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नीतीश कुमार के साथ राहुल गांधी की मुलाक़ात की तस्वीर क्या कहती है
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"है क्या यूपीए? अभी कोई यूपीए नहीं है?"
1 दिसंबर 2021, मुंबई - ममता बनर्जी ने शरद पवार से मुलाक़ात के बाद ये बयान दिया था.
"आप इसे थर्ड फ़्रंट का नाम क्यों दे रहे हैं. हमने कभी इसे थर्ड फ़्रंट का नाम नहीं दिया."
31 अगस्त 2022, पटना - केसीआर ने नीतीश कुमार से मुलाक़ात के बाद ये बयान दिया.
भारत की राष्ट्रीय राजनीति में ये बात किसी से छुपी नहीं है कि ममता बनर्जी और केसीआर साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में विपक्ष को एकजुट करने की कवायद में जुटे हैं और इस पहल में दूसरी पार्टियों की भूमिका को बाक़ियों के मुकाबले कमतर आंकते हैं.
दोनों नेताओं के ऊपर दिए बयानों का अर्थ ये भी निकाला गया कि वो संयुक्त विपक्ष में कांग्रेस की भूमिका को ज़्यादा तवज्जो नहीं देते.
लेकिन 5 सितंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब दिल्ली पहुँचे तो सबसे पहले मिलने वाले नेताओं में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम शुमार था.
दोनों की मुलाकात की तस्वीरें ट्विटर पर खूब शेयर भी हो रही थीं.
इस वजह से ममता और केसीआर के पुराने बयान जिन्हें कांग्रेस से जोड़ कर देखा गया, राजनीति के जानकारों को खूब याद आ रहा है.
ममता दिल्ली आकर बिना कांग्रेस के नेताओं से मिले चली जाती हैं, केसीआर नीतीश से मिलने पटना जाते हैं, लेकिन राहुल से मिलने दिल्ली नहीं आते - ऐसे में सवाल उठता है कि नीतीश कुमार कांग्रेस को इतना भाव क्यों दे रहे हैं.
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'कांग्रेस के पास नेता नहीं और नीतीश के पास संगठन नहीं'
जवाब तलाशने की कोशिश में हमने बात की पटना के एन सिन्हा इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर से.
वो राहुल गांधी से मुलाकात को एक तरह से नीतीश कुमार की मजबूरी करार देते हैं.
दिवाकर 2017 का मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा का बयान याद करने की बात कहते हैं.
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने 2017 में नीतीश कुमार के लिए कहा था, "देश में एक असली लीडर है और वो हैं नीतीश कुमार. नीतीश कुमार बिना पार्टी के लीडर हैं और कांग्रेस पार्टी के पास लीडर नहीं है, इसलिए कांग्रेस अगर नीतीश कुमार को यूपीए के नेतृत्व का मौका देती है तो उसका भविष्य बेहतर हो सकता है." उनके इस बयान की तब ख़ूब चर्चा हुई थी.
डीएम दिवाकर कहते हैं, 2017 की वो बात आज भी उन पर लागू होती है.
ममता बनर्जी अपने दम पर दूसरी बार बीजेपी को पश्चिम बंगाल में हरा चुकी हैं.
केसीआर भी तेलंगाना में अपने दम पर सरकार चला रहे हैं और बीजेपी के सामने डट कर खड़े हैं.
लेकिन नीतीश कुमार बैसाखी के सहारे बिहार की सत्ता पर क़ाबिज़ है.
एनडीए से अलग होने के बाद नीतीश कुमार आरजेडी, कांग्रेस और लेफ़्ट के समर्थन से बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं.
दिवाकर कहते हैं, "राज्य में गठबंधन का साथी होने की वजह से कांग्रेस को साथ लेकर चलना उनकी मजबूरी है. दूसरी मजबूरी ये है कि अकेले उनमें ना तो वो क्षमता है और ना ही उनके पार्टी संगठन में वो दम है कि विपक्ष को एकजुट कर सके."
साल 2024 में लोकसभा का अंक गणित
बीबीसी से बातचीत में प्रोफ़ेसर दिवाकर आगे कहते हैं, "अगर आज के हालात में हम ये मान भी लें कि 2024 में भी बिहार में इसी गठबंधन के साथ नीतीश चुनाव में उतरेंगे तो उन्हें बिहार की 40 सीटों में से अधिकतम 15 सीटें ही लड़ने के लिए मिलेंगी. अगर वो सारी भी जीत जाते हैं तो 15 सांसदों के साथ पीएम बनने का सपना नहीं देख सकते."
हालांकि ये भी एक तथ्य है कि नीतीश कुमार ने राहुल गांधी से मुलाक़ात के बाद ये साफ़ कहा है कि पीएम बनने की उनकी कोई ख़्वाहिश नहीं है. वो केवल विपक्ष को एकजुट करना चाहते हैं.
बिहार के अलावा गुजरात और मणिपुर में भी जेडीयू के विधायक जीतते हैं, लेकिन सांसद बनने या बनाने की स्थिति में कभी नहीं पहुंचे.
लेकिन प्रोफ़ेसर दिवाकर की बातों को पश्चिम बंगाल और तेलंगाना के संदर्भ में भी देखने की ज़रूरत है.
पश्चिम बंगाल से लोकसभा की 42 सीटें हैं. उनमें से टीएमसी के पास 23 हैं.
दो बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मात देने के बाद ममता लोकसभा चुनाव में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने का दावा कर सकती हैं. गोवा, त्रिपुरा और असम में टीएमसी अपने विस्तार का सपना भी संजो रही है. राज्य में वो कांग्रेस के सहारे भी नहीं है.
वहीं तेलंगाना से लोकसभा की 17 सीटें हैं. केसीआर की पार्टी के पास नौ और बीजेपी को चार सीटें वहां 2019 में मिली थीं.
इस आधार पर केसीआर को भी दूसरे क्षेत्रीय दलों को विपक्ष के पीएम पद के चेहरे की ज़रूरत पड़ेगी और ममता को भी.
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कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय पहचान
'कांग्रेस मुक्त विपक्ष' की कल्पना आज के परिप्रेक्ष्य में इस वजह से भी बेमानी है क्योंकि कांग्रेस के पास आज भी 20 प्रतिशत वोट शेयर है. ऐसा राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत किशोर का दावा है.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2014 में कांग्रेस पार्टी और भाजपा का सीधा मुकाबला 189 सीटों पर था जिसमें से बीजेपी ने 166 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
वहीं 2019 में कांग्रेस पार्टी और बीजेपी का सीधा मुकाबला 192 सीटों पर था जिसमें से बीजेपी ने 176 सीटों पर जीत दर्ज़ की थी.
यानी लोकसभा की क़रीब 200 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार हर बार फ़ाइट में होते हैं.
ऐसे में साफ़ है कि नीतीश राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं और शायद इस अंक गणित को ठीक से समझते हैं. और शायद यही वजह है कि ममता बनर्जी और केसीआर की तरह नीतीश कुमार कांग्रेस के ख़िलाफ़ कभी उस तरह से आक्रामक नहीं रहे.
राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन का प्रयोग
दि टेलीग्राफ़ के साथ पूर्व में जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार नलिन वर्मा कहते हैं, " एनडीए खेमे से निकल कर नीतीश कुमार ने जब आरजेडी के साथ सरकार बनाई थी, तब राहुल गांधी ने उन्हें बधाई भी दी थी. उस नाते दिल्ली आकर राहुल गांधी से मिलने को 'एक औपचारिकता' भी कहा जा सकता है."
लेकिन नलिन वर्मा साथ ही इस मुलाक़ात को नीतीश कुमार की रणनीति का हिस्सा भी बताते हैं.
"बिहार में सात पार्टियों के गठबंधन के साथ नीतीश कुमार सरकार चला रहे हैं. एक प्रयोग जो बिहार से शुरू हुआ है, क्या राष्ट्रीय राजनीति में उसे केंद्र के स्तर पर दोहराया जा सकता है - इसी की संभावनाएं तलाशने के लिए नीतीश कुमार कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिले हैं.
केसीआर को कांग्रेस से दिक़्क़त है, ममता बनर्जी को कांग्रेस से दिक़्क़त हैं, लेकिन राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता है.
अंतत: चाहे केसीआर हों या ममता बनर्जी सब 'बीजेपी मुक्त' भारत का सपना देख रहे हैं और कांग्रेस से बात नहीं कर रहे हैं. दोनों के बीच के विरोधाभासों को दूर करने में नीतीश कितने सफल होंगे, ये देखना अभी बाक़ी है. हालांकि कोशिश उनकी जारी है."
वहीं प्रशांत किशोर, जो फ़िलहाल बिहार की राजनीतिक नब्ज़ टटोलने के लिए यात्रा पर निकले हैं, उनका मानना है कि नीतीश कुमार का प्रयोग राज्य स्तर का प्रयोग है. राष्ट्रीय स्तर पर इसका असर होता वो नहीं देखते.
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