विश्व पर्यटन दिवस के बहाने बात उत्तराखंड पहुंचने वाले पर्यटकों की मुश्किलों की

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- Author, अशोक पाण्डे
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
संयुक्त राष्ट्र संघ की अपील पर साल 1980 के बाद से हर साल 27 सितम्बर को दुनियाभर में विश्व पर्यटन दिवस के रूप में मनाये जाने की परम्परा बनी हुई है. ज़ाहिर है उसे उत्तराखंड में भी मनाया जाता है.
पर्यटन मनुष्य की सबसे आदिम प्रवृत्ति है. अपने घर, परिवेश, समाज से बाहर जाकर दूसरे मानवीय वातावरणों के बारे में जानने की जिज्ञासा रखना ही पर्यटन का मूल है और हमारे इतिहास का निर्माण जिन अकल्पनीय खोजों से हुआ है उनमें से ज़्यादातर, जैसे नए देशों-द्वीपों-महाद्वीपों का खोजा जाना और उनके मध्य संस्कृति और व्यापार के परस्पर लेन-देन, पर्यटन के बिना संभव ही नहीं थीं.
स्पेन के मैड्रिड में स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ की एक महत्वपूर्ण संस्था विश्व पर्यटन संगठन (UNWTO) दुनियाभर में होने वाले पर्यटन के मामलों की निगरानी करती है और उसके लिए मानक और दिशानिर्देश तय करती है.
उसके चार्टर में पर्यटन की यह परिभाषा लिखी हुई है, "पर्यटन एक सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत लोगों द्वारा व्यक्तिगत अथवा व्यावसायिक कारणों से अपने रोज़मर्रा परिवेश के बाहर दूसरे देशों अथवा स्थानों में आवागमन किया जाता है. इन लोगों को पर्यटक कहा जाता है और पर्यटन का सरोकार उनकी गतिविधियों से है, जिनमें से कुछ के भीतर पर्यटन संबंधी व्यय शामिल होता है."
इस परिभाषा को ग़ौर से पढ़ें तो पर्यटन के पहले दो सरोकार मनुष्य सभ्यता के दो सबसे बड़े अवयवों, समाज और संस्कृति हैं. अर्थव्यवस्था का नंबर इन दोनों के बाद आता है. पिछले पचास वर्षों में अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर जिस तेज़ी से पर्यटन की प्रवृत्ति बढ़ी है, उसके परिप्रेक्ष्य में उसकी आधुनिक अवधारणा में अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे उसका सबसे पहला सरोकार बनती चली गयी है.
यह एक बड़ी विडम्बना है जिसके चलते सामाजिकता और संस्कृति को पार्श्व धकेल कर संसार की सबसे सुन्दर जगहों और समाजों को आर्थिक लाभ हासिल करने की वस्तु भर बना दिया गया है.

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उत्तराखंड में पर्यटन

उत्तराखंड एक छोटा सा पर्वतीय राज्य है, लम्बे जनसंघर्षों के बाद जिसकी स्थापना 9 नवम्बर 2000 को हुई थी. उत्तराखंड के निर्माण के समय इस बात पर विशेष ज़ोर दिया गया था कि उसे एक बड़े पर्यटन राज्य के रूप में विकसित किया जाएगा.
राज्य की स्थापना के दो दशकों के भीतर सरकारों ने दो बार पर्यटन नीतियां तो बनाई हैं लेकिन बेतरतीब विकास और दिशाहीन नियोजन के चलते ज़मीन पर उनका कोई बड़ा असर देखने को नहीं मिलता. उल्टे अनेक सुन्दर जगहें अपना आकर्षण खो चुकी हैं.
उत्तराखंड की पर्यटन नीति में पर्यटन का अर्थ यूँ बताया गया है - "पर्यटन से आधुनिक समय में सभी प्रकार के पर्यटन जैसे धार्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, तीर्थाटन, साहसिक पर्यटन, खेल पर्यटन, चिकित्सा पर्यटन, हेली पर्यटन, पारिस्थिकीय पर्यटन, फ़िल्म पर्यटन एवं वन्य जीवन पर्यटन आदि अभिप्रेत हैं."
2001 में लागू की गई पहली पर्यटन नीति के सबसे प्रमुख उद्देश्य के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर का आधारभूत ढाँचा स्थापित करना और नए पर्यटक-स्थलों की पहचान करना बताया गया था जबकि 2018 की दूसरी पर्यटन नीति में उत्तराखंड की महान हिमालयी श्रृंखलाओं, अल्पाइन वनों और स्थानीय पर्यावरण को उत्तराखंड की सबसे बड़ी विशेषता बताते हुए उसे नज़दीकी स्थानों जैसे दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर इत्यादि की बड़े बाज़ारों के पर्यटकों के लिए सप्ताहांत बिताने की आदर्श जगह कहा गया.
18 वर्षों के अंतराल में बनीं इन दो सरकारी नीतियों को किस सीमा तक क्रियान्वित किया गया है उसकी पड़ताल करनी हो तो उत्तराखंड के कुछ पर्यटक स्थलों का सरसरी तौर पर जायज़ा लेना ही पर्याप्त होगा.

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रालम ग्लेशियर का ट्रैक

पहले गर्मियों के पर्यटक सीज़न में नैनीताल और मसूरी जैसी जगहों पर ट्रैफ़िक जाम लगना आम बात थी, अब यह स्थिति हर छोटे-मोटे पर्यटक-स्थल की है. इन जगहों को जोड़ने वाली सड़कों पर लगातार चलते रहने वाले निर्माण कार्य इस स्थिति को और भी गंभीर बना देते हैं. नतीजतन इस मौसम में पर्यटकों को अनेक तरह की अस्त-व्यस्त परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है.
उत्तराखंड के सीमान्त ज़िले पिथौरागढ़ के मुनस्यारी इलाक़े में रालम नाम का ग्लेशियर है. साहसिक पर्यटन के दीवानों के बीच इस ग्लेशियर का ट्रैक बहुत विशिष्ट और मुश्किल माना जाता है. पिछले कुछ वर्षों से राज्य के सुदूरतम क्षेत्रों को लगातार सड़क से जोड़ा जा रहा है जिसके चलते बहुत सारे ग्लेशियरों तक जाने के रास्ते बहुत आसान हो गए हैं.
रालम ग्लेशियर का ट्रैक उन कुछ दुर्लभ रास्तों से होकर गुज़रता है जहां गाड़ियां नहीं पहुंचतीं. यह रास्ता अब भी वैसा ही है जैसा बीस-पच्चीस साल पहले हुआ करता था.
मिसाल के तौर पर आप रास्ते में स्थित मलझाली नाम की जगह पर पहुंचें तो वहां बनाई गईं सरकारी अल्पाइन हट्स आपको उतनी ही गन्दी मिलेंगी जितनी वे हमेशा रही हैं - उनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं है, उनके भीतर मवेशी गोबर कर जाते हैं, उनकी खिड़कियाँ टूटी हुई हैं और टॉयलेट्स में अब भी पानी का कनेक्शन नहीं है. यह अनुभव इस वर्ष रालम ग्लेशियर के ट्रैक पर गए, अल्मोड़ा में रहने वाले मेरे अनुभवी ट्रेकर-फ़ोटोग्राफ़र दोस्तों जयमित्र बिष्ट और भरत शाह का है.
साहसिक पर्यटन और ट्रैकिंग के क्षेत्र में बागेश्वर ज़िले के पिंडारी ग्लेशियर को पिछले अनेक दशकों से यात्रियों के बीच सबसे लोकप्रिय गंतव्य का दर्जा हासिल है. इस वर्ष उत्तराखंड की सरकार ने पिंडारी ग्लेशियर को ट्रैक ऑफ़ द ईयर घोषित किया है. वर्तमान में इस ट्रैक की वास्तविक स्थिति यह है कि वहां जा सकना न केवल बेहद मुश्किल है, बल्कि यात्रियों को अपनी जान जोखिम में डालकर वहां जाना होता है.

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आज से कोई दस साल पहले तक पिंडारी का पैदल रास्ता लोहारखेत, धाकुड़ी और खाती जैसी जगहों से होकर जाता था. फिर उस पर विकास की नज़र पड़ गई और सरकार ने कुर्मी और खरकिया होते हुए वहां सड़क बनवानी शुरू की. देखभाल की कमी के चलते पुराने रास्ते की हालत ख़राब होती चली गई है जबकि नया रास्ता लगातार भूस्खलन के चलते अक्सर बंद हो जाता है.
प्राकृतिक आपदाओं के चलते हर साल ट्रैक का मार्ग बदलता है, हर साल टूट-फूट होती है, पुल बह जाते हैं कई बार ऐसा भी होता है कि उस क्षेत्र में हर साल जाने वाले स्थानीय चरवाहों तक का लौटना मुश्किल हो जाता है.
ऐसे में अगर किसी ने ट्रैक ऑफ़ द ईयर करना है तो उसे समय रहते यह बताने की कोई व्यवस्था नहीं है कि रास्ता खुला है या नहीं. कई बार इसकी परिणति त्रासदियों में भी होती है और निर्दोष ट्रैकरों को अपने प्राण तक गंवाने पड़ते हैं. ट्रैकरों की सुविधा के लिए व्यवस्थाओं की स्थिति बदहाली को कफ़नीगाड़ और पिंडर नदियों के संगम पर स्थित द्वाली में बने एक पुराने सरकारी गेस्टहाउस में देखा जा सकता है.
ऐसा ही एक और उदाहरण पिथौरागढ़ ज़िले की ही ख़ूबसूरत दारमा और व्यांस घाटियों का दिया जा सकता है जहाँ तक हाल के वर्षों में सड़कें पहुंचा दी गई हैं. इससे वहां जाने वाले पर्यटकों की संख्या में वृद्धि तो हुई है लेकिन मूलभूत सरकारी सेवाओं का अब भी अभाव है.
इन घाटियों के गाँवों को होमस्टे की योजनाओं से जोड़ा तो गया है लेकिन उन्हें आधुनिक बनाने और बेहतर सुविधाओं से लैस करने की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया है. आदि कैलाश और मानसरोवर जैसी शताब्दियों पुरानी तीर्थयात्राएं इन घाटियों से होकर जाती रही हैं और उनके नियत पुराने रास्ते बने हुए थे. बेतरतीब सड़कों के निर्माण के चलते ये सभी पुराने रास्ते या तो नष्ट हो गए हैं या उनकी हालत देखते हुए उन पर चलने का साहस वही कर सकता है जिसे अपने प्राण प्यारे न हों.

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हिमालय का नुक़सान

ये झलकियां हिमालय के बिल्कुल बीचों-बीच मौजूद कुछ ऐसे स्थानों की हैं जिनके सौन्दर्य के आगे यूरोप की सुन्दरतम जगहें फीकी पड़ जाती हैं. पर्यटन को फ़क़त आर्थिक लाभ का साधन समझने वाली सरकारों ने पिछले बीस वर्षों में जितना नुक़सान हिमालय और उसके परिवेश का किया है, वैसा पिछली कई शताब्दियों में नहीं हुआ था.
विकास नाम के दैत्य ने हिमालय की पसलियों में सेंध लगाकर उसे चीर डाला है जिसका परिणाम लगातार हो रहे भूस्खलनों और अन्य आपदाओं की सूरत में दिखाई देने लगा है. जिस हिमालय को नीति-निर्माताओं ने उत्तराखंड के पर्यटन की रीढ़ बताया था उसी की लगातार अनदेखी की जाती रही है. जिन प्राकृतिक संसाधनों को पर्यटकों को आकर्षित करने वाला कारक बताया जा रहा था उन्हीं का सबसे अनियंत्रित और क्रूर दोहन हुआ है.
पर्यटन के माध्यम से स्थानीय जनों को रोज़गार उपलब्ध कराये जाने के दावों की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि आपको दूरस्थ दुर्गम जगहों में भी मैगी पॉइंट तो मिल जाते हैं यह बताने वाला कोई नहीं मिलता कि आगे का रास्ता खुला है या नहीं.
नए पर्यटन-स्थलों की पहचान और उनके विकास का यह हाल है कि पहले से विकसित, नैनीताल-मसूरी जैसे अंग्रेज़ों के बनाए पर्यटन-स्थलों में लगातार पांच-सितारा महानगरीय सुविधाएं पहुँच रही हैं, जबकि मुख्य मार्ग से थोड़ा सा भी हट कर स्थित सुन्दरतम स्थान टेलीफ़ोन और इंटरनेट जैसी ज़रूरी सुविधाओं से भी महरूम हैं.

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