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कोरोना के इलाज के नाम पर भारत के लोग कितना क़र्ज़ में डूबे?
- Author, अर्जुन परमार
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
अहमदाबाद के मयंक पटेल के जीवन में इस साल मई का महीना किसी तूफ़ान की तरह आया. 38-39 साल के मयंक ने इसी महीने अपनी पत्नी को खो दिया. उनकी पत्नी की मौत कोरोना संक्रमण के चलते हो गई, जिन्हें कई तरह की गंभीर समस्याएं उभर आयी थीं.
मिनरल वाटर के कारोबारी मयंक को एक निजी अस्पातल में पत्नी का इलाज कराने के लिए चार लाख रुपये उधार लेने पड़े. उन्होंने डेढ़ लाख के ज़ेवर गिरवी रखे थे और बाक़ी के ढाई लाख रुपये स्थानीय साहूकारों से ऊंची ब्याज दरों पर उधार लिए थे. इसके लिए उन्होंने प्रति महीने छह हज़ार रुपये ब्याज का भुगतान करना पड़ रहा था. इन सबके बाद भी वह अपनी पत्नी को नहीं बचा सके.
मयंक कोई अकेले नहीं हैं, कोरोना संक्रमण के दौर में हम लोगों के सामने ऐसी कई हृदय विदारक कहानियां देखने को मिलीं. आपके आस-पड़ोस में भी कई लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने अपने परिवार के लोगों को कोरोना की बीमारी से बचाने के लिए ब्याज के पैसे लिए हों और उनमें से कुछ अभी भी क़र्ज़ में दबे हो सकते हैं.
चौंकाने वाले हैं आंकड़े
निजी क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों ने कोरोना संक्रमण के दौरान अपने परिवार वालों के इलाज के लिए कितना क़र्ज़ लिया, इसका कोई निश्चित आंकड़ा मौजूद नहीं है. लेकिन जानकारों के अनुमान के मुताबिक़, यह आंकड़ा लाखों करोड़ में हो सकता है.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, कोरोना के इलाज के नाम पर निजी अस्पतालों में मनमाना पैसा वसूलने के चलते यह संभव है और महामारी के प्रबंधन में सरकार की विफलता इसके लिए समान रूप से दोषी है. हालांकि, दूसरी ओर केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों का दावा है कि लाखों लोगों को मुफ़्त चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई गई.
कोरोना संक्रमण के दौरान, हालांकि भारत के विभिन्न राष्ट्रीय बैंकों की ओर से भी इलाज के लिए ऋण देने की कई योजनाएँ शुरू की गई थीं. बीबीसी गुजराती ने इस बारे में जानकारी के लिए सूचना के अधिकार के तहत आवेदन किया था, जिसके जवाब में कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आईं.
सूचना अधिकार के तहत उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक़, अकेले मई 2021 से अगस्त 2021 तक 2,38,369 लोगों ने अपने या अपने परिवार वालों के इलाज के लिए 41,96,48,84,307 रुपये का ऋण मिला.
यह रक़म कितनी बड़ी है? यह आंकड़ा गुजरात जैसे विकसित राज्य के कुल स्वास्थ्य बजट का क़रीब 30 फ़ीसद है. और यह रकम बतौर ऋण आम लोगों ने राष्ट्रीय बैंकों से केवल तीन महीनों में लिए.
बीबीसी गुजराती ने कोरोना प्रबंधन को लेकर सरकार के प्रदर्शन और और आम लोगों के हालात को समझने के लिए कुछ विशेषज्ञों से भी बात की.
भारतीय स्टेट बैंक बना सबसे बड़ा ऋणदाता
अप्रैल से जून 2021 की अवधि भारत के हर नागरिक को एक बुरे सपने के रूप में लंबे समय तक याद रहेगी. इस दौरान, भारत में कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप देखने को मिला था और देश भर में लाखों लोगों की मौत हुई.
श्मशान-कब्रिस्तान के बाहर लाशों की क़तारें, नये उभरते अस्पताल, अपनों को खोने वालों की चीखें इतनी बढ़ गईं कि पूरी दुनिया में इसकी चर्चा होने लगी थी.
इसी दौरान कई लोग अपने परिवार के लोगों के इलाज के लिए उधार पर पैसे लेने को मजबूर थे. पैसों की कमी को देखते हुए कई राष्ट्रीय बैंकों ने कोरोना के इलाज के लिए क़र्ज़ देना शुरू कर दिया.
उल्लेखनीय है कि इस योजना के तहत विभिन्न राष्ट्रीय बैंकों ने आयकर दाताओं, पेशेवरों, नौकरी चाहने वालों और पेंशनभोगियों को कोरोना के इलाज के लिए 25,000 रुपये से लेकर पांच लाख रुपये तक का ऋण देना शुरू कर दिया था. इस पैसे के लिए 8.5 प्रतिशत से 9.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की ब्याज दरें रखी गईं.
आरटीआई आवेदन के तहत प्राप्त जानकारी को नीचे दी गई तालिका में दिखाया गया है.
ये है राष्ट्रीय बैंकों से लिए गए क़र्ज़ का ब्योरा. लेकिन देश के कई हिस्सों में कई लोगों ने अपने या अपने परिवार वालों के इलाज के लिए निजी क़र्ज़दाताओं से भी क़र्ज़ लिया. इससे संबंधित कई ख़बरें कई अख़बारों में छपीं और साथ ही सोशल मीडिया पर वायरल हुई.
कितने लोगों ने बैंक से ऋण लिया?
बीबीसी ने कुछ विशेषज्ञों से यह पता लगाने के लिए संपर्क किया कि मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के सरकार के दावे को देखते हुए इतने लोगों को कोरोना के इलाज के लिए ऋण लेने की आवश्यकता क्यों हुई? क्या ये आंकड़े सरकार की नाकामी को नहीं दर्शाते?
भारतीय जन स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक डॉ. दिलीप मावलंकर का कहना है कि सिर्फ़ तीन महीने में लोगों ने कोरोना से लड़ने के लिए जो क़र्ज़ लिया, वह चौंकाने वाला है. साथ ही उन्होंने कहा कि यह आंकड़ों में मौजूद क़र्ज़ है, वास्तविकता में आंकड़ा इससे कई गुना ज़्यादा हो सकता है.
डॉ. मावलंकर कहते हैं, ''यह आंकड़ा दर्शाता है कि बहुत सारे लोगों ने अनावश्यक ख़र्च किया. साथ ही, ये आंकड़े सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति लोगों के अविश्वास की कहानी बयान करते हैं.''
उन्होंने कहा, "सरकार को इस बार की समस्या से सबक़ लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसा दोबारा न हो."
वहीं अर्थशास्त्री इंदिरा हिर्वे के मुताबिक़, ये आंकड़े सरकार की नाकामी को दर्शाते हैं. उन्होंने कहा, "लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है. ये आंकड़े साबित करते हैं कि सरकार बुरी तरह नाकाम रही. सरकार को अपनी प्राथमिकताओं का निरीक्षण करना चाहिए और अपनी प्राथमिकताओं को ठीक ढंग से तय करना चाहिए."
इंदिरा हिर्वे यह भी कहती हैं, "लोगों को उनके ख़र्च के भुगतान की व्यवस्था होनी चाहिए और सरकार को वित्तीय नुकसान की भरपाई के लिए आगे आना चाहिए. साथ ही, निजी अस्पतालों में इलाज के ख़र्च की सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता है. "
वे कहती हैं, "महामारी के समय लोगों से मनमाने तरीके से राशि वसूल नहीं की जानी चाहिए. सरकार को इस पर अंकुश लगाने और सही ढंग से चलाने की व्यवस्था करनी चाहिए थी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ."
मोदी सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2021 तक आयुष्मान भारत के तहत देश भर में सात लाख से अधिक लोगों का इलाज किया गया.
राज्य और केंद्र सरकार के मंत्रियों ने दावा किया कि सरकार इस बीच अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है. इस दौरान ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में हज़ारों मरीज़ों की मौत हो गई, जिसे संसद में ख़ारिज कर दिया गया. इसे सब ने देखा.
हालांकि, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गंगा में बहती लाशों और गंगा के किनारे दबे शवों की ओर ध्यान दिलाते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराने की कोशिश ज़रूर की.
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