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भारत में चीते आ तो गए, लेकिन चुनौतियाँ अब भी कम नहीं
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वन्य प्राणी विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में देश से विलुप्त हुए चीतों को बसाने की कई दशकों की उनकी मेहनत तब रंग लाई, जब नामीबिया से आठ चीतों की पहली खेप यहाँ पहुँची.
इसके पीछे कई वर्षों का शोध भी था, जिसमें भारत और दक्षिण अफ्रीका के विशेषज्ञ शामिल रहे.
17 सितंबर को एक भव्य समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन्हें इनके बाड़ों में औपचारिक रूप से छोड़ दिया. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ़ इतना ही काफ़ी नहीं होगा. हालाँकि सभी चीतों के गलों में कॉलर लगे हुए हैं और जंगल में भी सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन से भी इनकी निगरानी जारी है.
फ़िलहाल ये चीते क्वारंटीन हैं और एक महीना पूरा होने के बाद इन्हें जंगल में छोड़ा जाएगा. लेकिन इसके बाद मध्य प्रदेश के वन अमले और कूनो राष्ट्रीय अभ्यारण्य के अधिकारियों के सामने कई चुनौतियाँ खड़ी हो जाएँगी.
बीबीसी से बात करते हुए राज्य सरकार के मुख्य वन रक्षक और 'चीफ़ वाइल्डलाइफ़ वार्डन' जसवीर सिंह चौहान कहते हैं कि चुनौती तब शुरू होगी जब इनका सामना दूसरे परभक्षियों से होगा.
चौहान कहते हैं, "वैसे हमने इनके आने से पहले ही बहुत सारे इंतज़ाम कर लिए थे जैसे सीसीटीवी कैमरे जंगल के बड़े हिस्से में लगाए गए हैं. कंट्रोल रूम बनाया है. यहाँ रात-दिन इन पर नज़र रखी जाती है. जब ये जंगल में छोड़ दिए जाएँगे, तो इसका मतलब ये नहीं कि इन पर से नज़र हट जाएगी. हर चीते के लिए एक समर्पित अमला है और हर चीते के गले में कॉलर लगा हुआ है, जिससे उसके हर पहलू पर निगरानी रहेगी."
चौहान को इस बात की चिंता अधिक है कि चीता कूनो राष्ट्रीय पार्क के आसपास के गाँवों में न घुस जाएँ. इसके लिए वन विभाग के अमले को और ग्रामीणों को सतर्क भी किया जा रहा है.
चिंताएं भी कम नहीं है
लेकिन कुछ वन्य प्राणी विशेषज्ञों को लगता है कि ये चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि ये अफ़्रीकी चीते हैं न की एशियाई चीते. इनके जींस में भी थोड़ा सा ही सही मगर फ़र्क है.
हालाँकि कई सालों के शोध के बाद ही चीतों की पहली खेप आई है, लेकिन कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि नामीबिया और ख़ास तौर पर दक्षिण अफ़्रीकी चीते ख़ुद से ताक़तवर परभक्षियों का सामना कैसे कर पाएँगे? ये चिंता का विषय ज़रूर है.
कूनो में तेंदुओं की संख्या भी काफ़ी ज़्यादा है और यहाँ लकड़बग्घे भी अच्छी ख़ासी तादात में पाए जाते हैं. जो चीतों से ताक़तवर हैं और उनपर हमला भी कर देते हैं.
चौहान कहते हैं- तेंदुए हैं और लकड़बग्घे भी हैं. इन्हें जंगली कुत्तों के आक्रमण से बचना पड़ता है. दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया में ये चीते सिंह, बाघ और बाघ जैसे परभक्षियों के बीच ही रहते थे. इन दोनों जगहों पर जो लकड़बग्घे हैं, वो झुंड में रहते हैं और चीतों पर आक्रमण करते हैं. लेकिन कूनो में पाए जाने वाले लकड़बग्घे झुंड में नहीं रहते. अलबत्त्ता कूनो में तेंदुओं से चीतों को सामंजस्य बैठाना पड़ेगा.
क्या कहते हैं जानकार?
इस परियोजना में दो दशकों से भी ज़्यादा से काम कर रहे भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी हरभजन सिंह पाबला विशेषज्ञ भी हैं और मध्य प्रदेश के मुख्य वन रक्षक भी रह चुके हैं.
पाबला ने कई किताबें भी लिखी हैं. बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं- जिस तरह का चीतों का प्राकृतिक वास दक्षिण अफ़्रीका और नामीबिया में है, ठीक उसी तरह का प्राकृतिक वास उनके लिए यहाँ तैयार किया गया है, तो इसलिए उन्हें परेशानी नहीं होनी चाहिए.
'चीता कंज़र्वेशन फंड' नाम की जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय संस्था की निदेशक लॉरी मार्कर ने बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में नामीबिया से बताया था, "इस प्रोजेक्ट के लिए हमने ख़ासी मेहनत की थी और उम्मीद है कि सब अच्छा रहेगा. ये चीते शेरों और तेंदुओं के अलावा दूसरे जानवरों के आसपास रहते हुए पले-बढ़े हैं. भारत में भी ये अपना घर बस लेंगे. पाँच-सात साल का समय दीजिए, ये प्रोजेक्ट बहुत तेज़ी से बढ़ेगा."
इस परियोजना से जुड़े वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के डीन यादवेंद्र देव झाला भी बीबीसी से बातचीत में इसे चुनौतीपूर्ण तो मानते हैं, लेकिन साथ ही कहते हैं कि विलुप्त जानवरों को वापस लाने की कोशिश में ये भारत की एक बड़ी कामयाबी है.
लेकिन इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की राय बँटी हुई नज़र आई है. एक टीवी चैनल से बात करते हुए जाने माने वन्य प्राणी विशेषज्ञ वाल्मिकी थापर का कहना था कि नामीबिया और दक्षिण अफ़्रीका से आने वाले चीतों के लिए जंगल के अंदर बहुत सारे दुश्मन मिलेंगे और उनके लिए शिकार बहुत कम उपलब्ध हो पाएगा.
दूसरा अहम बिंदु, जिस पर थापर ने सरकार से संज्ञान लेने का सुझाव दिया है वो है ग्रासलैंड की कमी. वो अफ़्रीका का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वहाँ चीतों की आबादी इस लिए है क्योंकि उनके दौड़ने के लिए बड़ा इलाक़ा या ग्रासलैंड बड़े पैमाने पर उपलब्ध है. वो कहते हैं कि यहाँ वैसा नहीं है.
इसके जवाब में मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य वन संरक्षक और प्रमुख वाइल्डलाइफ़ वार्डन जसवीर सिंह चौहान कहते हैं कि राज्य सरकार ने तभी बड़े इलाक़े का अधिग्रहण कर लिया था जब गीर के जंगलों से शेर को लाकर यहाँ बसाने की बात हो रही थी.
इसी क्रम में 150 के आसपास के गाँवों को उस इलाक़े से हटाकर कूनो राष्ट्रीय पार्क से के बाहर दूसरे इलाक़ों में बसाया गया है. फिर उन इलाक़ों को ग्रासलैंड के रूप में विकसित किया गया है.
जीव वैज्ञानिक और हैदराबाद स्थित सेंटर फ़ॉर सेल्यूलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉक्टर कार्तिकेयन को अंदेशा है कि अफ़्रीका से नए परिवेश में लाए जाने वाले चीतों के बीच प्रोटीन संक्रमण हो सकता है. अन्य तरह के संक्रमणों की भी आशंका ज़्यादा होंगी. चीते, चोट या संक्रमण बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं.
वहीं जाने माने वन्य प्राणी विशेषज्ञ आदित्य पंडा ने बीबीसी से कहा कि जो इतने दशकों के बाद हो रहा है वो एक प्रयोग है. उनका कहना था- प्रयोग सफल होता है तो अच्छी बात है. अगर नहीं तो फिर उस से सबक मिलते हैं, जिससे आने वाले दूसरे चीतों के आगमन से पहले चीज़ें और भी दुरुस्त की जा सकती हैं.
पंडा ने कहा- जंगल का नियम यही कहता है कि जो सबसे शक्तिशाली है, वो बचेगा. चीते दूसरे परजीवियों से कमज़ोर ज़रूर हैं, लेकिन दूसरे परजीवियों को इनकी आदत पड़ ही जाएगी. ये अच्छी बात है कि इस परियोजना पर दशकों से काम हो रहा था. इससे जुड़े अधिकारी और संस्थाएं सब कुछ शोध के बाद ही कर रही हैं. रास्ता निकल ही जाएगा.
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