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गढ़चिरौली: धर्मपरिवर्तन के बाद भी क्यों हैं परेशान आदिवासी
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गढ़चिरौली महाराष्ट्र से
महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल इलाक़ों में रहने वाले लोगों का जीवन हमेशा से ही तलवार की धार पर रहा है.
ये इलाके अब नक्सली हिंसा का केंद्र बन चुके हैं और लोगों का जीवन और भी मुश्किलों भरा बनता जा रहा है.
मगर इन आदिवासी क्षेत्रों में अन्दर-अन्दर एक और आग सुलग रही है जिसे समय रहते निपटा नहीं गया तो यहाँ की स्थिति और भी बेकाबू होने की आशंकाएं पैदा कर रही हैं.
सभी लोग इसको लेकर चिंतित हैं क्योंकि परिस्थितियाँ टकराव की तरफ तेज़ी से बढ़ रही हैं.
माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच छिड़े युद्ध के बीच पिसते यहाँ के आदिवासी अब धर्म परिवर्तन और घर वापसी के बीच पिसने लगे हैं.
गढ़चिरौली महाराष्ट्र का आदिवासी बहुल इलाक़ा है जहां की बड़ी आबादी जंगलों में रहती है.
पिछले कुछ सालों से ईसाई मिशनरी यहाँ काम करते आ रहे हैं. अब उन पर आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लग रहा है.
गढ़चिरौली जिले का सुदूर बिजयपार गाँव.
यहाँ तनाव है क्योंकि यहाँ के रहने वाले कुछ आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है.
फलस्वरूप बिजयपार की ग्रामसभा ने ईसाई बनने वालों का सामाजिक बहिष्कार करना शुरू कर दिया है. अब न तो कोई इन परिवारों के घर जाता है और न ही अपने घर बुलाता है. यहाँ तक कि सामाजिक आयोजनों में भी इन परिवारों को शामिल होने की अनुमति नहीं है.
हद तो तब हो गई जब ग्रामसभा ने इन परिवारों पर अर्थ दंड भी लगा दिया.
दुलाराम पहाड़ सिंह कुमरे बिजयपार ग्रामसभा के सचिव हैं. वो बताते हैं कि उनके गाँव में आदिवासियों के कुल 12 ऐसे घर ऐसे हैं जिनके सदस्यों ने अपना धर्म त्याग दिया है और ईसाई बन गए.
कुमरे कहते हैं, "जो लोग ईसाई बने हैं उनको दंड तो भरना पड़ेगा. उन्होंने ऐसा कर हमारी परंपरा और हमारे पूर्वजों के इष्ट देव का अपमान किया है. इन लोगों ने हमारी संस्कृति को भी त्याग दिया है."
मगर ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासी मंगरु को दुःख है कि गाँव के लोगों ने उनको अलग-थलग कर दिया.
वो कहते हैं कि उनके परिवार के किसी सदस्य की तबियत ख़राब हो गई थी जो दवाओं से भी ठीक नहीं हो रहे थे. ऐसे में उन्होंने स्थानीय चर्च जाकर प्रार्थना का सहारा लिया.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं कि प्रार्थना के बाद उनके परिवार के सदस्य को जब फ़ायदा हुआ तो उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया.
मंगरू कहते हैं, "हमसे पूछिए क्या होता है जब आप जिसके साथ बचपन में खेल कूद कर बड़े हुए और वो अचानक आपसे सारे संबंध तोड़ दे. लोग हमसे बात नहीं करते."
"हम गाँव में होने वाली पूजा में हिस्सा लेने जाते भी हैं तो हमारा तेल और हल्दी गाँव वाले स्वीकार नहीं करते. अब तो हम जंगल भी नहीं जा सकते. जंगल में पैदा होने वाली चीज़ों पर हमारा भी अधिकार है. लेकिन अब गाँववालों ने इस पर रोक लगा दी है."
गढ़चिरौली के कोरची में ईसाई मिशनरी का आश्रम भी है और चर्च भी. इस ज़िले में और भी स्थानों पर चर्च खुले हैं और ईसाई मिशनरियों का काम भी चल रहा है.
मगर अब खींचातानी बढ़ने लगी है क्योंकि संघ के लोग आरोप लगा रहे हैं कि चर्च के पादरी और कार्यकर्ता आदिवासियों को प्रलोभन देकर धर्मांतरण कर रहे हैं.
चर्च के पादरी आर जयपॉल इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं. उनका कहना है कि वो सिर्फ लोगों तक "बाइबल का शुभ समाचार पहुंचाने का काम कर रहे हैं."
गढ़चिरौली महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े हुए इलाकों में से एक है जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है.
चिकित्सा, पोषण और शिक्षा के सारे मानक यहाँ सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए हैं. ऐसे में चर्च यहाँ के सुदूर अंचलों में आदिवासियों के बीच शिक्षा और चिकित्सा लेकर जा रहा है.
आर जयपॉल कहते हैं, "हम किसी का जबरन धर्म परिवर्तन नहीं कराते हैं. जो लोग अपनी इच्छा से स्वीकार करके आते हैं उनको हम भी स्वीकार करते हैं. लेकिन संघ परिवार के लोग आदिवासियों को उकसाने का काम कर रहे हैं."
"अब जिन आदिवासियों ने अपनी मर्ज़ी से धर्म परिवर्तन किया है उन पर दस दस हज़ार रुपए अर्थ दंड लगाया जा रहा है. बहिष्कार किया जा रहा है."
लेकिन संघ परिवार धर्मांतरण का विरोध कर रहा है. संघ के प्रचारकों का कहना है कि ईसाई मिशनरी जंगल के इलाकों के आदिवासियों की ग़रीबी और आर्थिक तंगी का फ़ायदा उठा रहे हैं.
विश्व हिंदू परिषद के गढ़चिरौली ज़िला अध्यक्ष वामनराव फाये कहते हैं कि आदिवासी "चर्च के झांसे में फँस रहे हैं."
फाये कहते हैं, "धर्म परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है कि यहाँ आदिवासी और दलित ग़रीब हैं. उनके पास पैसे भी नहीं हैं और संसाधन भी. बेकारी बढ़ रही है. अशिक्षा भी बढ़ गयी है. इसकी वजह से वो बाहर के ईसाई मिशनरी के लोग आते हैं प्रचारक बनकर. ये प्रचारक ग़रीब आदिवासियों और दलितों को पैसों और सुविधाओं का प्रलोभन दे कर धर्म परिवर्तन करा रहे हैं."
फाये का आरोप है कि जो आदिवासी और दलित ईसाई धर्म अपना रहे हैं उन्हें हर माह पैसे भी मिलते हैं.
ईसाई मिशनरियों को रोकने के लिए संघ ने भी अपनी रणनीति को और भी मज़बूत बनाना शुरू कर दिया है. वो शिक्षा के माध्यम से धर्मांतरण को रोकने की कोशिश कर रहे हैं. इसी के तहत आदिवासी बहुल इलाकों में अब संघ अपनी शाखाएं और स्कूल खोल रहा है.
वो वैसे आदिवासियों की पहचान का काम कर रहा है जिन्होंने ईसाई धर्म अपनाया है. हाल ही में संघ ने 72 आदिवासियों की 'घर वापसी' भी कराई है.
धर्मांतरण और घर वापसी की खींचातानी अब पुलिस के पास भी पहुँचने लगी है. वो इसलिए क्योंकि कई ग्रामीण अंचलों में इसको लेकर तनाव भी है.
ईसाई धर्म अपनाने वाले अब पुलिस की शरण में जाने लगे हैं और अपने गाँव के लोगों पर प्रताड़णा का मामला दर्ज भी कर रहे हैं. ऐसी शिकायतों की पुलिस के पास लंबी फेहरिस्त बन रही है जिससे वो परेशान हैं.
बिजयपार गाँव के पहाड़ सिंह कुमरे कहते हैं कि ईसाईयों की शिकायत की वजह से उनके गाँव के कई लोगों को थाने और कचहरी के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. इससे लोगों में ग़ुस्सा और भी बढ़ रहा है.
सिर्फ बिजयपार ही नहीं जंगल के विभिन्न सुदूर गावों से आ रही शिकायतों पर पुलिस ने भी संज्ञान लेना शुरू कर दिया है ताकि कोई सौहार्द्र बिगड़ न सके.
ज़िले के पुलिस अधिकारी मानते हैं कि ये मामला काफ़ी संवेदनशील है और शरारती तत्व किसी भी समय सौहार्द्र बिगाड़ सकते हैं. लेकिन पुलिस अधिकारी लोगों को शांति बनाए रहने के लिए खुद भी बीच बचाव का काम कर रहे हैं.
विनोद गोडबोले ज़िले के पुलिस अधिकारी हैं. बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "ईसाई धर्म अपनाने वालों का कहना है कि गाँव के दूसरे लोग हमें डराते हैं. वो लोग इन ईसाईयों को सामाजिक अनुष्ठानों में भी भाग नहीं लेने देते. जंगल भी जाने पर प्रतिबंध लगाते हैं."
"लेकिन गाँव वाले कहते हैं कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद अब आप लोग हमारे समाज में नहीं हो. इस प्रकार की शिकायतें बढ़ रही हैं."
आदिवासियों को अपनी संस्कृति पर नाज़ है. उनके रीति रिवाज भी बिलकुल अलग हैं. इसलिए ईसाई बनने पर उन्हें समाज के अनुष्ठानों से अलग रहना पड़ता है.
लेकिन धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों का कहना है कि उन्होंने सिर्फ अपना धर्म छोड़ा है, संस्कृति नहीं.
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