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ब्लॉग: 'बोए जाते हैं बेटे और उग आती हैं बेटियां'
- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बोए जाते हैं बेटे
और उग आती हैं बेटियां
खाद- पानी बेटों में
लहलहाती हैं बेटियां
ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट से जैसे ही कोई लड़की भारत को एक और मेडल दिलाती है, नंद किशोर हटवाल की ये कविता मुझे बरबस याद आ जाती है.
भारत जैसे देश में ये होना बेहद ख़ास है क्योंकि भारत वो देश है जहां लड़कों की चाह में लड़कियां पैदा की जाती हैं. इकोनॉमिक सर्वे 2017-18 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 2.1 करोड़ 'अनचाही' लड़कियों ने जन्म लिया.
सर्वे का ये अनुमानित आंकड़ा उन लड़कियों का है, जो बेटे की चाह के बावजूद पैदा हुईं. यानी बोए गए बेटे और उग आईं बेटियां. वो सिर्फ़ उगी ही नहीं बल्कि ख़ूबसूरती से लहलहा भी उठीं. बावजूद इसके कि खाद-पानी उन्हें नहीं बेटों को दिया गया.
इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में अब तक के आंकड़ों पर नज़र डाली जाए तो भारतीय पुरुष महिलाओं के सामने फ़ीके नज़र आ रहे हैं.
रियो ओलंपिक में भी भारत की झोली में दो पदक आए थे. दोनों ही लड़कियों की बदौलत. पीवी सिन्धु ने बैडमिंटन में सिल्वर मेडल जीता था और साक्षी मलिक ने कुश्ती में ब्रॉन्ज़.
दीपा कर्मकार जिम्नास्टिक में मेडल तो नहीं जीत पाईं लेकिन उनके शानदार प्रदर्शन ने सबको कायल ज़रूर बना दिया.
इससे पहले ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स और 2017 के एशियन गेम्स में भी महिलाओं के सामने पुरुष हांफते हुए से ही लगे.
यहां मक़सद महिलाओं और पुरुषों की तुलना करना नहीं है और न ही महिलाओं को इस बात के लिए शाबाशी देना कि वो महिला होने के 'बावजूद' इतना कुछ कर पा रही हैं.
मगर ये बातें इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि भारत में औरतों पर अनगिनत बंदिशें हैं. उनके सामने दोगुनी चुनौतियां हैं. उन पर दोगुने दबाव हैं, उनसे रखी जाने वाली अपेक्षाएं दोगुनी हैं और उनके साथ होने वाला भेदभाव भी दोगुना है.
इन दिनों गोल्ड कोस्ट से आने वाली ख़बरें मुझे अपने स्कूल के दिनों की याद दिलाती हैं. मैंने उत्तर प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की है.
सोनभद्र ज़िले के हमारे स्कूल में खेल के दो बड़े मैदान थे, लेकिन उन मैदानों पर सिर्फ़ लड़के खेलते हुए नज़र आते थे. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे प्रिंसिपल को लड़कियों का खेलना पसंद नहीं था.
खाली पीरियड में लड़कियां या तो पढ़ाई करती थीं या क्लास में बैठकर अंताक्षरी खेलती थीं. माहौल ऐसा बना दिया गया था कि लड़कियों के ज़हन में फ़ील्ड में जाकर खेलने की बात ही नहीं आती थी.
मैं भी वही करती थी, हम शायद ये भूल गए थे कि हमें भी बाहर जाकर खेलने की उतनी ही ज़रूरत और उतना ही हक़ है जितना लड़कों को.
अच्छी बात ये है कि हालात हमेशा ऐसे ही नहीं रहे. कुछ साल बाद दूसरे प्रिंसिपल आए और उन्होंने सबकुछ बदल दिया.
अब लड़के-लड़कियां साथ मैदान में खेलने लगे थे और स्कूल में 'स्पोर्ट्स डे' होने लगा. मेरी आंखें हैरत और ख़ुशी से पलकें झपकाना भूल गईं जब लड़कियों ने एक के बाद एक इनाम जीते.
मेरी बेस्ट फ़्रेंड पार्वती ने पीरियड्स के बावजूद 100 मीटर रेस और रिले रेस जीती. मेरे बार-बार मना करने पर भी वो भी दौड़ी और न सिर्फ़ दौड़ी, जीती भी.
सोचती हूं, अगर उसे सपोर्ट मिला होता तो क्या पता वो भी गोल्ड कोस्ट में मेडल जीत रही होती.
मैं जिस मुहल्ले में रहती थी, वहां भी किसी लड़की को खेलते नहीं देखा. ऐसा नहीं था कि लड़कियां कभी नहीं खेलती थीं.
वो खेलती थीं मगर सिर्फ तभी तक, जब तक वो बच्चियां थीं. किशोरवय तक पहुंचते-पहुंचते वो घर के कामों में मां का हाथ बंटाने लगती थीं, घर में लूडो और कैरम खेलने लगती थीं.
मुझे स्पोर्ट्स में दिलचस्पी नहीं थी इसलिए मुझ पर कुछ ख़ास असर नहीं पड़ा लेकिन कई दूसरी लड़कियों को इससे बहुत नुक़सान हुआ.
वैसे कुछेक लड़कियां थीं जो बोर होने पर घर के बाहर बैडमिंटन खेलती थीं और आते-जाते लोग उन्हें घूरकर देखते थे. मेरे सामने ही एक लड़के ने कमेंट किया, ये क्या बैडमिंटन खेलकर सेक्सी दिखना चाहती है?
आज जो लड़कियां मेडल जीत रही हैं, उनमें से बहुतों ने ऐसी ही स्थिति का सामना किया होगा. लेकिन उन हालात को भी उन्होंने वैसे ही हराया जैसे आज ये अपने प्रतिद्वंद्वियों को हरा रही हैं.
स्पोर्ट्स में आगे जाने के लिए मुश्किल से मुश्किल शारीरिक मेहनत और लगातार प्रैक्टिस की ज़रूरत होती है.
महीने के पांच दिन होने वाले पीरियड्स, प्रेग्नेंसी और ऐसी ही तमाम प्राकृतिक प्रक्रियाओं से गुज़रती हुई अपनी मंजिल तक पहुंचती हैं.
अगर आपने 'मैरी कॉम' फ़िल्म देखी है तो आपको याद होगा कि जुड़वां बच्चों की मां बनने के बाद उनका बॉक्सिंग करना कैसे छूट जाता है.
एक सीन में जब उनके पति कहते हैं कि तुम फिर से बॉक्सिंग शुरू क्यों नहीं करती तो वो पूछती हैं, तुम्हें पता भी है कि मां बनने के बाद एक औरत का शरीर कितना बदल जाता है?
ऐसे अनेक संघर्ष तो अपनी जगह हैं, इसके अलावा जब औरतें लीक से हटकर कोई फ़ैसला लेती हैं तो उन अपनी क़ाबिलियत साबित करने का दबाव होता है.
उनके पास मर्दों की तरह ग़लतियां करने की लग्ज़री नहीं होती. क्योंकि ग़लत साबित होने पर लोग 'हमने तो पहले ही कहा था' बोलने के लिए तैयार बैठे रहते हैं.
उन पर ख़ुद को मर्दों के बराबर और उनसे बेहतर साबित करने का दबाव होता है. औरतें दोगुनी मेहनत करके ये साबित भी करती हैं कि वो पुरुषों से बेहतर ही हैं, कमतर नहीं.
और इतनी तकलीफ़ें झेलने के बाद मिलता क्या है? पुरुष खिलाड़ियों के मुक़ाबले धेले भर पैसे. बीसीसीआई ने इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के ठीक एक दिन पहले नए कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम का ऐलान किया था.
इसके मुताबिक पुरुष क्रिकेट टीम के टॉप प्लेयर्स को सात करोड़ रुपये मिलेंगे और महिला टीम की टॉप प्लेयर्स को 50 लाख रुपये. यानी पुरुष खिलाड़ियों को महिलाओं से 14 गुना ज़्यादा पैसे मिलेंगे.
भेदभाव सिर्फ़ पैसों का नहीं है. कभी स्कर्ट पहनकर खेलने पर फतवा मिलता है और कभी ग्लैमर बढ़ाने के लिए स्कर्ट पहनने को कहा जाता है.
भारतीय टेनिस का नाम दुनिया भर में पहुंचाने वाली सानिया मिर्ज़ा को स्कर्ट पहनकर खेलने पर फ़तवा निकाला गया, 'सानिया मिर्ज़ा के नथुनिया जान मारेला' जैसे गाने बनाए गए और पाकिस्तानी क्रिकेटर से शादी करने पर उनकी भारतीयता पर सवाल उठाए गए.
दूसरी तरफ़ बैडमिंटन वर्ल्ड्स फ़ेडरेशन ने आदेश जारी कर दिया कि महिलाएं स्कर्ट पहनकर खेलें, शॉर्ट्स पहनकर नहीं.
दलील ये थी कि लड़कियां स्कर्ट पहनकर खेलेंगी तो खेल में 'ग्लैमर' आएगा और ग्लैमर आएगा तो लोग खेल देखेंगे. बाद में विवाद हुआ तो फ़ेडरेशन ने फ़ैसला वापस ले लिया.
इतने भेदभाव और विरोधाभास के बाद अगर महिलाएं पुरुषों को पछाड़ रही हैं तो सोचने वाली बात है कि बराबरी के माहौल में वो क्या करेंगी.
स्पोर्ट्स ही क्यों पढ़ाई में लड़कियां लड़कों के मुताबिक ज़्यादा संजीदा हैं. हर साल बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे आते हैं और साथ लाते हैं 'लड़कियों ने फिर मारी बाजी' जैसी सुर्खियां.
इसी बात पर एक मीम याद आ रहा है जो कुछ साल पहले फ़ेसबुक पर दिखा था. एक लड़के ने पूछा था कि ऐपल का सीईओ पुरुष (टिम कुक) है, फ़ेसबुक का सीईओ पुरुष (मार्क ज़करबर्ग) है और गूगल का सीईओ भी पुरुष (सुंदर पिचाई) है! तो लड़कियां टॉप करके करती क्या हैं?
जवाब में एक लड़की ने लिखा- आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ महिला (चंदा कोचर) है, एक्सिस बैंक की सीईओ महिला (शिखा शर्मा) है और एसबीआई की चेयरपर्सन भी महिला (अरुंधति भट्टाचार्य), जो तुम लड़कों को लोन देती हैं.
ये मीम इंटरनेट पर खूब शेयर किया जा रहा था और इस पर ज़बरदस्त बहस भी हो रही थी. ऐसा नहीं है कि पुरुषों की ज़िंदगी में कोई तकलीफ़ या मुश्किल नहीं है.
उनकी ज़िंदगी में भी अपनी चुनौतियां हैं लेकिन अगर निष्पक्ष होकर सोचें तो ये स्वीकार करने में मुश्किल नहीं होगी कि महिलाओं की ज़िंदगी में कहीं ज़्यादा चुनौतियां हैं. इसीलिए उनकी हर जीत, हर उपलब्धि कहीं ज़्यादा ख़ास भी है.
इन सारी बातों के बाद एक ज़रूरी सवाल ये है कि महिलाओं की कामयाबी की तुलना पुरुषों से करनी ही क्यों? क्या वो अपने-आप में काफ़ी नहीं हैं?
ये तुलना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि हमारे समाज में अब भी उन्हें कमतर माना जाता है.
दुर्भाग्य से भारतीय समाज अभी बराबरी के उस स्तर पर नहीं आया है जहां ये तुलना ग़ैरज़रूरी लगे. लेकिन जिस तरह से लड़कियां आगे बढ़ रही हैं उसे देखकर लगता है ये वक़्त में बहुत देर नहीं है.
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