इंडोनेशिया ने भारत के इस रुख़ को लेकर क्यों जताई नाराज़गी- प्रेस रिव्यू

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इंडोनेशिया की विदेश मंत्री रेत्नो मर्सुदी ने कहा है कि भारत समेत दूसरे देशों को म्यांमार पर एक अलग रुख़ अख़्तियार करने की जगह आसियान गुट की नीतियों का सम्मान और पालन करना चाहिए.
अंग्रेजी अख़बार द हिंदू में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, इंडोनेशिया की विदेश मंत्री का ये बयान भारत की ओर से म्यांमार की सैन्य सरकार के साथ संपर्क बनाने वाले फ़ैसले के बाद आया है.
म्यांमार में सैन्य सरकार ने साल 2021 के फ़रवरी महीने में आंग सान सू ची के नेतृत्व वाली नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट को सत्ता से बाहर कर दिया था.
मर्सुदी ने कहा है कि भारत सरकार का ये फ़ैसला आसियान देशों की ओर से लोकतंत्र की दिशा में किए जाने वाले प्रयासों को कमतर करता है.
उन्होंने कहा कि भारत समेत अन्य देशों को आसियान देशों के पाँच सूत्री सहमति का पालन करना चाहिए.
इसमें हिंसा को तत्काल प्रभाव से रोके जाने, सभी पक्षों के साथ संवाद स्थापित किए जाने, विशेष दूत की नियुक्ति किए जाने, आसियान देशों की ओर से मानवीय सहायता उपलब्ध कराए जाने और म्यांमार में सभी पक्षों के साथ मुलाक़ात के लिए विशेष दूत के दौरे की व्यवस्था किया जाना शामिल है.
मर्सुदी ने द हिंदू से बातचीत में कहा, "आसियान के सदस्य देशों को हमारा संदेश ये है कि आसियान के प्रयासों का समर्थन किया जाए क्योंकि अगर आप इससे अलग कुछ करेंगे तो उससे हमारा असर कम होगा और म्यांमार को इस राजनीतिक संकट से बाहर करने में मदद नहीं मिलेगी."
मर्सुदी ने ये भी बताया कि पिछली सितंबर में उनकी इस बारे में विदेश मंत्री एस जयशंकर से बात हुई थी.
यही नहीं, इस साल की शुरुआत में बिम्सटेक वर्चुअल समिट में म्यांमार के विदेश मंत्री को बुलाए जाने पर आसियान के सदस्य देशों और अमेरिका ने भारत और श्रीलंका से अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं.
बिम्सटेक में सात दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्वी एशियाई देश शामिल हैं.
बीते नवंबर में भारतीय विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने म्यांमार की राजधानी नेपिडॉ का दौरा किया था.

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लेकिन उन्होंने अपने इस दौरे में अपदस्थ राजनीतिक दलों से मुलाक़ात नहीं की जो एक बड़ा बदलाव है. इसके साथ ही उनके दौरे पर जारी किए गए बयान में आसियान देशों के पांच सूत्री सहमति का ज़िक्र नहीं था जबकि पुरानी प्रेस रिलीज़ में इसका ज़िक्रा हुआ करता था.
भारत सरकार के अधिकारी कहते रहे हैं कि भारत के लिए म्यांमार से संबंध बेहद अहम हैं क्योंकि दोनों के बीच ऐसी सीमा है जिसमें चरमपंथियों आते जाते रहते हैं, ऐसे में उसे दूसरे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों जैसे चीन की तरह सैन्य शासकों के साथ समन्वय बनाए रखने की ज़रूरत है.
इंडोनेशिया की विदेश मंत्री ने कहा है कि दोनों देशों ने आधारभूत ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को पूरा करने की दिशा में एक क़दम बढ़ाया है.
उन्होंने कहा है कि भारत और इंडोनेशिया ने चार साल से लंबित सेबांग बंदरगाह परियोजना को पूरा करने की दिशा में एक बड़ी अड़चन को दूर करने में कामयाबी हासिल की है. ये जगह भारत के दक्षिणतम बिंदू इंदिरा पॉइंट से दो सौ किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित है.
उन्होंने कहा कि पीएम मोदी और इंडोनेशियाई राष्ट्रपति जोको विडोडो की ओर से लॉन्च किए गए सेबांग बंदरगाह के लिए फीज़िबिलिटी स्टडीज़ पूरी कर ली गई है.
इस दिशा में दोनों देशों के संयुक्त टास्क फोर्स की मीटिंग आगामी 19 दिसंबर को होगी जिसमें भविष्य के क़दम तय किए जाएंगे.
मर्सुदी ने कहा, "ये सही है कि शुरुआती अध्ययनों को पूरा करने में लगने वाला चार साल का समय काफ़ी लंबा है. लेकिन इंडोनेशियाई लोग निराश नहीं होते. ऐसे में उम्मीद है कि निर्माण कार्य जल्द ही शुरू होगा.
उन्होंने कहा कि इंडोनेशियाई शहर मेदान में कुआला नामू हवाई अड्डे को बनाने के लिए पांच अरब डॉलर के इंडो-फ्रैंच ज्वॉइंट वेंचर (जीएमआर ग्रुप कंसोर्टियम प्रतिबंधित) और पांच सौ मिलियन डॉलर वाला सोलर पैनल एनर्जी प्रोजेक्ट भी रास्ते में है.

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वीरभद्र की पत्नी प्रतिभा सिंह क्यों नहीं बनीं मुख्यमंत्री
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने के बाद सुखविंदर सिंह सुक्खू ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. इसके साथ ही विपक्ष के नेता रहे मुकेश अग्निहोत्री ने उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है.
इस शपथ ग्रहण समारोह में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे आदि शामिल हुए. लेकिन इन दोनों नेताओं का नाम सामने आने से पहले प्रतिभा सिंह और उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह का नाम चल रहा था. लेकिन आख़िर में सुखविंदर सिंह सुक्खू मुख्यमंत्री बन गए.
अमर उजाला में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, सुख्खू और अग्निहोत्री का नाम सामने आने के बाद से सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह के नाम पर चुनाव लड़ा तो उनके परिवार में से किसी को मुख्यमंत्री या उप-मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया.
इसे समझने के लिए हमने हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण गोपाल ठाकुर से बात की.
उन्होंने कहा, 'प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री न बनाना काफ़ी हद तक लोगों को समझ में आता है, लेकिन विक्रमादित्य का नाम डिप्टी सीएम से भी बाहर होना एक बड़ा सियासी संदेश है. इसके कई मायने निकाले जा सकते हैं.'
कांग्रेस आला कमान किसी भी हालत में अभी उपचुनाव नहीं चाहती है. सुखविंदर सिंह सुक्खू विधायक चुने जा चुके हैं, जबकि प्रतिभा सिंह अभी सांसद हैं. अगर प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री बनाया जाता, तो कांग्रेस को दो उपचुनाव कराने पड़ते. पहला विधानसभा और दूसरा मंडी लोकसभा सीट पर. इस बार हिमाचल प्रदेश में हुए चुनाव में मंडी लोकसभा क्षेत्र में पड़ने वाली 17 में से 12 विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत हुई है. मतलब अगर उपचुनाव होते तो कांग्रेस को ये सीट हारने का डर था. वहीं, विधानसभा के अन्य सीटों पर भी जो जीत मिली है, वो बहुत कम मार्जिन से मिली है. ऐसे में उपचुनाव में भी हार का डर था.
कांग्रेस पर हमेशा से परिवारवाद का आरोप लगता रहा है. प्रतिभा सिंह के पति वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे. उनके बेटे भी विधायक हैं और खुद प्रतिभा सिंह सांसद हैं. ऐसे में अगर प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री या विक्रमादित्य को उप मुख्यमंत्री बनाया जाता तो एक बार फिर से कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता.
कांग्रेस ने हिमाचल के चार में से तीन लोकसभा क्षेत्रों में पड़ने वाली विधानसभाओं में बेहतर प्रदर्शन किया. वह भी तब जब इन तीनों लोकसभा पर भाजपा का कब्जा है. लेकिन जहां से कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह सांसद हैं, वहां काफी खराब रिजल्ट गया. मंडी लोकसभा की 17 में से 12 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को हार मिली.

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पोक्सो के 25 फीसद मामलों में रोमांटिक रिश्ते: यूनिसेफ़
यूनिसेफ़ इंडिया ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल, असम और महाराष्ट्र में पॉक्सो एक्ट का हर चार में से एक मामला रोमांटिक केस या प्रेम संबंध से जुड़ा होता है जिसमें पीड़ित को आरोपी के साथ सहमति से संबंध होता है.
जनसत्ता अख़बार में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, इस रिपोर्ट में एक चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि इन रोमांटिक केस से संबंधित मामलों में से आधों में पीड़िता की उम्र 16 से 18 साल के बीच होती है.
इस अध्ययन में शोधार्थियों ने साल 2016 से 2020 के बीच असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज 7064 फैसलों को जांचा और परखा.
इस दौरान पाया गया कि क़रीब 1715 मामलों में कोर्ट के दस्तावेजों के अध्ययन से पता चलता है कि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच में सहमति से बने संबंध थे.
इस अध्ययन में यह बात भी पता चली है कि 1508 मामलों में पीड़ित लड़की ने मामले की जांच के दौरान या फिर सबूत जुटाने के दौरान या दोनों में ही कबूल किया था कि आरोपी के साथ उसके प्रेम संबंध थे.
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