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अशोक गहलोत के 'सियासी पावरप्ले' को क्या नहीं भाँप पाई कांग्रेस? - प्रेस रिव्यू
रविवार को राजस्थान में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी का अंदरुनी घमासान खुलकर देखने को मिला. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष की दावेदारी पेश करने की ख़बरों के बीच राज्य में 90 से अधिक विधायकों ने इस्तीफ़ा देने की धमकी दी.
विधायक, अशोक गहलोत और सचिन पायलट दो नेताओं के गुट में बंट गए हैं. अशोक गहलोत के समर्थक विधायक चाहते हैं कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन हो इस पर उनसे राय ली जाए. राजस्थान की इस राजनीतिक सरगर्मी की ख़बरें सभी अख़बारों में प्रमुखता से छपी हैं.
अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस अपने मुख्य पन्ने पर एक ख़ास रिपोर्ट छापी है. पढ़िए विस्तार से यही ख़बर.
इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि रविवार को अशोक गहलोत का सियासी पावर प्ले पूरे स्विंग में रहा और गांधी परिवार अशोक गहलोत के बेहद नपे-तुले सियासी क़दम को समझ में फेल रही.
अशोक गहलोत ने इशारों-इशारों में ये बताया कि वह पार्टी के शीर्ष पद पर ना रह कर राज्य के नेता बने रहना चाहते हैं.
गहलोत ने कई बार ये साफ़ कहा कि वह अपने विधायकों की राय राज्य के नए मुख्यमंत्री के चुनाव से पहले जानना चाहते हैं.
अशोक गहलोत ये चाहते थे कि उनका क़रीबी ही राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाया जाए. वह सचिन पायलट को सूबे का मुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ़ थे और शायद इसीलिए उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया था कि कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने तक वो राज्य का मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व उनके इस इशारे को समझ नहीं सका.
अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ गहलोत खेमे के सूत्रों ने कहा कि नए सीएम की नियुक्ति के लिए सीएलपी की बैठक बुलाने का निर्णय चौंकाने वाला था क्योंकि मुख्यमंत्री ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन पत्र भी दाखिल नहीं किया था.
कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि सार्वजनिक तौर पर इशारों में राहुल गांधी का ये कहना कि गहलोत दोनों पदों पर नहीं बने रह सकते. उनके क़द के नेता के लिए शर्मिंदा करने वाला था जो आने वाले दिनों में पार्टी के अध्यक्ष हो सकते हैं.
अशोक गहलोत खेमे के सूत्रों का दावा है कि सचिन पायलट विधायकों को फोन कॉल कर रहे थे और कह रहे थे कि वह विधायक दल के नेता चुने जाएंगे और ये सब अशोक गहलोत के नामांकन भरने से पहले से ही चल रहा है.
अशोक गहलोत खेमे का कहना है कि इसके कारण ही विधायकों की प्रतिक्रिया सामने आने लगी. ऐसे में सवाल ये है कि क्या गांधी परिवार से सिग्नल मिलते ही सचिन पाटयलट ने आगे बढ़कर ये कवायद शुरू कर दी?
आरोग्य सेतु और कोविन एप का रूप बदलने वाली है सरकार
केंद्र सरकार आने वाले दिनों में आरोग्य सेतु और कोविन एप के इस्तेमाल का उद्देश्य बदलने वाली है.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक कोविड-19 के दौरान बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले ये दोनों एप्लिकेशन को 'आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन' के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य चिताओं के लिए इस्तेमाल किया जाएगा.
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी आरएस शर्मा ने रविवार को यह बात कही.
उन्होंने कहा, " कोरोना के दौरान इस्तेमाल किए गए स्वास्थ्य से जुड़े दो समाधानों को हम दोबारा नए रूप में इस्तेमाल करने जा रहे हैं. इनमें से एक है आरोग्य सेतु. अब जब उम्मीद है कि कोरोना हमारे जीवन से जा चुका है तो हम इसका इस्तेमाल भारत की स्वास्थ्य समस्या को डिजिटल रूप से हल करने के लिए करेंगे. अगर आप अस्पताल जाएंगे तो आपको अब पंजीकरण के लिए कतार में खड़ा नहीं होना पड़ेगा. आप बस स्कैन करें और आपको आपका ओपीडी कार्ड मिल जाएगा. "
इसके अलावा उन्होंने ये भी बताया कि कोविन जो वैक्सीन के लिए डिजाइन किया गया प्लटफॉर्म था इसका भी इस्तेमाल अलग तरह से किया जाएगा.
आरएस शर्मा ने कहा, "हम इसे टीकाकरण कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल करने वाले हैं, ताकि लोग राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत पोलियो ड्रॉप जैसे अन्य 12 आवश्यक टीकों को खोजने और प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग कर सकें"
पार्टी के भीतर लोकतंत्र के मुद्दे पर काम करेगा चुनाव आयोग
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़ बीते चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में मानदंडों का पालन करने में विफल रहने वाली पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (आरयूपीपी) के खिलाफ़ कार्रवाई करने के बाद अब चुनाव आयोग पार्टियों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र के मुद्दे पर सक्रिय हो सकता है.
मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और चुनाव आयुक्त अनूप चंद्र पांडे मई महीने से ऐसी पार्टियों को सूची से बाहर निकाल रहे हैं, जिन्होंने अपनी पार्टी का पता , पैन कार्ड और पार्टी के बदले पदाधिकारियों की जानकारी चुनाव आयोग को नहीं दी. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत ये जानकारी आयोग को देना अनिवार्य है.
चुनाव आयोग के एक सूत्र ने अख़बार को बताया है कि अब आग पार्टियों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र के मामला पर गौर करेगा.
पिछड़े हिंदू पीएफ़आई के निशाने पर
हिंदी अख़बार दैनिक भास्कर में छपी रिपोर्ट के अनुसार, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफ़आई ने 2047 तक भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का प्लान तैयार किया है.
रिपोर्ट के अनुसार पीएफ़आई का मानना है कि पढ़े-लिखे और संपन्न मुसलमान कभी साथ खड़े नहीं होंगे, इसलिए उसके टारगेट पर पसमांदा या आर्थिक रूप से कमजोर मुस्लिम और सामाजिक तौर पर पिछड़े हिंदू हैं. ये दावा गृह मंत्रालय की ख़ुफिया रिपोर्ट में के हवाले से किया गया है
ये रिपोर्ट सभी सेंट्रल एजेंसियों से शेयर की गई है. इसी के बाद पीएफ़आई पर शिकंजा कसने के लिए सरकार ने एजेंसियों के साथ मिलकर ऑपरेशन ऑक्टोपस शुरू किया. ऑपरेशन में एनआईए, ईडी, 11 राज्यों की पुलिस, सीआरपीएफ़ और एटीएस को शामिल किया गया.
पहली कड़ी में 22 सितंबर को 11 राज्यों में 96 जगहों पर रेड हुई और 106 से ज्यादा पीएफ़आई कार्यकर्ताओं को अरेस्ट किया गया. यह पहली बार है जब सभी एजेंसियों ने मिलकर पीएफ़आई पर इतनी बड़ी कार्रवाई की है. दूसरी कड़ी की शुरुआत जल्द ही दक्षिण और पश्चिमी राज्यों में हो सकती है.
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