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नीतीश कुमार क्या मोदी को चुनौती देने के लिए यूपी से लड़ेंगे लोकसभा चुनाव?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर अटकलें हैं कि वो 2024 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की फूलपुर सीट से लड़ सकते हैं.
दरअसल इन अटकलों को जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के बयान ने भी हवा दी है.
एक निजी समाचार चैनल से बात करते हुए ललन सिंह ने कहा, "नीतीश कुमार 2024 में कहाँ से चुनाव लड़ेंगे, इस पर अभी से बात करना जल्दबाज़ी होगी. लेकिन उत्तर प्रदेश बिहार का पड़ोसी राज्य है और यूपी के लोगों ने भी बिहार में नीतीश के काम को महसूस किया है."
ललन सिंह के मुताबिक़, "जेडीयू की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक में यह मुद्दा उठा था. कुछ कार्यकर्ताओं की यह भी इच्छा है कि वो मिर्ज़ापुर से चुनाव लड़ें तो कुछ चाहते हैं कि नीतीश आंबेडकर नगर से चुनाव लड़ें. ये कार्यकर्ताओं की भावना है लेकिन इसपर समय से पहले कुछ भी कहना उचित नहीं है."
फूलपुर ही क्यों?
दरअसल फूलपुर प्रयागराज ज़िले में आता है, जो पूर्वी यूपी का हिस्सा है और बिहार की सीमा से ज़्यादा दूर नहीं है.
फूलपुर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का संसदीय क्षेत्र रहा है. जवाहर लाल नेहरू यहाँ से 1952, 1957 और 1962 में चुनाव जीते थे.
फूलपुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा सीट वाराणसी के भी पास है. ऐसे में नीतीश कुमार सीधा नरेंद्र मोदी से मुक़ाबला लेने वाली छवि बना सकते हैं.
दूसरी तरफ बिहार की सीमा से लगे उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों पर भी इसका असर हो सकता है.
फूलपुर सीट के जातीय समीकरण की बात करें, तो यहाँ सबसे ज़्यादा असर पटेल यानी कुर्मी वोटर हैं. उसके बाद यादव, मुस्लिम और ब्राह्मण वोटरों की संख्या यहाँ सबसे ज़्यादा है. ऐसे में नीतीश पटेलों के सहारे चुनाव लड़ने की योजना बना सकते हैं.
फूलपुर सीट आज़ादी के बाद से ही कांग्रेस का गढ़ रही है और बाद में समाजवादी पार्टी और बसपा भी यहाँ से चुनाव जीत चुकी है. हालाँकि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने इस सीट पर अपना परचम लहराया है.
शायद पिछले दो परिणामों की वजह से नीतीश कुमार उम्मीद कर रहे हों कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की इस सीट पर उन्हें सपा और बसपा दोनों का समर्थन मिल सकता है.
हालाँकि 2019 में सपा और बसपा साथ लड़ी थी लेकिन मुस्लिम और यादव वोटरों के अलावा बसपा के पारंपरिक वोट के बाद भी यहाँ से बीजेपी चुनाव जीती थी.
दूसरी तरफ मिर्ज़ापुर लोकसभा सीट की बात करें, तो यह भी पूर्वी उत्तर प्रदेश में आता है और यहाँ भी सबसे ज़्यादा कुर्मी वोटर हैं.
2019 के लोकसभा चुनावों के आँकड़ों पर ग़ौर करें, तो यहाँ कुर्मी वोटर 3 लाख से ज़्यादा थे जबकि दूसरे नंबर पर बिंद समाज के वोटर थे. जिनकी संख्या क़रीब डेढ़ लाख थी. यानी यहाँ कुर्मी वोटरों की संख्या काफ़ी बड़ी है, जो नीतीश कुमार के लिए एक उम्मीद बन सकते हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कुर्मी समुदाय से आते हैं.
वहीं आंबेडकर नगर लोकसभा सीट पर भी सबसे बड़ी संख्या कुर्मी वोटरों की है. शायद इसलिए जेडीयू की तरफ़ से इन्हीं 3 सीटों की चर्चा छेड़ी गई है.
सीएसडीएस के संजय कुमार कहते हैं, "आज की राजनीति में प्रॉक्सी वॉर चल रहा है. यह एक शैडो बॉक्सिंग है, एक तरफ बीजेपी दूसरे और तीसरे नंबर पर रही सीटों पर फ़ोकस कर यह दिखाना चाहती है कि 303 सीटें तो हमारे पास हैं ही जो हमने 2019 में जीती थीं और अब हम बाक़ी सीटों को जीतने की तैयारी कर रहे हैं."
संजय कुमार के मुताबिक़, नीतीश भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वो एक राष्ट्रीय नेता हैं और कहीं से भी चुनाव लड़ सकते हैं, जैसे नरेंद्र मोदी लड़ते हैं. लेकिन संजय कुमार ने यह भी कहा है कि अभी यह शैडो बॉक्सिंग है और हो सकता है कि 2024 में नीतीश फूलपुर से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला करें.
इस मुद्दे पर बीजेपी की तरफ से नीतीश कुमार पर तीखा हमला भी किया गया है. बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने कहा, "नीतीश कुमार 17 साल से कोई चुनाव नहीं लड़े हैं और अब वो यूपी से चुनाव लड़ेंगे. नीतीश अपनी ज़मानत तक नहीं बचा पाएँगे और औंधे मुंह गिरेंगे."
नीतीश कुमार का चुनावी मैदान में इतिहास
लंबे समय से नीतीश कुमार सीधे तौर पर किसी चुनावी मैदान में नहीं उतरे हैं. नीतीश कुमार लगातार विधान परिषद के रास्ते से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते रहे हैं.
अगर उनके चुनावी इतिहास पर नज़र डालें तो वो साल 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लगातार 6 बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं.
2004 में नीतीश आख़िरी बार लोकसभा चुनाव लड़े थे. जबकि साल 1995 में वो अंतिम बार विधानसभा का चुनाव लड़े थे. इस तरह से लोकसभा चुनावों के लिहाज़ से वो काफ़ी अनुभवी खिलाड़ी रहे हैं.
नीतीश कुमार का चुनावी सफ़र
- 1977 में पहली बार बिहार विधानसभा के लिए जनता पार्टी के टिकट पर हरनौत से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए.
- 1980 में जनता पार्टी सेक्यूलर के टिकट पर हरनौत से फिर चुनाव लड़े, लेकिन इस बार भी हार गए.
- 1985 में पहली बार बिहार विधानसभा के लिए चुने गए. वे हरनौत से चुनाव लड़े और जीते भी.
- 1989 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा. वे बाढ़ से लड़े और लोकसभा के लिए चुने गए.
- 1991 में एक बार फिर वे लोकसभा पहुँचे.
- 1996 में भी वे लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुँचे.
- 1998 में उन्होंने फिर लोकसभा का चुनाव जीता.
- 1999 में वे 13वीं लोकसभा के लिए चुने गए. ये लोकसभा में उनका पाँचवाँ टर्म था.
- 2004 में वे नालंदा से चुनाव जीतकर फिर लोकसभा पहुँचे.
- 2006 में वे बिहार विधान परिषद के सदस्य बने.
- 2012 में वे फिर बिहार विधान परिषद के सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए.
- 2018 में तीसरी बार वे बिहार विधान परिषद के सदस्य चुने गए.
वहीं समाजवादी पार्टी के नेता अनुराग भदौरिया ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि ये सब बीजेपी का किया हुआ है, कोई पार्टी अभी से अपनी रणनीति किसी को क्यों बताएगी. अनुराग भदौरिया के मुताबिक़ अभी 2024 का चुनाव बहुत दूर है.
बिहार से अलग यूपी से क्यों चुनाव लड़ने की चर्चा
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण की बात करें तो यहाँ की 80 सीटों में 2019 में बीजेपी को 62 सीटें मिली थीं.
कई जानकारों का मानना है कि बीजेपी देशभर में अपने सबसे अच्छे प्रदर्शन पर पहुँच चुकी है. इसलिए बीजेपी की तरफ से भी पिछले लोकसभा चुनावों में क़रीबी अंतर से हारे सीटों पर अभी से ही ख़ास तैयारी की जा रही है.
ऐसे में नीतीश कुमार भी नरेंद्र मोदी की तरह अपना राज्य छोड़कर राजनीतिक रूप से सबसे बड़े राज्य यूपी से चुनाव लड़ने की योजना बना सकते हैं.
भारत की संसदीय राजनीति में एक कहावत बहुत पुरानी है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर गुज़रता है.
शायद इसलिए 2014 के लोकसभा चुनावों में उस वक़्त बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के अलावा उत्तर प्रदेश से भी चुनाव लड़ने का फैसला किया था.
2014 में दो सीटों से जीतने के बाद नरेंद्र मोदी ने यूपी की वाराणसी सीट अपने पास रखी और गुजरात की वडोदरा सीट को छोड़ दी थी.
पटना एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर का कहना है कि नीतीश कुमार राष्ट्रीय नेता बनने की लगातार कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए वो कई राज्यों का दौरा कर चुके हैं, कई नेताओं से मिल चुके हैं. मौजूदा राजनीति में नीतीश कुमार अपनी जगह तलाश रहे हैं.
डीएम दिवाकर के मुताबिक़ नीतीश पिछली बार भी यूपी में सक्रिय रहे थे, लेकिन उस वक़्त वो बीजेपी के साथ थे, नीतीश कुमार 2024 में कहाँ से लड़ेंगे इस पर कुछ भी कहना बहुत जल्दबाज़ी होगी, लेकिन अगर वो फूलपुर से चुनाव लड़ते हैं तो इससे यह भी ज़ाहिर होता है कि उनके सपा से संबंध बेहतर हुए हैं.
बीजेपी के साथ रिश्ते
हाल ही में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ रिश्ता तोड़ते हुए राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन किया है. बीजेपी के साथ पहली बार 2005 के चुनाव में नीतीश कुमार ने गठबंधन किया था. उसके बाद से बिहार में लगातार नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार चलती रही.
लेकिन जून 2013 में नरेंद्र मोदी को बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद नीतीश कुमार ने नाता तोड़ लिया था. लेकिन 2014 के चुनाव में बीजेपी को बिहार में अच्छी जीत मिली.
जिसके बाद नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफ़ा दे दिया और जीतनराम माँझी बिहार के सीएम बने. हालाँकि फरवरी 2015 में वे फिर बिहार के सीएम बने. उन्होंने 2015 का विधानसभा चुनाव लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर लड़ा और शानदार जीत भी हासिल की.
लेकिन 2017 में ही नीतीश ने आरजेडी से नाता तोड़ लिया और फिर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई. 2020 का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ मिलकर लड़ा और फिर सीएम भी बने. लेकिन उनकी पार्टी की सीटों की संख्या काफ़ी घट गई.
इन सबके बीच इस साल अगस्त में नीतीश ने एक बार फिर बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया और आरजेडी के साथ मिलकर सरकार बनाई. नीतीश कुमार ने इस बार 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर कई बार नरेंद्र मोदी और बीजेपी को चुनौती भी दी और ये भी दावा किया कि बीजेपी दो सीटों के आसपास सिमट जाएगी.
उन्होंने कई बार नरेंद्र मोदी पर भी बिना नाम लिए निशाना साधा है. पिछले दिनों उनकी दिल्ली यात्रा भी सुर्ख़ियों में रही. उन्होंने कई विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाक़ात की. माना जा रहा है कि नीतीश कुमार 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं.
हालाँकि विपक्ष के पीएम पद के उम्मीदवार के सवाल को नीतीश कुमार कई बार ख़ारिज कर चुके हैं. लेकिन उनकी पार्टी के कई नेताओं ने इसकी संभावना से इनकार नहीं किया है.
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