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मोदी सरकार ने गांधी परिवार से जुड़े एनजीओ को लेकर यह फ़ैसला क्यों लिया
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने राजीव गांधी फ़ाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट के एफ़सीआरए लाइसेंस रद्द कर दिए हैं. ये दोनों ही एनजीओ गांधी परिवार से जुड़े हैं और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी इनकी अध्यक्ष हैं.
इन दोनों संगठनों पर विदेशी चंदा लेने में गड़बड़ी करने का आरोप लगाया गया है.
फ़ॉरन कंट्रिब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट यानि एफ़सीआरए लांइसेंस रद्द होने के बाद अब ये विदेश से कोई चंदा नहीं ले सकेंगे.
कांग्रेस पार्टी ने सरकार के इस क़दम को असल मुद्दे से भटकाने की कोशिश बताया है.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक बयान जारी कर कहा है, "यह किसी को बदनाम करने और आम लोगों को दैनिक ज़रूरतों के मुद्दों से भटकाने लिए किया गया है."
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे राजनीतिक वजहों से उठाया गया क़दम बताया है. गहलोत ने ट्वीट किया है कि ऐसे क़दमों से मोदी सरकार जनता की नज़रों में ख़ुद को एक्सपोज़ कर रही है.
वहीं बीजेपी ने गृह मंत्रालय के इस क़दम का स्वागत किया गया है. पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि क़ानून से उपर कोई भी नहीं हो सकता है.
ख़बरों के मुताबिक़ आरजीएफ़ और आरजीसीटी को विदेशों से मिलने वाले चंदे पर बीजेपी पहले भी आरोप लगा चुकी है.
कांग्रेस की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है कि 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी फ़ाउंडेशन बना था.
इसका मक़सद उस दुखद हत्याकांड के बाद देश के लोगों में और दूसरे देशों के साथ आपसी प्रेम को बढ़ाना था.
इसके अलावा यह विज्ञान और तकनीक की मदद से भारत का विकास करने, युवाओं और महिलाओं को ताक़तवर बनाने और प्राकृतिक आपदा के समय लोगों को मदद पहुँचाने के लिए बना था.
कांग्रेस का दावा है इन दोनों एनजीओ के सारे कामकाज़ पारदर्शी रहे हैं और इनमें सारे नियमों का पालन किया गया है.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बयान जारी कर रहा है कि इससे कांग्रेस की 'भारत जोड़ो' यात्रा को भटकाया नहीं जा सकता और वह जारी रहेगा.
राजीव गांधी फ़ाउंडेशन की स्थापना
राजीव गांधी फ़ाउंडेशन की स्थापना 21 जून 1991 को हुई थी. नई दिल्ली के जवाहर भवन में इसका दफ़्तर बनाया गया था.
फ़ाउंडेशन की वेबसाइट के मुताबिक़ 1991 से 2009 तक इसने कई क्षेत्रों में काम किए है.
मसलन स्वास्थ्य, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक, महिलाओं और बच्चों के विकास, विकलांगों की मदद, पंचायती राज जैसे कई अहम क्षेत्रों में इसने लोगों की मदद की है. 2010 के बाद के इसने शिक्षा पर ख़ास ज़ोर देना शुरू किया.
राजीव गांधी फ़ाउंडेशन में पूर्व प्रधानमंत्री, मनमोहन सिंह, कांग्रेस नेता पी चिदंबरम, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मोंटेक सिंह अहलुवालिया, अशोक गांगुली और सुमन दुबे भी ट्रस्टी हैं.
ज़ाहिर है इस फ़ाउंडेशन से जुड़े ज़्यादातर प्रभावशाली लोग कांग्रेस पार्टी के हैं. इनमें से कई लोग कांग्रेस या कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकारों में अहम पदों पर रहे हैं.
राजीव गांधी फ़ाउंडेशन के काम
आरजीएफ़ के वेबसाइट के मुताबिक़ इसने साल 1991-92 से शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े कई काम किए हैं.
दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में ज़रूरतमंदों को व्हीलचेयर और बाक़ी चींज़ें बाँटीं.
इसके अलावा इस एनजीओ ने उत्तर काशी में आए भूंकप पीड़ितों के बीच राहत सामग्री भी बाँटी थीं.
इसने 1992-92 के दौरान मुंबई, कोलकाता, भोपाल, हैदराबाद, मुंगेर और कानपुर में दंगा पीड़ितों के बीच तिरपाल, कंबंल, दवाएं और बर्तन बाँटे. इसके अलावा मुंबई दंगा पीड़ितों को आपातकालीन राहत पहुँचाया था.
1993-94 में एड्स और टीबी के मरीज़ों के लिए काम किया.
वेबसाइट पर मौजूद तस्वीरों में भी एनजीओ के काम में कांग्रेस के नेताओं की कई तस्वीरें दिखती हैं.
इस संगठन ने उत्तर-पूर्व के राज्यों की महिलाओं के रोज़गार के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाया है.
इसके अलावा दूर दराज़ के इलाक़ों में मरीज़ों के ऑपरेशन और इलाज के लिए लाइफ़ लाइन एक्सप्रेस ट्रेन चलवाए हैं.
वहीं केंद्र में 2004 में यूपीए की सरकार बनने के बाद इस संगठन के कामकाज़ का दायरा और बड़ा होता दिखता है.
इसनें ग्रामीण इलाक़ों में सैंकड़ों लाइब्रेरी की स्थापना की है और जम्मू-कश्मीर भूकंप पीड़ितों की मदद की.
आरजीएफ़ ने टीबी और एड्स को लेकर लोगों में जागरूकता और इलाज के लिए डॉक्टरों और कार्यकर्ताओं की ट्रेनिंग कराई है.
राजीव गांधी फ़ाउंडेशन के वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक़ इस संगठन को अप्रैल 2015 से जून 2022 तक कोई भी विदेशी चंदी नहीं मिला है.
राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट
राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना साल 2002 में हुई थी. इसकी वेबसाइट के मुताबिक़ इस ट्रस्ट को ख़ासकर देश के ग्रामीण इलाक़ों में वंचित और ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए बनाया गया है.
फ़िलहाल यह उत्तर प्रदेश और हरियाणा में राजीव गांधी विकास परियोजना (आरजीएमवीपी) और इंदिरा गांधी आई हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (आईजीईएचआरसी) के ज़रिये काम कर रहा है.
वेबसाइट में दावा किया गया है कि पिछले 13 साल में 'आरजीएमवीपी' लाखों लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालने में मदद की है.
इस ट्रस्ट में सोनिया गांधी के अलावा राहुल गांधी, अशोक गांगुली, बंसी मेहता और दीप जोशी ट्रस्टी हैं.
आरजीसीटी के वेबसाइट (https://www.rgct.in/) पर इसे मिलने वाले चंदे और ख़र्च का भी ब्यौरा दिया गया है. इसके अलावा एफ़सीआरए के तहत मिलने वाली रकम और ख़र्च की जानकारी भी वेबसाइट पर मौजूद है.
इस संगठन को साल 2020-21 में विदेश से कोई चंदा नहीं मिला है. जबकि इसे वित्त वर्ष 2019-20 में ब्रिटेन से 3,38,454 रुपये का चंदा मिला है.
वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक़ इस एनजीओ को अमेरिका, ब्रिटेन और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों से चंदा मिलता रहा है.
मोदी सरकार के दौर में NGO के लिए हुए कड़े फ़ैसले
1976 में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं तो पहली बार फ़ॉरन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेटरी एक्ट आया था.
साल 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने पहली बार एक कड़ा संशोधन लाया था. इसके तहत पॉलिटिकल नेचर की संस्थाओं की विदेशी फ़ंडिंग पर रोक लगा दी गई.
साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से कई ऐसे फ़ैसले लिए गए हैं, जिन्हें सिविल सोसायटी के लोग ग़ैर सरकारी संगठनों पर शिकंजा कसने की कोशिश मानते रहे हैं.
20 हज़ार संस्थाओं के लाइलेंस रद्द
मोदी सरकार के दौरान साल 2016 में 20 हज़ार एनजीओ के FCRA लाइसेंस रद्द कर दिए गए थे. यानी उनकी विदेशी फ़ंडिंग पर रोक लगा दी गई. सरकार ने कहा कि इन संस्थाओं ने फ़ॉरन फ़ंडिग से जुड़े नियमों का पालन नहीं किया है.
'बेन एंड' कंपनी की साल 2019 की इंडियन फ़िलेंट्रफि की रिपोर्ट बताती है कि साल 2015 से 2018 के बीच एनजीओ को मिलने वाले विदेशी फ़ंड में 40 फ़ीसद की कमी आई है.
जनवरी 2019 में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा को दिए गए एक जवाब में बताया था कि बीते तीन साल में 2872 ग़ैर-सरकारी संस्थाओं पर रोक लगाई गई है.
साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भुवनेश्वर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कह चुके हैं कि वो एनजीओ की साज़िश का शिकार हैं.
उन्होंने कहा था, ''एनजीओ वाले मुझे हटाने और मेरी सरकार गिराने की साज़िश रचते हैं. वो ग़ुस्सा हैं क्योंकि मैंने कुछ एनजीओ से उनकी विदेशी फ़ंड की जानकारी माँग ली है.''
एनजीओ की चिंता
भारत में साल 2020 में एफ़सीआरए संशोधन विधेयक को राज्यसभा ने पास कर दिया था. इसके मुताबिक़ अब ग़ैर-सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ के प्रशासनिक कार्यों में 50 फ़ीसद विदेशी फ़ंड की जगह बस 20 फ़ीसदी फ़ंड ही इस्तेमाल हो सकेगा.
यानी इसमें 30% की कटौती कर दी गई है. अब एक एनजीओ मिलने वाले ग्रांट को अन्य एनजीओ से शेयर भी नहीं कर सकेगी और एनजीओ को मिलने वाले विदेशी फ़ंड स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, नई दिल्ली की ब्रांच में ही रिसीव किए जाएंगे.
ये संस्थाएं देश में सामाजिक बदलाव लाने के लिए काम करती हैं लेकिन सिविल सोसायटी के लोगों का आरोप था कि नए नियम से भारत में एनजीओ के लिए एक असहज माहौल बनता जा रहा है.
इसी साल जनवरी में ग़ैर-सरकारी संगठन 'ऑक्सफ़ैम' की तरफ से ख़बर आई थी कि विदेशी फंड पाने वाले लाइसेंस को रद्द कर देने से उसके राहत कार्यों पर बहुत बुरा असर पड़ा है.
वहीं विदेशी चंदे को लेकर नियमों को सख़्त किए जाने से साल 2021 में कोविड महामारी के दौरान कई एनजीओ ने चिंता जताई थी.
'द एंट' (The Ant) एनजीओ की जेनिफ़र लियांग के मुताबिक़ यह क़ानून लोगों की जान ले रहा है. उनके मुताबिक़ नए क़ानून की वजह से कई संगठन सरकार को ऑक्सीजन तक नहीं दे सकते क्योंकि वो दिल्ली में नया बैंक अकाउंट नहीं खुलवा पा रहे हैं.
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