते हैं, "आदिवासी इलाक़ों में सरकार राम वनगमन पथ बनवा रही है, रामजी के 75 मंदिर बनवा रही है, यह आख़िर भगवाकरण नहीं तो और क्या है? कांग्रेस सरकार भी हिंदू वोट बैंक को नाराज़ नहीं करना चाहती. भले ही इस चक्कर में आदिवासी अपने गाँव-घर से बेदखल होते रहें."

राज्य सरकार का पक्ष

हालाँकि राज्य सरकार के प्रवक्ता और वरिष्ठ मंत्री रवींद्र चौबे इन तर्कों से सहमत नहीं हैं. रवींद्र चौबे का कहना है कि जहां भी ज़रूरत हुई है, वहाँ राज्य सरकार ने सख़्ती से कार्रवाई की है.

उनका कहना है कि अब जबकि राज्य में विधानसभा चुनाव में 10 महीने का समय बचा है, तब भारतीय जनता पार्टी इस तरह के हमलों से राज्य में सांप्रदायिकता को बढ़ाने की कोशिश कर रही है.

रवींद्र चौबे ने बीबीसी से कहा, ''राज्य में बेरोज़गारी, धान, किसान, बिजली, पानी, शिक्षा जैसे विषयों पर भारतीय जनता पार्टी को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है. इसलिए वह सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने का काम कर रही है.

कबीरधाम हो या नारायणपुर, भारतीय जनता पार्टी की कोशिश है कि भाई से भाई को लड़ाया जाए. एक आदिवासी परिवार में एक भाई की अगर ईसाई धर्म में आस्था है तो भारतीय जनता पार्टी दूसरे भाई को भड़काने का काम कर रही है. लेकिन उसके मंसूबे कामयाब नहीं होंगे."

दरअसल राज्य की 90 में से, सरगुजा संभाग और उससे लगी हुई विधानसभा की 19 सीटों पर, ईसाई मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है.

जशपुर ज़िले में तो ईसाई मतदाता ही विधानसभा में जीत-हार का फ़ैसला करते हैं.

लेकिन भाजपा के प्रदेश मंत्री और अखिल भारतीय घर वापसी प्रमुख, प्रबल प्रताप सिंह जूदेव इन घटनाओं के लिए राज्य सरकार और ईसाई संगठनों को ही ज़िम्मेदार बताते हैं.

जूदेव कहते हैं, "ईसाई संगठन गाँवों में प्रलोभन और दबाव बना कर धर्मांतरण करवा रहे हैं जिसके कारण आदिवासियों की संस्कृति पर ख़तरा मंडरा रहा है. अब बिन बुलाए मेहमानों को आदिवासी पहचान गए हैं और इस तरह के काम में लिप्त लोगों के ख़िलाफ़ लोग एकजुट हो रहे हैं.

यह स्वाभाविक रूप से हो रहा है. जिस तरीक़े से बस्तर और राज्य के दूसरे इलाक़ों में धर्मांतरण में तेज़ी आई है, उसमें आने वाले दिनों में इस तरह की प्रतिक्रिया और तेज़ हो जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा."

प्रबल प्रताप सिंह जूदेव का आरोप है कि राज्य की कांग्रेस पार्टी की सरकार धर्मांतरण को बढ़ावा देने का काम कर रही है. राज्य सरकार के संरक्षण में आदिवासियों का धर्मांतरण हो रहा है.

प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने बीबीसी से कहा, ''हमने फ़ैसला किया है कि बस्तर में जल्दी ही बड़े स्तर पर आदिवासियों की घर वापसी का अभियान चलाया जाएगा.''

इस 'घर वापसी' अभियान में कितने लोगों की वापसी होगी, यह कह पाना तो मुश्किल है, लेकिन ईसाइयों पर किए गए हमले में घायल धर्मराज मरावी अपनी वापसी को लेकर चिंतित हैं.

कोंडागाँव के ज़िला अस्पताल में एक बिस्तर पर लेटे धर्मराज अपनी सिर पर बँधी पट्टी को छूते हुए पूछते हैं, ''मुझे मार-पीट कर गाँव से निकाल दिया गया. अस्पताल से ठीक होने के बाद मैं वापस कहाँ जाऊँगा?"

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला का कहना है कि देश के किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता. लेकिन भारतीय जनता पार्टी लोगों को भड़का रही है.

सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं, "अगर कहीं बलपूर्वक धर्मांतरण किया गया है तो उस मामले में छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण संबंधी क़ानून हैं. इस मामले में थाने में शिकायत की जा सकती है.

लेकिन किसी को क़ानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती. दूसरे धर्म के लोगों को शवों को दफ़नाने से रोकना या दूसरे धर्म को मानने वालों को गांवों से निकालना अमानवीय है."

सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि मुख्यमंत्री ने पिछले सप्ताह ही दिल्ली में ईसाई समाज के प्रतिनिधियों से मुलाकात में उन्हें आश्वस्त किया है कि राज्य में कोई भी क़ानून से ऊपर नहीं है और समाज में वैमनस्यता फैलाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख़्शा नहीं जाएगा.

इस संबंध में हमने छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संवाद प्रमुख कनीराम नंदेश्वर से भी उनका पक्ष लेने की कोशिश की. उन्होंने इस विषय में केवल दो लाइन में अपनी बात रखी.

उनके मुताबिक़, "संघ किसी भी हिंसा पर विश्वास नहीं करता. संघ के ऊपर आरोप कौन लगा रहा है? संघ को जो अपना राजनीतिक विरोधी मानते हैं वे, उनके आरोपों पर संघ ने कई बार अपना वक्तव्य दिया है. संघ सबको जोड़ने का काम कर रहा है."

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