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पीएम मोदी ने जो चोला पहनकर केदारनाथ में पूजा की, वो क्या है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में स्थित विख्यात केदारनाथ मंदिर पहुँचे और पूजा की. भारतीय मीडिया में उनकी इस यात्रा का बड़े पैमाने पर सीधा (लाइव) प्रसारण किया गया.
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने बद्रीनाथ का भी दौरा किया. राज्य की दो दिवसीय यात्रा के दौरान पीएम मोदी कई परियोजनाओं का शिलान्यास भी करेंगे.
इनमें गौरीकुंड-केदारनाथ रोप-वे प्रोजेक्ट का उद्घाटन भी शामिल है. ऐसी ख़बर भी है कि प्रधानमंत्री आदि गुरु शंकराचार्य के समाधि स्थल पर भी जाएंगे.
इसके बाद पीएम मोदी ने भारत-चीन सीमा पर स्थित आख़िरी गाँव माणा में स्थानीय लोगों को संबोधित किया.
ये कोई पहला अवसर नहीं है, जब पीएम मोदी किसी मंदिर में गए हों और उन्हें विस्तृत कवरेज मिला हो. लेकिन इस बार कुछ लोगों का ध्यान यात्रा और पूजा के दौरान पीएम मोदी के कपड़ों पर गया.
पीएम मोदी ने जो कपड़ा पहना था, उसे चोला कहते हैं. ये हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र का लोकप्रिय पहनावा है.
हिमालय की गोद में बसी गद्दी जनजाति
हिमाचल प्रदेश की गद्दी जनजाति भेड़-बकरियों को पाल कर अपनी जीवन बसर करती है.
गद्दी गर्मियों के महीनों में धौलाधार की पहाड़ियों पर अपने मवेशियों के साथ रहते हैं, लेकिन ठंड के मौसम में धौलाधार की गगनचुंबी चोटियाँ बर्फ़ से ढँक जाती हैं.
जानवरों के लिए घास की तलाश में गद्दी बर्फ़ पड़ने से पहले ही मैदानों का रुख़ करते हैं. और कई महीनों तक अपनी भेड़-बकरियों के साथ हिमाचल के निचले इलाक़ों का रुख़ करते हैं.
गद्दी ट्राइब अपनी समृद्ध संस्कृति के लिए जानी जाती है. इसी संस्कृति का अहम हिस्सा है- गद्दियों की ख़ास वेशभूषा.
क्या है चोला और डोरा?
ऐसी मान्यता है कि गद्दियों के पूर्वजों ने लंबे समय तक शिव की आराधना की.
ओसी हांडा ने अपनी किताब- 'टेक्सटाइल्स, कॉस्टयूम एंड ओर्नामेंट्स ऑफ़ वेस्टर्न हिमालयाज़' में लिखते हैं कि जयस्तंभ नाम के इनके पूर्वज की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने जयस्तंभ को एक चोला, डोरा और टोपा भेंट किया.
कहा जाता है कि तब से ये तीनों यानी चोला, डोरा और टोपा गद्दी पुरुषों की वेशभूषा के अभिन्न अंग बन गए.
पुरुषों का चोला हाथ से काती हुई भेड़-बकरियों की ऊन से बनता है. भेड़ों से ऊन निकालने के बाद उसे मेहनत से काता जाता है.
कातने के बाद जो तैयार होता है, उसे पट्टी या पट्टू कहते हैं. ये अमूमन सफे़द और कभी-कभी काले रंग का होता है. ये नरम और पतले ऊन का बना होता है, जो हड्डियाँ जमा देने वाली सर्दी में भी गद्दियों को गर्माहट देता है.
इसी से एक गॉउननुमा ड्रेस तैयार किया जाता है.
एक चोला यानी गाउन बनाने के लिए क़रीब 18 से 25 मीटर का पट्टू की ज़रूरत होती है. पूरे बाज़ुओं के इस गाउन को बांधने के लिए जिस ऊन की मोटी डोर का इस्तेमाल होता है, उसे डोरा कहते हैं.
डोरा सफ़ेद या काला हो सकता है पर अमूमन काला ही होता है.
चोले के साथ जिस चूड़ीदार पायजामे को पहना जाता है, उसे सुथनी या सुथनु कहते हैं. सर्दियों में ऊन के बने सुथनु पहने जाते हैं और गर्मियों में सूती के.
चोले की बेल्ट यानी डोरा
डोरे को कमर के चारों ओर, चोले के ऊपर कस दिया जाता है. दरअसल ये एक काले रंग की मज़बूत ऊनी डोरी है, जिसे कई जगहों पर 'गत्री' भी कहा जाता है.
भेड़ की ऊन से बना ये डोरा कई बार 60 मीटर तक लंबा भी होता है. ये गद्दी पुरुषों की चोला पोशाक का एक अभिन्न और असाधारण अंग है.
चोले को बांधे रखने के अलावा, डोरा कमर के आस-पास के हिस्से को भी गर्माहट देता है.
लेकिन चोले की और भी उपयोगिताएँ हैं. इसे गद्दी अपने कई कामों में एक रस्सी के तौर पर भी इस्तेमाल करते हैं. इतना ही नहीं इसके फ़ोल्ड में गद्दी लोग बांसुरी, कुल्हाड़ी, बटुआ, दरात (लोहे का लंबा हँसुआ), चिल्लम वगैरह भी रख सकते हैं.
कौन हैं गद्दी?
हिमाचल प्रदेश किन्रौर, लाहौल एंड स्पीति और चंबा जैसे ज़िलों में कई जनजातियाँ रहती हैं. मुश्किल और चुनौती भरी भौगोलिक स्थितियों में जीवन-यापन करने वाली इस जनजातियों में गद्दी काफ़ी मशहूर हैं.
ये प्रदेश के मंडी, कांगड़ा और चंबा ज़िलों में रहते हैं. ये इलाक़े की सबसे पुरानी, प्रभावशाली और अपनी समृद्ध लोक-संस्कृति की वजह से एक मशहूर जनजाति है.
कांगड़ा और चंबा के ऊपरी हिस्सों में इस जनजाति का ख़ास प्रभाव होने के कारण चुनावी राजनीति में उनका अपना महत्व है. इन ज़िलों की कुछ विधानसभा सीटों पर गद्दी एक निर्णायक की भूमिका होते हैं.
हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद- किशन कपूर भी गद्दी ही हैं. एक अनुमान के मुताबिक़, हिमाचल में गद्दियों की आबादी क़रीब 8 लाख है.
हिमाचल प्रदेश में 12 नवंबर को विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.
कॉपी - पवन सिंह अतुल
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