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वर्ल्ड कप: तानाशाह सरकारें और 'फ़ीफ़ा' का विवादित इतिहास
- Author, लेटिसा मोरी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, ब्राज़ील
जब 12 साल पहले क़तर को सन 2022 के फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप की मेज़बानी के लिए चुना गया था तब से उस देश के मानवाधिकार से संबंधित रिकॉर्ड के कारण उसकी आलोचना की जाती रही है.
क़तर की आलोचना सिर्फ़ देश की महिलाओं और समलैंगिकों के अधिकारों पर उसके रुख़ के कारण ही नहीं बल्कि वर्ल्ड कप के लिए स्टेडियम तैयार करने वाले मज़दूरों के काम के हालात पर भी उसकी आलोचना हुई है.
आपको बता दें क़तर में समलैंगिकता अपराध है.
मज़दूरों के साथ रवैये को लेकर मानवाधिकार की अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन परिस्थितियों को अमानवीय और दासता के समान बताया है.
इसके साथ साथ प्रतियोगिता की व्यवस्था देखने वाली संस्था फ़ीफ़ा (इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ एसोसिएशन ऑफ़ फ़ुटबॉल) के क़तर सरकार के प्रति रवैये पर कई प्रदर्शनों हुए हैं.
फ़ुटबॉल की वैश्विक संस्था आमतौर पर मेज़बान देशों पर विभिन्न प्रकार के नियम लागू करती है जो अक्सर उन देशों के स्थानीय क़ानूनों से टकराते हैं. लेकिन क़तर में फ़ीफ़ा ने टूर्नामेंट शुरू होने से दो दिन पहले शाही सरकार की ओर से स्टेडियमों में शराब की बिक्री पर पाबंदी की घोषणा को बिना किसी रुकावट के मान लिया था.
और खिलाड़ियों पर मैचों के दौरान किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी.
जर्मनी की फ़ुटबॉल टीम के खिलाड़ियों ने इस पाबंदी के ख़िलाफ़ प्रतीकात्मक प्रदर्शन करते हुए टीम के पहले मैच की आधिकारिक तस्वीर लेने के दौरान अपने मुंह को हाथों से ढंक लिया था.
जर्मन टीम के बहुत से सदस्य मैच के दौरान समलैंगिकों के अधिकारों के लिए 'वन लव' ब्रेसलेट पहनकर खेलना चाहते थे लेकिन फ़ीफ़ा ने इस ब्रेसलेट के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ साओ पॉवलो में इतिहास के प्रोफ़ेसर और फ़ुटबॉल के खेल के इतिहासकार फ़्लाविओ डी कैम्पोस कहते हैं, "फ़ीफ़ा को मानवाधिकार से कोई सरोकार नहीं क्योंकि यह कारोबार के लिए ज़रूरी नहीं." उनका कहना है, "जब गतिविधियों या कार्यक्रमों के आयोजन की बात आती है तो संस्था इन सभी समस्याओं को एक तरफ़ रख कर बहुत व्यावहारिकता का प्रदर्शन करती है.'
कैम्पोस न सिर्फ क़तर में होने वाले विश्वकप की ओर इशारा करते हैं बल्कि इस सच्चाई की तरफ़ भी इशारा करते हैं कि पहली वर्ल्ड कप चैंपियनशिप के बाद से फ़ीफ़ा को मानवाधिकारों का हनन करने वाली तानाशाह सरकारों के साथ संबंध रखने में कोई समस्या नहीं.
हम उनमें से कुछ सरकारों के साथ फ़ुटबॉल की वैश्विक संस्था फ़ीफ़ा के इतिहास का जायज़ा लेते हैं.
अर्जेंटीना 1978
सन 1978 में अर्जेंटीना पर एक सैन्य तानाशाही का शासन था जो दो साल पहले एक विद्रोह के द्वारा सत्ता में आई थी. फ़ीफ़ा ने इसके बावजूद उस देश में विश्वकप करवाने का फ़ैसला किया था.
कैम्पोस कहते हैं, "हालांकि वहां बड़े पैमाने पर हिंसा और अत्याचार हो रहा था, फिर भी विश्वकप टूर्नामेंट वहां खेला गया था. सरकार क्या कर रही है और क्या कर सकती है, इससे कोई मतलब नहीं है जब तक पैसा बनाया जा सकता है और आर्थिक गतिविधि का वर्चस्व है."
उस समय देश की राजनीतिक स्थिति काफ़ी अस्थिर थी और देश में लापता युवकों की माएं बराबर प्रदर्शन कर रही थीं.
अर्जेंटीना में उस समय फ़ुटबॉल की विश्व प्रतियोगिता का आयोजन विभिन्न विवादों और समस्याओं में घिरा रहा था जैसे कि अंतिम समय तक बहुत से स्टेडियम खेलने के लिए लायक़ नहीं बने थे और कुछ में नई लगाई गई घास मैचों के दौरान ही उखड़ गई थी.
सरकार पर अर्जेंटीना की राष्ट्रीय टीम का समर्थन करने का आरोप भी लगाया गया था क्योंकि अन्य बातों के साथ साथ मेजबान टीम के सभी मैच ब्यूनस आयर्स में खेले गए थे जबकि उनके विरोधियों को देश के दूसरे हिस्सों की यात्रा करनी पड़ी थी.
हालांकि अर्जेंटीना के चुनाव कई साल पहले हुए थे लेकिन तानाशाही के अपराधों के कारण फ़ीफ़ा के उस समय के अध्यक्ष जुआओ हैवलंज पर प्रतियोगिता का स्थान यूरोप स्थानांतरित करने के लिए दबाव डाला गया था लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
कैम्पोस बताते हैं कि ऐसा क़दम उठाना असंभव नहीं होता, जैसा कि उसके बाद हुआ था जब 1986 में कोलंबिया वर्ल्ड कप की मेजबानी से अलग हो गया था और उसे मेक्सिको में आयोजित किया गया था.
सन 1978 का फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप का उत्सव भी बिना किसी प्रदर्शन के नहीं हुआ था.
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्राज़ीलिया में इतिहास के प्रोफ़ेसर मेटेविस गाम्बा टोरीस बताते हैं कि विश्वकप के बायकॉट के लिए एक मज़बूत मुहिम चलाई गई थी.
वह याद करते हुए कहते हैं, "बहुत से अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन हुए थे. कुछ खिलाड़ी बायकॉट में शामिल हुए और खेलने नहीं गए. और दूसरे जो बायकॉट से बाहर रहकर प्रतियोगिता में शामिल हुए उन्होंने प्लाज़ा डी मेयो में होने वाले प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था."
इस इतिहासकार ने उस समय अर्जेंटीना पर शासन करने वाले तानाशाह के बारे में बताते हुए कहा, "फ़ाइनल में पहुंचने वाली हॉलैंड की टीम ने घोषणा की थी कि अगर वह जीत गई तो उसके खिलाड़ी विडेला से वर्ल्ड कप की ट्रॉफ़ी ग्रहण नहीं करेंगे. (जॉर्ज रफ़ाल विडेला उस समय अर्जेंटीना के सैन्य शासक थे और प्लाज़ा डी मेयो वहीं का शहर है).
अंततः एक स्थानीय टीम (अर्जेंटीना) ने यह वर्ल्ड कप जीती और तानाशाह ने ही उन्हें ट्रॉफ़ी दी थी.
"बहुत अधिक लोकतंत्र"
इटली 1934
सन 1934 में दूसरा फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप टूर्नामेंट फ़ासीवादी तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी की सरकार में इटली में आयोजित हुआ था.
मुसोलिनी अपने देश की मेज़बानी के लिए इतने संकल्पित थे कि उन्होंने फ़ीफ़ा के साथ बातचीत के लिए एक जनरल जियोर्जियो विकारो को इटली फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन का अध्यक्ष बना दिया था.
विकारो ने इस प्रतियोगिता में बड़ी पूंजी लगाने का वादा किया और 1932 में इटली ने स्वीडन को विश्व कप की मेज़बानी के मुक़ाबले में हरा दिया था.
रूस 2018
कैम्पोस रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भी एक तानाशाह सरकार के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं जिनके साथ फ़ीफ़ा ने रूस 2018 के वर्ल्ड कप के आयोजन के लिए साझेदारी का फ़ैसला किया था.
उनका कहना है, "हालांकि काग़ज़ पर रूस एक लोकतांत्रिक देश है और वहां चुनाव अब भी होते हैं मगर उसे एक तानाशाह सरकार माना जा सकता है क्योंकि व्लादिमीर पुतिन जो पिछले 22 साल से देश पर शासन कर रहे हैं, उन्होंने अपनी सत्ता को बरक़रार रखने के लिए अनगिनत तिकड़म लगाए हैं."
2018 में भी यूक्रेन पर हमले से बहुत पहले राजनीतिक विरोधियों पर अत्याचार व उनका दमन करने, प्रेस को नियंत्रित करने और समलैंगिक समुदाय के लिए मुश्किल स्थिति पैदा करने और उन पर कड़ी निगरानी रखने के कारण पुतिन के रूस को आलोचना का सामना करना पड़ा था.
इसके साथ-साथ उस पर सूचनाओं को नियंत्रित करने और अमेरिकी चुनाव में हस्तक्षेप के आरोप भी लगे थे.
"बहुत अधिक लोकतंत्र"
पूरी तरह तानाशाही वाले देशों में विश्व कप का आयोजन यह सिद्ध करता है कि लोकतंत्र की कमी को न सिर्फ़ एक समस्या समझा जाता है बल्कि इतिहासकारों के अनुसार उसे फ़ीफ़ा के सकारात्मक पहलू के तौर पर भी देखा जा सकता है.
ख़ुद फ़ीफ़ा ने भी यह स्वीकार किया है कि वह 'बहुत अधिक लोकतंत्र' को एक 'समस्या' समझती है.
सन 2013 में इस संस्था के उस समय के महासचिव जेरोम वाल्के ने कहा था, "बहुत अधिक लोकतंत्र विश्वकप के संस्था में रुकावट बन सकता है."
वाल्के ने एक समारोह में घोषणा करते हुए कहा था, "मैं कुछ कहने जा रहा हूं जो कुछ अजीब है लेकिन कम लोकतंत्र कभी-कभी विश्वकप के आयोजन के लिए बेहतर होता है."
उन्होंने कहा था, "जब आपके पास एक शक्तिशाली राष्ट्रीय अध्यक्ष है, जो निर्णय ले सकता है जैसा कि पुतिन 2018 में कर सकते हैं, यह हमारे लिए, व्यवस्थापकों के लिए आसान है."
उन्होंने सन 2014 में ब्राज़ील में प्रतियोगिता के आयोजन में होने वाली परेशानियों की ओर संकेत किया जिसमें विश्वकप के ख़िलाफ़ प्रदर्शन और 2014 के वर्ल्ड कप से पहले स्टेडियम के निर्माण में मज़दूरों की हड़ताल शामिल थी.
उन्होंने दावा किया था, "ब्राज़ील में विभिन्न लोग, विभिन्न आंदोलन और विभिन्न स्वार्थ हैं, और इन परिस्थितियों में वर्ल्ड कप का आयोजन काफी मुश्किल था."
बीबीसी ने उस समय फ़ीफ़ा से वाल्के के बयान और तानाशाह सरकारों के साथ उनके संबंधों के लिए होनी वाली आलोचना पर टिप्पणी मांगी थी लेकिन जवाब नहीं मिला था हालांकि कई अवसरों पर फ़ीफ़ा के वर्तमान अध्यक्ष गियानी इनफ़ान्टिनो ने संस्था के रुख़ और क़तर के प्रवासी श्रमिकों, समलैंगिक लोगों और महिलाओं के साथ बर्ताव पर होने वाली आलोचनाओं का जवाब दिया है. इनफ़ान्टिनो ने, जो स्विस और इतालवी हैं, विश्व कप के उद्घाटन समारोह की शाम 19 नवंबर को दोहा में एक संबोधन में विश्वास दिलाया था कि वह जानते हैं कि किसी के विरुद्ध भेदभावपूर्ण बर्ताव करना क्या होता है और इससे कैसा महसूस होता है क्योंकि "मेरे बाल लाल होने और मेरे चेहरे पर झुर्रियां होने पर मुझे भी स्कूल में तंग किया जाता था."
उन्होंने कहा, "आज मैं ख़ुद को क़तरी, एक अरब, एक अफ़्रीकी, एक समलैंगिक, एक विकलांग महसूस करता हूं. मैं ख़ुद को एक प्रवासी मज़दूर महसूस करता हूं."
इनफ़ान्टिनो ने एक और अवसर पर इस बात की भी पुष्टि की कि क़तर में वर्ल्ड कप का आयोजन एक सकारात्मक बात है क्योंकि इस आयोजन की ओर ध्यान केंद्रित होने के कारण देश में मानवाधिकारों के संबंध में 'बहुत प्रगति' हुई है.
फ़ीफ़ा ने क्या हासिल किया?
प्रोफ़ेसर कैम्पोस का विचार है कि फ़ीफ़ा के पास तानाशाह सरकार वाले देशों का चयन करने का एक आर्थिक कारण है क्योंकि ऐसे देश बड़ा पूंजी निवेश करते हैं जबकि लोकतांत्रिक देशों में आमतौर पर आयोजन के लिए जनता के पैसे के इस्तेमाल के बारे में बहुत पारदर्शिता बरतनी पड़ती है और वहां बहुत जांच-पड़ताल होती है.
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्राज़ीलिया से संबंध रखते वाले मेटिस गाम्बा टोरीस कहते हैं, "तानाशाह सरकारें बहुत अधिक पैसा खर्च करती हैं. उनकी निगरानी करने वाला कोई नहीं होता. जरा देखें कि क़तर ने 2022 में कितनी पूंजी लगाई है (220, 000 मिलियन अमेरिकी डॉलर, इतिहास का सबसे महंगा वर्ल्ड कप). और 1978 में अर्जेंटीना ने उन देशों की तुलना में कहीं अधिक पूंजी लगाई थी जिन्होंने उस का आयोजन चार और आठ साल बाद किया था."
टोरीस बताते हैं, "एक तानाशाह देश में हर बात को सेंसर किया जाता है, कोई डेटा उजागर नहीं किया जाता. काम करने वाले हड़ताल पर जाने की सोचते भी नहीं और अगर कोई ऐसा करता है तो उसे कठोरता से दबाया जाता है."
वह कहते हैं, "फ़ीफ़ा को मानवाधिकारों की कोई परवाह नहीं. वह चाहते हैं कि स्टेडियम टिकट बेचने के लिए तैयार हों और स्पॉन्सरशिप मिलती रहे."
इसके साथ वह कहते हैं कि तानाशाह सरकारों में कारोबारी दृष्टि से भी कुछ ख़तरे होते हैं.
वह कहते हैं, "एक तानाशाही में स्थायित्व और अनुबंधों को पूरा करने का अभाव है. उदाहरण के लिए शराब पर पाबंदी को ही ले लें जिसकी घोषणा क़तरने वर्ल्ड कप शुरू होने से दो दिन पहले की थी. यह स्पॉन्सर्स के लिए अच्छा नहीं हुआ होगा."
कैम्पोस कहते हैं के वह अपने संबोधनों में कह सकते हैं कि वर्ल्ड कप की बदौलत मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार आया है लेकिन यह पाखंड है क्योंकि फ़ीफ़ा ने कभी भी इसकी मांग नहीं की.
"और वहां फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप के आयोजन का फ़ैसला करके वह उन सरकारों को उचित घोषित करते हैं."
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