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नितिन गडकरी: जिसके लिए कभी पार्टी संविधान बदला गया, वो आज संसदीय बोर्ड से बाहर क्यों?
- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक व़क्त था जब नितिन गडकरी को बीजेपी के अध्यक्ष पद पर दोबारा चुने जाने के लिए पार्टी के संविधान तक को संशोधित कर दिया गया था और अब एक आज का व़क्त है, जब उन्हें न तो पार्टी की नव गठित संसदीय बोर्ड और न ही केंद्रीय चुनाव समिति का हिस्सा बनाया गया है.
बीजेपी ने बुधवार को जब अपने नए संसदीय बोर्ड के सदस्यों की लिस्ट जारी की तो हमेशा अपनी ही पार्टी को आड़े हाथों लेने वाले बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट कर कहा, ''जनता पार्टी औ फिर बीजेपी के शुरुआती दिनों में, पदाधिकारियों के पदों की भर्ती के लिए पार्टी और संसदीय दल के चुनाव होते थे. पार्टी संविधान के अनुसार यही होना चाहिए, लेकिन आज बीजेपी में कोई चुनाव नहीं होते. हर नामांकित पद के लिए मोदी की मंज़ूरी की ज़रूरत होती है.''
एनसीपी के प्रवक्ता क्लाई क्रास्टो ने भी बीजेपी पर तंज़ कसते हुए कहा कि नितिन गडकरी को बीजेपी के संसदीय बोर्ड में शामिल नहीं करना, ये दर्शाता है कि एक राजनेता के रूप में उनका क़द काफ़ी बढ गया है.
''जब आपकी योग्यता और क्षमताएं बढ़ती हैं और आप उच्च पद के लिए चुनौती पेश करते हैं तो BJP आपके क़द को छोटा कर देती है.''
कई राजनीतिक विश्लेषक भी ये मानते हैं कि विचारों की स्पष्टता और दमदार छवि के कारण गडकरी का राजनीतिक करियर पिछले कुछ सालों में काफ़ी प्रभावित हुआ है.
हालांकि नितिन गडकरी कई दफ़े कह चुके हैं कि वो केवल 20 प्रतिशत काम राजनीति के लिए करते हैं, बाकी 80 फ़ीसदी काम वो समाजिक कारणों के लिए करते हैं. हाल ही नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि "महात्मा गांधी के समय राजनीति देश, समाज, विकास के लिए होती थी, लेकिन अब राजनीति सिर्फ़ सत्ता के लिए होती है. कभी-कभी उनका मन राजनीति छोड़ देने का करता है."
गडकरी के इस बयान को ज़्यादा व़क्त भी नहीं हुआ कि पार्टी ने उन्हें संसदीय समिति से बाहर का रास्ता दिखा दिया. पार्टी के इस फ़ैसले के पीछे की मुख्य वजह क्या रही और क्या वाक़ई पिछले कुछ सालों में गडकरी पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौती के रूप में उभरे हैं.
व़क्त के साथ पार्टी में हुआ क़द छोटा
बीबीसी मराठी के पूर्व संवाददाता रह चुके प्रवीण मुधोलकर पिछले 20 सालों से नितिन गडकरी की राजनीति को क़रीब से देख-समझ रहे हैं.
प्रवीण का मानना है कि पिछले नौ सालों में पार्टी के अंदर गडकरी का क़द छोटा हुआ है और ये सबकुछ एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है.
''साल 2022 की ये हालिया घटना, यानी संसदीय बोर्ड में गडकरी को शामिल नहीं किया जाना, कोई नई बात नहीं है. ''
साल 2014 में जब मोदी कैबिनेट का गठन हो रहा था तो ये बात ज़ोरों शोरों से चल रही थी कि नितिन गडकरी को देश के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर की कमान दी जाएगी, लेकिन जब पोर्टफोलियो तय हुए तो गडकरी को केवल सड़क परिवहन, हाइवे और जहाजरानी मंत्रालय की ज़िम्मेदारी दी गई.''
कैबिनेट गठन के शुरुआती महीनों में ही तत्कालीन ग्रामीण विकास, पंचायती राज और जल शक्ति मंत्री गोपीनाथ मुंडे का आकस्मिक निधन हो गया. मुंडे के निधन के बाद उनके सभी विभाग गडकरी को मिले, लेकिन कुछ ही समय के बाद ये वापस भी ले लिए गए.
2017 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री उमा भारती जो विभाग (जल संसाधन, नदी विकास और गंगा मंत्रालय) संभाल रही थीं, उस विभाग की ज़िम्मेदारी गडकरी को दी गई.
पर 2019 के बाद नितिन गडकरी के पास केवल दो विभाग बचे - सड़क परिवहन और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, एक-डेढ़ साल के भीतर ही उनसे एमएसएमई विभाग भी वापस ले लिया गया.
वर्तमान में गडकरी के पास केवल एक विभाग है.
मुधोलकर कहते हैं, ''नितिन गडकरी को पहले बड़ी ज़िम्मेदारियां दी गईं और फिर उसे वापस भी ले लिया गया जबकि उन्हें जिस भी विभाग में काम करने का मौका मिला, वहां उन्होंने सराहनीय काम करके दिखाया.''
शानदार काम करने के बावजूद पार्टी से गडकरी को क्यों साइडलाइन किया जा रहा है, इसके जवाब में मुधोलकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके रिश्तों की ओर इशारा करते हैं.
मोदीसे कैसे हैं रिश्तें?
साल 2009 में जब नितिन गडकरी को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया तो नरेंद्र मोदी बीजेपी के इकलौते मुख्यमंत्री थे, जो उन्हें शुभकामना देने दिल्ली नहीं पहुंचे.
2009 से 2013 के बीच गडकरी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर बने रहे. इस दौरान नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे थे.
मुधोलकर कहते हैं, ''नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधी माने जाने वाले संजय जोशी को पार्टी में सक्रिय करने में भी नितिन गडकरी की अहम भूमिका रही थी जबकि नरेंद्र मोदी को संजय जोशी फूटी आंख नहीं सुहाते थे.''
''नितिन गडकरी ने संजय जोशी को 2012 में जब यूपी का चुनाव संयोजक बनाया तो मोदी को ये पसंद नहीं आया था और वो उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करने नहीं गए.
बाद में साल 2012 में पार्टी के मुंबई अधिवेशन में मोदी ने संजय जोशी के इस्तीफ़े की मांग रख दी. स्थितियां ऐसी बनीं कि गडकरी को न चाहते हुए भी जोशी का इस्तीफ़ा लेना पड़ा.''
शाह से कैसा रहा संबंध?
बात अगर शाह के साथ उनके रिश्ते की करें तो वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने बीबीसी हिंदी के लिए लिखे अपने एक पुराने लेख में बताया है कि 'जब नितिन गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष हुआ करते थे तब अमित शाह को अदालत के आदेश के चलते गुजरात राज्य छोड़ना पड़ा और गडकरी से मुलाकात करने के लिए उन्हें घंटों इंतज़ार करना पड़ता था. ऐसे में जब पार्टी पर मोदी और शाह का प्रभुत्व बढ़ा तो धीरे-धीरे गडकरी के पर कटने शुरू हो गए.'
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह बताते हैं कि 'इसकी शुरुआत महाराष्ट्र से की गई. गडकरी प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी ने उन्हें दरकिनार कर उनसे कम अनुभव वाले देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया.'
फडणवीस के साथ उनके संबंधों पर टिप्पणी करते हुए महाराष्ट्र टाइम्स नागपुर के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार श्रीपद अपराजित कहते हैं, ''दोनों के संबंध को आप न्यूट्रल कह सकती हैं. गडकरी के सामने फडणवीस काफ़ी कम अनुभवी हैं.''
वहीं साल 2014 में मुख्यमंत्री न बनाए जाने पर गडकरी की क्या प्रतिक्रिया थी, केंद्रीय नेतृत्व के फ़ैसले से क्या वो नाराज़ थे? इस सवाल के जवाब में मुधोलकर कहते हैं, ''गडकरी महाराष्ट्र की राजनीति करना चाहते थे ये बात सही है, लेकिन केंद्र में ज़िम्मेदारी मिलने के बाद उन्होंने कभी वापस महाराष्ट्र की राजनीति में लौटने के बारे नहीं सोचा.''
2014 के बाद गडकरी के क़द और पद पर क्या असर हुआ, इसका ज़िक्र मुधोलकर पहले ही कर चुके हैं.
हालांकि इन सब के बावजूद गडकरी का मिज़ाज नहीं बदला. वो पहले की तरह बेबाक बने रहे.
गडकरी का राजनीतिक मिज़ाज
बीजेपी की राजनीति को क़रीब से देखने वाले लोगों का मानना है कि गडकरी उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जो मोदी की हां में हां नहीं मिलाते, या यूं कहें तो मोदी का गुणगान नहीं करते. उनकी अपनी एक अलग पहचान रही है. ये पहचान उन्होंने अपने काम के बूते बनाई है. साथ ही संघ से उनकी नज़दीकी भी एक अहम वजह रही है.
वरिष्ठ पत्रकार सुनील चावके बताते हैं कि बीजेपी के ज़्यादातर नेताओं की तरह गडकरी कभी सांप्रदायिक बयान नहीं देते. वो हमेशा काम और विकास की बात करते हैं. बीजेपी के बाकी नेताओं की तरह वो विपक्षी पार्टियों के साथ अछूतों वाला व्यवहार भी नहीं करते.
मौजूदा व़क्त में बीजेपी और कांग्रेस के बीच विरोध की राजनीति जहां अपने चरम पर है, वहीं गडकरी के रिश्ते अच्छे हैं. वो कांग्रेस के नेताओं के साथ उठते-बैठते हैं. साल 2019 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गडकरी के कामों की जमकर सराहना की थी. राहुल गांधी भी उनकी तारीफ़ कर चुके हैं.
हालांकि पार्टी के नज़रिये से चावके गडकरी के इस रवैये को सही नहीं ठहराते. चावके कहते हैं, ''गडकरी ने कई बार पार्टी लाइन से ऊपर उठकर बयान दिए जिसे पार्टी के नज़रिये से देखने पर सही नहीं लगेगा. हाल ही उन्होंने कह दिया था कि वो राजनीति से संन्यास लेना चाहते हैं, अगर उनकी ऐसी इच्छा है या कोई नाराज़गी है तो इसे खुले मंच से नहीं कहना चाहिए. ये बातें पार्टी के अंदर होनी चाहिए क्योंकि इससे एक ग़लत संदेश जाता है और विपक्षी पार्टियों को बोलने का मौका मिलता है. विपक्ष के लोगों के साथ भी उनका ज़्यादा उठना-बैठना ठीक नहीं है.''
ये बात बिल्कुल सही है कि गडकरी ने पार्टी में रहते हुए कभी कांग्रेस की मज़बूती की कामना की तो कभी ये कह दिया कि बीजेपी केवल मोदी-शाह की पार्टी नहीं है.
गडकरी के विवादास्पद बयान
दिल से कामना करता हूं कांग्रेस मज़बूत बनी रहे
27 मार्च, 2022 - ऐसे व़क्त में जब बीजेपी के वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा देश में विपक्ष को ख़त्म करने की बात करते हैं, राजनीतिक पार्टियों के वजूद को चुनौती देने की बात करते हैं, नितिन गडकरी ने कांग्रेस की मज़बूती की कामना की.
पुणे में आयोजित एक जर्नलिज़्म अवॉर्ड शो में नितिन गडकरी ने कहा, ''एक लोकतंत्र में विपक्षी पार्टी की भूमिका बेहद अहम है. मैं दिल से कामना करता हूं कि कांग्रेस मज़बूत बनी रहे. आज जो कांग्रेस में हैं उन्हें पार्टी के लिए प्रतिबद्धता दिखाते हुए पार्टी में बने रहना चाहिए. उन्हें हार से निराश न होते हुए काम करना जारी रखना चाहिए."
केवल सपने दिखाने वाले नेताओं पर बयान
जनवरी, 2019 - मुबंई में एक कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने कहा था, ''सपने दिखने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, पर दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है. इसलिए सपने वही दिखाओ जो पूरे हो सकें. मैं सपने दिखाने वालों में से नहीं हूं. मैं जो बोलता हूं वो 100% डंके की चोट पर पूरा होता है.''
तब गडकरी के इस बयान के कई मायने निकाले गए. विपक्ष ने गडकरी के बयान को अपनी ही सरकार को आईना दिखाने वाला बताया. मामले को तूल पकड़ता देख बीजेपी को सफ़ाई देनी पड़ी कि गडकरी का बयान विपक्षी नेताओं के लिए था, न कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए.
इंदिरा गांधी की तारीफ़
जनवरी, 2019 - बीजेपी जहां देश में आपातकाल लगाने के लिए इंदिरा गांधी की जमकर आलोचना करती रही है, वहीं नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने इंदिरा गांधी की प्रशंसा की थी. उन्होंने कांग्रेस पार्टी के सम्मानित पुरुष नेताओं के बीच अपनी जगह बनाने और क्षमता साबित करने वाली इंदिरा गांधी की तारीफ़ की थी.
केवल मोदी-शाह की पार्टी नहीं बीजेपी
मई, 2019 - बीजेपी में प्रधानमंत्री मोदी के बढ़ते कद और उनके इर्द-गिर्द केंद्रित होती पार्टी के सवाल पर अपनी राय रखते हुए नितिन गडकरी ने कहा था कि बीजेपी एक वैचारिक पार्टी है. बीजेपी न कभी सिर्फ़ अटल-आडवाणी की पार्टी थी और न अब मोदी-शाह की.
नौकरियां ही नहीं तो आरक्षण का क्या फ़ायदा
अगस्त, 2018 - महाराष्ट्र में जब मराठा आरक्षण का मुद्दा ज़ोरों पर था तब केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ये कहकर मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी थीं कि आरक्षण देने का क्या फ़ायदा जब देश में नौकरियां ही नहीं हैं.
विपक्षी नेताओं ने तब भी गडकरी के इस बयान को ख़ूब हवा दी.
गडकरी का अब तक सफ़र
नितिन गडकरी की जन्म और कर्मभूमि दोनों ही नागपुर रही है. उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ. एलएलबी और एमकॉम तक की शिक्षा ग्रहण की और छात्र जीवन में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़कर अपने राजनीतिक सफ़र की शुरुआत कर दी.
1995 में महाराष्ट्र में शिव सेना-बीजेपी की गठबंधन सरकार में लोक निर्माण मंत्री बनाए गए और चार साल तक मंत्री पद पर रहे.
1989 में पहली बार विधान परिषद के लिए चुने गए. तब से लगातार 20 वर्षों तक विधान परिषद के सदस्य चुने जाते रहे.
2008 तक विधान परिषद के सदस्य बने रहने के बाद 19 दिसंबर, 2009 को बीजेपी के संसदीय बोर्ड में उन्हें सर्वसम्मति से नए अध्यक्ष के तौर पर चुना गया .
2013 तक वो पार्टी के अध्यक्ष पद पर बने रहे. आगे भी उनको अध्यक्ष बनाए रखने के लिए पार्टी के संविधान में संशोधन किया गया, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण उन्होंने ख़ुद ही पद स्वीकारने से मना कर दिया. पार्टी के अंदर भी तब उनके ख़िलाफ कई लोगों ने आवाज़ उठाई थी.
श्रीपद अपराजित बताते हैं कि 'तब इंडिया अगेंस्ट करप्शन के प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल ने गडकरी की कंपनी पूर्ति पावर और शुगर लिमिटेड पर संदेहास्पद आर्थिक मदद हासिल करने के आरोप लगाए थे. बाद में ये आरोप ग़लत साबित हुए और केजरीवाल ने सार्वजनिक तौर पर गडकरी से माफ़ी भी मांगी.'
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी 2012 में गडकरी पर ये आरोप लगाए थे कि उनके सांसद अजय संचेकती के साथ व्यवसायिक संबंध हैं और कोल ब्लॉक आवंटन मामले में उनको 450 करोड़ रुपए का फ़ायदा मिला है.
दिग्विजय सिंह के आरोपों के बाद गडकरी ने उन पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया, जिसके बाद कांग्रेस नेता अपने बयान से पलट गए और कहा कि उन्होंने ऐसा केवल पॉलिटिकल हीट में कह दिया था.
क्या होगी अब गडकरी की राह?
साफ़गोई के साथ पिछले दो दशकों से ज़्यादा व़क्त से सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे और अपनी एक कुशल राजनेता की छवि बनाने में कामयाब रहे गडकरी की आगे की राह क्या होगी, इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार सुनील चावके कहते हैं, ''2024 के बाद वो केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा होंगे या नहीं, इसे लेकर भी अब असमंजस की स्थिति है.''
मुधोलोकर तो ये तक कहते हैं कि संघ से गडकरी की इतनी नज़दीकी न रहती तो काफ़ी पहले ही उन्हें पार्टी में साइडलाइन कर दिया जाता.
वहीं चावके कहते हैं कि आने वाले व़क्त में गडकरी या तो पूरी तरह शून्य होकर घर पर बैठ जाएंगे या सत्ता के शीर्ष पर पहुंच जाएंगे.
साथ ही वो ये भी कहते हैं कि अगर गडकरी जैसे नेता को संन्यास के लिए मजबूर कर दिया जाता है तो ये संघ की नाकामयाबी भी होगी. संघ को कायदे से नागपुर के दोनों ही नेताओं के साथ खड़ा होना चाहिए. जब पूरा देश गडकरी के काम को पहचान रहा है तो संघ को ऐसे नेता के पीछे खड़े होने में क्या गुरेज़ है.
''अपने आंगन में पले-बढ़े व्यक्ति को अगर संघ नहीं बचा सकता या उसके समर्थन में खड़ा नहीं रह सकता तो इससे बड़ी नाकामयाबी उसके लिए क्या होगी.''
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