कोरोना: चीन जैसे हालात हुए तो क्या निपट पाएगा भारत?

    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चीन के अस्पतालों में कोरोना संक्रमितों की बढ़ती संख्या के चलते अफ़रा-तफ़री और मुर्दाघरों के बाहर लंबी कतारों की तस्वीरें एक बार फिर से सोशल मीडिया पर दिखाई देने लगी हैं.

अप्रैल 2022 की कोरोना पीक को चीन ने जैसे ही दिसंबर महीने में पार किया, दुनियाभर में कोविड प्रबंधन को लेकर बैठकें शुरू हो गईं.

बुधवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की. इसमें सभी को अलर्ट रहने और कोरोना की निगरानी मज़बूत करने का निर्देश दिया गया.

कोविड पर नेशनल टास्क फ़ोर्स के प्रमुख वीके पॉल ने भी लोगों से फिर से मास्क और कोविड के अन्य प्रोटोकोल पालन करने की अपील की है. हालांकि उन्होंने ये भी कहा है कि "लोगों को डरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि भारत सुरक्षित ज़ोन में है."

जॉन हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी के डैशबोर्ड के मुताबिक़ कोरोना वायरस के कारण दुनियाभर में क़रीब 66.72 लाख लोगों की जान गई है. ये आंकड़ा इतना बड़ा है कि दुनिया के नक्शे पर क़रीब 70 देशों की आबादी 66 लाख से कम है.

कुछ महीनों से ये आंकड़ा ठहरा हुआ था लेकिन पिछले कुछ दिनों में इसकी रफ्तार फिर से बढ़ने लगी है.

इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोरोना वायरस के डेल्टा, ऑमिक्रॉन वेरिएंट के बाद भारत में कोरोना का कोई नया वेरिएंट सामने आ सकता है? अगर कोरोना की नई लहर आती है तो उसके लिए भारत कितना तैयार है? भारत में वैक्सीनेशन, ऑक्सीजन सप्लाई, अस्पतालों में कोविड बेड, कोरोना सर्विलांस, टेस्टिंग और हेल्पलाइन जैसी सुविधाएं किस हाल में है?

भारत ने पहले आई कोरोना की लहरों से कुछ सबक सीखा भी है या नहीं? इन सब विषयों पर बात करने से पहले दुनियाभर में बढ़ते कोरोना के मामलों पर एक नज़र डालना ज़रूरी है.

न सिर्फ चीन बल्कि जापान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ब्राज़ील में भी कोरोना के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं.

जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के डैशबोर्ड मुताबिक़ पिछले हफ्ते चीन में 244, अमेरिका में 2,921 और जापान में 1,687 लोगों की मौत कोविड संक्रमण से हुई है. इन देशों में कोरोना संक्रमितों के मामले फिर से लाखों में पहुंचने लगे हैं.

वैक्सीनेशन का क्या है हाल?

भारत में कोरोना के सक्रिय मामले फिलहाल चार हज़ार से कम हैं लेकिन एयरपोर्ट पर रैंडम टेस्टिंग शुरू की जा चुकी है.

कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच भारत में वैक्सीनेशन प्रोग्राम पर भी चर्चा शुरू हो गई है. सफदरजंग हॉस्पिटल में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. जुगल किशोर कहते हैं कि भारत सरकार लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज़ लगाने में कामयाब रही है.

उन्होंने कहा, "वैक्सीन से हम लोग इंफेक्शन को तो नहीं रोक पाए लेकिन वायरस की सीवियरटी और मोर्टेलिटी (घातक असर और मृत्युदर) को काफी कम कर पाए हैं."

कोरोना की दूसरी डोज़ का सच?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना से लड़ने के लिए वैक्सीन बहुत ज़रूरी है.

भारत में क़रीब कोरोना के 220 करोड़ टीके लगाए जा चुके हैं, जिसमें से क़रीब 7 करोड़ व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें अभी वैक्सीन की दूसरी डोज़ नहीं लगी है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ देश में इस वक्त क़रीब 92 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन्हें कोरोना वैक्सीन की पहली डोज़ के बाद उसकी दूसरी डोज़ भी लग चुकी है, लेकिन वैक्सीन के मामले में कुछ राज्यों की हालात काफी ख़राब है.

इसमें सबसे बड़ा नाम है झारखंड का है. यहां सिर्फ़ 74 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जिन्होंने कोरोना वैक्सीन के पहले टीके के बाद दूसरा टीका भी लगवाया है. झारखंड के बाद मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, चंडीगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के नाम आते हैं.

वहीं आंध्र प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक ऐसे राज्य हैं जहां कोरोना वैक्सीन की दूसरी डोज़ का नंबर पहली डोज़ से भी ज्यादा है.

बूस्टर डोज़ से दूरी क्यों?

चीन में कोरोना के बढ़ते मामलों के लिए संभवत: ओमिक्रॉन सबवेरिएंट BF.7 ज़िम्मेदार है. उसके चार मामले अभी तक भारत में पाए गए हैं.

डॉ वीके पाल ने कहा, "इंडियन sars-cov-2 जीनोमिक्स कॉन्सोशियम (INSACOG) के अनुसार भारत में इस वेरिएंट से संक्रमण के चार मामले दर्ज किए गए हैं. एक मामला इस साल जुलाई में, दो सितंबर में और एक इस साल नवंबर में दर्ज किया गया था."

कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच डॉ वीके पॉल ने सभी लोगों को बूस्टर डोज़ लगवा लेने के लिए कहा है. लेकिन सवाल यह है कि क्या बूस्टर डोज़ कोरोना के किसी नए वेरिएंट के ख़िलाफ़ असरदार साबित होगी? और भारत में लोग बूस्टर डोज़ क्यों नहीं लगवा रहे हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ कोरोना की पहली डोज़ लगवाने वाले क़रीब 23 प्रतिशत लोगों ने ही अभी तक बूस्टर डोज़ लगवाई है. इसमें सबसे ज़्यादा ख़राब हाल मेघालय का है जहां कोरोना वैक्सीन की पहली ख़ुराक लेने वाले सिर्फ़ 8 प्रतिशत लोगों ने ही वैक्सीन की बूस्टर डोज़ ली है. इसके बाद पंजाब, नागालैंड, हरियाणा जैसे राज्य इस मामले में 10 प्रतिशत से कम पर हैं.

भारत के कुछ इलाक़े ऐसे भी हैं जहां लोगों में बूस्टर डोज़ को लेकर काफी उत्साह है. अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में पहली डोज़ लगवाने वाले क़रीब 82 प्रतिशत, लद्दाख में क़रीब 60 प्रतिशत और तेलंगाना में क़रीब 42 प्रतिशत लोगों ने बूस्टर डोज़ ली है.

डॉ. जुगल किशोर कहते हैं, "बूस्टर डोज़ से इंफेक्शन रेट में कमी नहीं देखी गई है. ये बात रिसर्च में भी सामने आई है. यही वजह है कि कम संख्या में लोग बूस्टर डोज़ लगवा रहे हैं."

कितने तैयार हैं अस्पताल?

दिल्ली सरकार के मुताबिक़ राजधानी में क़रीब बीस हजार कोविड बेड हैं, जिनमें से क़रीब तीस बेड पर ही फिलहाल मरीज़ हैं. सरकार का कहना है कि किसी भी मुश्किल स्थिति में बेड की संख्या को बढ़ाकर दोगुना किया जा सकता है.

बीबीसी हिंदी से बातचीत में जीटीबी हॉस्पिटल के मेडिकल डायरेक्टर सुभाष गिरी कहते हैं कि कोरोना से डरने की ज़रूरत नहीं है और वे किसी भी मुश्किल स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं.

डॉ गिरी कहते हैं, "जीटीबी में इस वक्त कोविड के लिए क़रीब 100 बेड हैं, जो पूरी तरह से खाली हैं. तुरंत नोटिस पर इन्हें बढ़ाकर 500 तक किया जा सकता है. कोरोना की दूसरी लहर में जीटीबी हॉस्पिटल में 750 ऑक्सीजन बेड थे, जिसे बढ़ाकर अब 1200 कर दिया है. इन सभी बेड पर पाइप के ज़रिए ऑक्सीजन की सप्लाई उपलब्ध है."

डॉ. गिरी के मुताबिक़ क़रीब 300 बेड ऑक्सीजन सिलेंडर की मदद से किसी भी समय तैयार किए जा सकते हैं और जीटीबी हॉस्पिटल को चरणबद्ध तरीक़े से कोविड हॉस्पिटल में बदला जा सकता है.

न सिर्फ दिल्ली बल्कि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों ने भी कोविड से निपटने के लिए अपने यहां अस्पतालों में बेड की संख्या को बढ़ाया है.

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में क़रीब दो हजार ऑक्सीजन बेड, क़रीब 800 आईसीयू बेड की सुविधा है.

ऑक्सीजन की उपलब्धता का क्या है हाल?

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान अपने पति को सीपीआर देते हुए रेणु की तस्वीर देश में ऑक्सीज़न की कमी से पैदा हुए भयानक मंज़र का प्रतीक बन गई थी.

न सिर्फ सड़कों पर बल्कि अस्पतालों में भर्ती मरीज़ भी ऑक्सीजन की कमी के चलते दम तोड़ रहे थे. इसमें दिल्ली के बत्रा और जयपुर गोल्डन अस्पताल शामिल थे.

ऑक्सीजन की किल्लत से हुई मौतों का भले सरकार ने नाम नहीं लिया लेकिन उसकी कमी को ज़रूर महसूस किया. यही वजह थी कि नेशनल मेडिकल कमीशन ने सभी मेडिकल कॉलेजों के लिए प्रेशर अब्ज़ॉर्प्शन ऑक्सीजन जनरेशन प्लांट लगाने को अनिवार्य कर दिया.

इसके लिए एनएमसी ने एमबीबीएस प्रवेश विनियमन (2020) के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं में संशोधन किया.

27 जुलाई 2022 को सरकार ने संसद में बताया कि देश में 4 हज़ार 115 प्रेशर अब्ज़ॉर्प्शन ऑक्सीजन जनरेशन प्लांट कमीशन किए गए हैं. इसमें से एक हज़ार प्लांट पिछले साल अक्टूबर तक ही शुरू कर दिए गए थे.

इसके अलावा केंद्र सरकार ने क़रीब चार लाख मेडिकल ऑक्सीजन सिलेंडर और क़रीब डेढ़ लाख ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर्स भी खरीदे हैं.

जीटीबी हॉस्पिटल के मेडिकल डायरेक्टर सुभाष कहते हैं, "कोरोना की दूसरी लहर के मुक़ाबले जीटीबी हॉस्पिटल में ऑक्सीजन क्षमता को बढ़ाकर तीन गुना कर दिया गया है. पहले हमारे पास 20 हज़ार लीटर का ऑक्सीजन टैंक था, लेकिन अब 53 हज़ार लीटर का टैंक है. इस टैंक से क़रीब 1500 बेड के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई दी जा सकती है."

वे कहते हैं, "जीटीबी अस्पताल के पास अलग से भी एक 53 हज़ार लीटर ऑक्सीजन टैंक है, ज़रूरत पड़ने पर दूसरे अस्पतालों को भी यहां से ऑक्सीजन की सप्लाई दी सकती है."

टेस्टिंग का क्या है हाल?

शुरुआत में कोविड के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट में कई दिनों का वक्त लग रहा था, उसकी एक वजह थी कि भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी.

इस वक्त देश में इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च से मान्यता प्राप्त 3,393 लैब हैं, जो कोविड टेस्ट कर रहे हैं.

क्लिनिकल वायरोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. एकता गुप्ता कहती हैं, "आईसीएमआर ने जो कोविड आरटी-पीसीआर नेटवर्क बनाया है वो काफी हद तक बन चुका है. हम लोग बारकोड जेनरेटेड रिपोर्ट बना रहे हैं. मरीज़ की आईसीएमआर आईडी से मरीज़ की डिटेल ऑनलाइन भी पता की जा सकती हैं."

आज की तारीख़ में भारत एक महीने में क़रीब 5 करोड़ कोविड टेस्ट कर सकता है. अब तक देश में 90 करोड़ कोविड टेस्ट किए जा चुके हैं.

केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए सैंपल्स लैब्स में भेजने के लिए कहा है ताकि वेरिएंट और सबवेरिएंट के बारे में पता लगाया जा सके.

नए कोविड वेरिएंट का पता लगाने के लिए भारत में इंडियन sars-cov-2 जीनोमिक्स कॉन्सोशियम (INSACOG) का गठन किया गया है. इसमें कोविड वायरस की जीनोमिक वेरिएशन पर नज़र रखने के लिए देशभर की 54 लैबोरेट्रीज़ मिलकर काम कर रही हैं.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ लीवर एंड बिलिअरी साइंसेज अस्पताल की लैब भी इसका हिस्सा है. इस लैब से जुड़ी क्लिनिकल वायरोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. एकता गुप्ता कहती हैं, "हमें दिल्ली के हर पॉजिटिव कोविड केस का जीनोम सीक्वेंसिंग करने के लिए कहा गया है. हम लोग नए वेरिएंट का पता करने के लिए रैंडम सैंपलिंग भी लगातार करते आ रहे हैं, फिलहाल उसमें कुछ नया दिखाई नहीं दिया है."

हालांकि अभी भारत में कोरोना के केस चीन और जापान की तरह नहीं बढ़ रहे हैं लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हमें अभी से सतर्क होने की जरूरत है.

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