भारत की यात्रा कीजिए और यक़ीन मानिए जो आप हैं वो नहीं रहेंगे

    • Author, नताशा बधवार
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

ख़ुद के अंदर भारत की विविधता, जटिलता और ऊर्जा को समझने की यात्रा मैंने 20 साल में की थी. तब मुझे पहली बार अहसास हुआ कि असली भूख कैसी महसूस होती है. मैंने ऐसी हताशा, ख़ालीपन और भूख को इससे पहले कभी महसूस नहीं किया था.

स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले के आदिवासी गाँव में शिक्षक के तौर पर वालिंटियर कर रही थी. मैं उस वक़्त खोडाम्बा में एक परिवार के साथ रह रही थी.

नज़दीकी तहसील अलीराजपुर से छह घंटे की मटमैली पहाड़ियों से घिरे रास्ते की बस यात्रा के बाद हम जंगल के रास्ते में तीन घंटे की चढ़ाई के बाद खोडाम्बा पहुँचते थे. यह गाँव जंगल के इलाक़े में कटोरे जैसा था, जहाँ बीच में मैदान था और पहाड़ियों के ढला पर लोगों के घर बने हुए थे.

वहाँ कुछ शामों में मैं सूर्य को डूबते और दूर के किसी झोपड़ी से धुआँ उठते देखती थी. मुझे कई बार ये दृश्य अपने घर के कैलेंडर में स्विटजरलैंड की तस्वीर जितनी क़रीब महसूस हुई. लेकिन इससे उन झोपड़ियों की वास्तविकता का पता नहीं चलता.

सूखे का वो साल

दरअसल, उस साल सूखा पड़ा था और ज्वार की फसल बर्बाद हो गई थी. किसी भी परिवार के पास ना तो पर्याप्त अनाज थे और ना ही पैसे थे. गाँव के बड़े बुर्ज़ुग भूखे भी रहने लगे थे. लेकिन मैं गाँव की मेहमान थी, लिहाजा मेरे खाने का इंतज़ाम अलग-अलग घरों से होता था.

सुबह पाँच बजे से दिन शुरू होता था और मुझे दिन का पहला खाना 11 बजे सुबह मिलता था. मक्के की एक मोटी रोटी और ज़्यादा पानी वाली दाल. मेरी नज़र उन बच्चों पर ठहरती जो खाना बनाने की जगह के आसपास रोटी के टुकड़े उठाते रहते थे. यह आम का मौसम भी था लेकिन बारिश नहीं होने से आम के पेड़ भी सूने सूने थे.

मुझे सपने में विविधरंगी व्यंजन दिखाई देने लगे थे. कई दोपहर तो ऐसे गुज़रे जब मैं किसी आम के पेड़ के पीछे ख़ुद को सिकोड़कर तब तक रोती थी, जब तक कि मन हल्का नहीं हो जाता था.

उन दिनों लिखी डायरी, अभाव और अकेलेपन के अनुभवों का दस्तावेज़ हैं. कभी-कभी मैं अपने आप पर हंसने की कोशिश करती. मैं जिन लोगों के साथ रहने और काम करने आई थी, उनसे घुल मिलने की चुनौती के साथ-साथ मैं भूख, गर्मी, पानी की कमी और बालों में जूं से भी ग्रस्त थी.

मैंने अपनी डायरी में लिखा था, "क्या मुझे अपने परिवार वालों से झगड़ कर इतनी दूर, यह काम करने आना चाहिए था, जिसमें मैं बिल्कुल अच्छी नहीं हूँ." मैं ख़ुद भी नाकाम महूसस करने लगी थी.''

कई सालों तक ख़ुद को कोसना

मैं साल भर वॉलिंटियर करने की प्रतिबद्धता से गई थी, लेकिन छह महीने बाद ही जब दिल्ली में मास कम्युनिकेशन के पोस्ट ग्रेजुएट में नामांकन हुआ तो मैं लौट आई.

एक साल बाद में अपने क्लासमेट के साथ छात्र के रूप में पहले प्रोजेक्ट में खोडाम्बा गई. तब मुझे महसूस हुआ था कि जिन लोगों के साथ मैंने समय गुज़ारा था, उनके साथ गहरा संबंध बन गया था.

मेरे अंदर वादा तोड़ने, सपने से मुकरने और गहरी नाकामी का बोध सालता रहा. मैं कई सालों तक ख़ुद को कोसती रही. अब पीछे मुड़कर देखने पर, महसूस होता है कि मेरी आकांक्षाएं कुछ ज़्यादा थीं.

मैं जिस भी चुनौती को हाथ में लेती थी, उसमें बेहतर करती थी. लेकिन खोडाम्बा के अनुभव ने मुझे मेरी सीमा का अहसास कराया. मैं गाँव में ख़ुद को अलग-थलग महसूस करती थी और अब मैं शहर में ख़ुद को दिमाग़ी तौर पर अलग-थलग पाती हूँ.

मैं सूखे से प्रभावित एक इलाक़े में छह महीने ग़रीबी रेखा से नीचे गुज़र बसर करते हुए रही और मैं तीन दशकों तक लोगों को इसकी कहानियां सुनाती रही.

इससे मुझे लोगों की तारीफ़ें मिलीं. मेरा यक़ीन था कि जीवन जीने का न्यायपूर्ण और ईमानदार तरीक़ा, सुविधाओं को त्यागना है. लेकिन मैंने सीखा कि सुविधाओं को त्यागना कठिन है. मैं जितना इन सुविधाओं को नकारती, यह उतना ही बढ़ता गया.

सुविधाएं त्यागें

मुझे यह सब समझने में सालों या कहें दशकों लगे. मैंने इन सुविधाओं को कुएं के तौर पर देखा जो हमेशा कुछ ना कुछ देता ही रहा है.

सुविधाओं को नष्ट करने का तरीक़ा, एक बेहतर चुनाव नहीं माना जा सकता, यह ठीक वैसा ही होगा जैसा कुएं से मिलने वाले पानी को नहीं लेने के लिए हम उसे पत्थर और मिट्टी डालकर बंद कर दें. यह कोई अच्छा विकल्प तो नहीं ही है.

ऐसे में अपनी शक्ति को पहचान कर उसे काम में लगाना चाहिए. आप जो कर सकते हैं, उसे अच्छे से करें. अपने हर चुनाव में संवेदनशीलता दिखाएं. बराबरी और समानता से जीवन जिएं, ख़ुद को बार-बार नाकाम होने दें, क्योंकि आपके आसपास के लोग आपको संभालने के लिए हैं.

अपनी ग्लानि को भी काम करने दें. सफलता किसी ड्रग्स की भांति काम करती है. आप को खुद के पीछे जाकर डिटॉक्स करने की ज़रूरत होती है.

वीडियो जर्नलिस्ट और डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर के अपने करियर में, मुझे दूसरे लोगों के पास, बार-बार जाना पड़ा.

अपना काम करने के लिए हमें दूसरों की मदद की ज़रूरत होती थी, जो अपनी कहानियां हमें बताते थे. हमारे काम में उन लोगों के योगदान को भुलाना और मेरी स्टोरी, मेरे शॉट्स, मेरी फ़िल्म और मेरी ब्रेकिंग न्यूज़ कहते हुए क्रेडिट लेना बहुत सहज और आसान है.

हम नैरेटिव में हेरफेर करना बख़ूबी जानते हैं. हम दूसरों के जीवन में घुसने, ज़रूरत की चीज़ों को लेने और कब उनसे कटना है, यह बख़ूबी जानते हैं. ख़ुद की महानता के क़िस्से थोपना आसान है, ख़ासकर जब सोशल मीडिया हमारी उंगलियों में है.

इसे स्वीकार करना ही होगा. जब भी मैं अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलती हूँ, मुझे अपनी अंतरात्मा का सामना करना होता है. मुझे एहसास होता है कि मैं कितना कम जानती हूँ और मेरी धारणाएं कितनी ग़लत हैं.

दरअसल, मैं अपने आसपास के भारत को जानना और उससे जुड़ने का रास्ता तलाश रही हूँ. भारत जो जटिल, विविध और ऊर्जावान है और उसे नुकसान पहुँचाया जा रहा है.

दूसरों से जुड़ाव

ज़रूरी नहीं कि हमें अन्याय को दूर करने के लिए देश के गहरे अंदरूनी हिस्सों की यात्रा करनी पड़े.

हालांकि हमें अपनी चेतना की गहराई में यात्रा करनी है. इस वाक्य को पढ़ने वाला प्रत्येक शख़्स, लोगों के जीवन को बदलने, अधिक समानता के साथ जीने, सूचना अर्थव्यवस्था में अधिक ज़िम्मेदारी से भाग लेने में सक्षम है.

अपने भीतर भारत की यात्रा करें. अपने आस-पास के भारत से, जिन समुदायों से आपका सामना हो, उनसे जुड़ें.

हमारा निजी जीवन गहरे तौर पर राजनीति से प्रभावित है. हम हर दिन वर्ग, जाति और लिंग असमानता को बनाए रखने में भाग लेते हैं. जो आप नहीं कर सकते, उस पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, आप जो कर सकते हैं, उस पर ध्यान केंद्रित करें.

जब हम दूसरों के साथ जुड़ते हैं तो हम अपनी जीवन शक्ति को फिर से नया उत्साह भर देते हैं. हम किसी और के लिए तब तक अच्छा नहीं कर सकते जब तक हम उस अच्छाई को स्वीकार नहीं करते जो वह हमारे लिए कर रहा है.

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