देवी लाल के जन्मदिन पर बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता की हुंकार कितनी दमदार

    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

- हरियाणा के फ़तेहाबाद में 'सम्मान दिवस' रैली का हुआ आयोजन (25 सितंबर)

- पूर्व उप प्रधानमंत्री और हरियाणा के सीएम रहे चौधरी देवीलाल के 109वें जन्मदिवस का मौका

- सम्मान दिवस पर जुटे विपक्ष के कई बड़े नेता

- ममता बनर्जी, के चंद्रशेखर राव, फ़ारूख़ अब्दुल्लाह और अखिलेश यादव निमंत्रण के बावजूद नहीं पहुंचे

"समाज में जो ये झंझट पैदा करना चाहते हैं, हिंदू और मुस्लिम का झंझट ताकि ये झंझट हो जाए और हिंदू लोगों को अपनी तरफ़ करके जीते जाएँ. एक बात जान लीजिए ज़्यादा से ज़्यादा लोग एकजुट हो जाइए और ये समझ लीजिए ये तीसरे गठबंधन की बात नहीं है, ये मुख्य गठबंधन की बात है, मेन गठबंधन देश में बनेगा, तभी अच्छे मत से जीतेंगे."

सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश में रविवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हरियाणा से ये बातें कहीं. मौक़ा था देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री और हरियाणा के दो बार मुख्यमंत्री रहे देवी लाल के 109वें जन्मदिवस का.

देवी लाल की जयंती पर इंडियन नेशनल लोकदल ने हरियाणा के फतेहाबाद में 'सम्मान दिवस' रैली आयोजित की थी जिसमें देश के मुख्य विपक्षी दलों को निमंत्रण दिया गया था. लेकिन कई चेहरों ने इस कथित तीसरे मोर्चे की रैली में शिरकत नहीं की.

शिरकत नहीं करने वालों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक़ अब्दुल्लाह, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव जैसे बड़े नाम थे, जबकि इन्हें निमंत्रण दिया गया था.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश की विपक्षी पार्टियाँ एक साथ आने के लिए अभी तैयार नहीं हैं? क्या तीसरे मोर्चे का कोई वजूद है? अगर ऐसा कोई मोर्चा बनता है तो उसमें कांग्रेस की क्या भूमिका होगी? और इस गठबंधन या नीतीश कुमार के शब्दों में कहें तो मुख्य गठबंधन का नेता कौन होगा ?

रैली में कौन-कौन शामिल था?

सम्मान दिवस रैली के मंच पर जब बड़ी-सी फूलों की माला के बीच तस्वीरें ली गईं तो उसमें रैली की अध्यक्षता कर रहे इनेलो (इंडियन नेशनल लोकदल) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश चौटाला, एनसीपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार, शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद की तरफ़ से तेजस्वी यादव, सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी, शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट की तरफ से सांसद अरविंद सावंत दिखाई दिए.

साल 2000 में क़रीब 30 फ़ीसदी वोट के साथ ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल ने हरियाणा में 47 सीटें जीती थीं, लेकिन आज 90 सीटों वाली हरियाणा विधानसभा में पार्टी के पास महज़ एक विधायक है.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री का कहना है, ''इनेलो पिछले 17 सालों से सत्ता से बाहर है. चौटाला अपना खोया हुआ धरातल पाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं. ये रैली उसी दिशा में की गई, बस नाम विपक्षी एकता का दिया गया. 'तीसरा मोर्चा' जैसा रैली में कुछ नहीं दिखाई दिया. चौटाला हमेशा से बीजेपी के सहयोगी रहे हैं, नेचुरल सहयोगी की तरह. जब भी हरियाणा में उनकी सरकार बनी है उसमें बीजेपी साथ रही है.''

सीताराम येचुरी पर बोलते हुए हेमंत अत्री कहते हैं कि 'लेफ़्ट का दुश्मन हमेशा से राइट रहा है और देखिए कि क्या दुर्भाग्य है कि ओम प्रकाश चौटाला के मंच से सीताराम येचुरी बीजेपी से लड़ने की बात कर रहे हैं. ओम प्रकाश चौटाला हमेशा से राइट रहे हैं, आज नहीं तो कल वे राइट ही कहलाएंगे.'

विश्वसनीयता पर सवाल

विपक्षी एकता के लिए हुई सम्मान दिवस रैली में कई राजनीतिक दलों को न्योता भी नहीं दिया गया. इसमें आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी शामिल थी, हालांकि कई नेता ऐसे भी थे जिन्हें निमंत्रण मिला, पर वो नहीं पहुँचे.

ममता बनर्जी के रैली में शामिल ना होने के सियासी मायने हैं. राजनीतिक विश्लेषक राजकिशोर कहते हैं, "किसी भी राज्य के सीएम या राजनीतिक दल के राजनेता के लिए उसके हित सबसे पहले ज़रूरी हैं. सवाल है कि ममता बनर्जी या के चंद्रशेखर राव किसी को वैडिलेशन देने के लिए क्यों आएं? इसके लिए उनके हित जुड़े होने चाहिए. दूसरा सवाल प्रभुत्व स्वीकार करने का भी है. कौन अपने आप को बड़ा नेता मानता है, चाहे ममता हों, केसीआर हों या फिर अखिलेश."

आम आदमी पार्टी ने हाल ही में पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई है, दिल्ली में सरकार चला रहे हैं बावजूद इसके रैली में उन्हें नहीं बुलाया गया.

इस सवाल के जवाब में राजकिशोर कहते हैं कि ''अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता या ये कहें कि वो देश में जाना पहचाना नाम हैं, लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या विपक्षी पार्टियों के बड़े नेता अरविंद केजरीवाल को अपना नेता मानने के लिए तैयार होंगे? क्या वे अरविंद केजरीवाल को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन दे सकते हैं. फ़िलहाल तो ऐसा नहीं लगता.''

रैली में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक़ अब्दुल्लाह भी नहीं थे. मंच से अभय चौटाला ने नहीं आ पाने के लिए उनकी सेहत का हवाला दिया. हालांकि वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री इसे बारीकी से देखने की सलाह देते हैं.

वे कहते हैं, "जम्मू में अभी चुनाव होने हैं और वे ऐसे किसी भी मंच पर नहीं दिखना चाहते जो कभी बीजेपी के साथ रहे हों या जिनकी बीजेपी विरोध की छवि को लेकर सवाल उठते रहे हों. मंच पर नीतीश कुमार भी थे. उनकी क्रेडिबिलिटी पर सबसे बड़ा सवाल है कि वो पता नहीं कब पलट जाएँ. उनके साथ क्रेडिबिलिटी क्राइसिस है."

कौन कर सकता है नेतृत्व

साल 2024 के आम चुनाव में विपक्ष एक साथ मिलकर बीजेपी को हराने की बात कर रहा है, लेकिन इसके लिए उनकी रणनीति क्या है, इस लड़ाई का नेतृत्व कौन करेगा ये अभी भी स्पष्ट नहीं है.

राजनीतिक विश्लेषक राजकिशोर कहते हैं, ''इस तरह की रैली को देखकर ऐसा लगता है कि विपक्ष को एकजुट करने के नाम पर शक्ति प्रदर्शन, सरकार से अपनी मांगे मनवा लेना या सरकार के साथ मोलभाव करने की इच्छा ज़्यादा है. समस्या ये है कि हर व्यक्ति को नेता बनना है. ये 'ज़्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली बात' है.''

बीजेपी के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व आख़िर कौन कर सकता है, इस सवाल पर राजकिशोर कहते हैं, ''जब कांग्रेस के ख़िलाफ़ कोई मोर्चा खड़ा होने की बात होती थी तो उसके केंद्र में बीजेपी हमेशा रहती थी. बीजेपी कई राज्यों में सरकार चला चुकी थी."

"अटल बिहारी वाजपेयी जैसा नेता उनके पास था. पीछे आरएसएस जैसा संगठन था. अब जितनी भी पार्टियां तीसरे मोर्चे की बात कर रही हैं, वे सारी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियाँ हैं. उनके पास बीजेपी जैसा कुछ नहीं है. कांग्रेस की मौजूदगी में ही कोई राष्ट्रीय मोर्चा बन सकता है. बगैर कांग्रेस के तीसरे मोर्चे का भविष्य नहीं है.''

तो सवाल है कि क्या कांग्रेस, 2024 में बीजेपी के ख़िलाफ़ दूसरे विपक्षी दलों को एक साथ लेकर चल सकती है. इस प्रश्न पर राजकिशोर कहते हैं कि 'कांग्रेस को ये लोग स्वीकार नहीं करेंगे और कांग्रेस किसी और को स्वीकार करती हुई दिखाई नहीं दे रही है.'

तीसरे मोर्चे के वजूद को नकारते हुए वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं कि ''आज की तारीख़ में ना कोई संगठन है और ना ही कोई नेता है जो तीसरे मोर्चे की शुरुआत कर सके. ये सिर्फ़ एक कॉन्सेप्ट है जो पहले भी रहा है.''

80 के दशक का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि ''उस समय चौधरी देवी लाल का क़द और राजनीतिक हालात अलग थे, इस वजह से कांग्रेस के ख़िलाफ़ सब एकजुट हुए और वीपी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी, लेकिन आज ओम प्रकाश चौटाला के लिए ये काम करना आसान नहीं है.''

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