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कांवड़ यात्रा देख जब भगवान से निजी रिश्ता याद आया
- Author, नताशा बधवार
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले सप्ताह मैं दिल्ली एयरपोर्ट जा रही थी. सुबह का वक्त था और दिल्ली के रिंग रोड पर मुझे कांवड़ियों के अलग अलग समूह दिखे जो हरिद्वार से अपने अपने घरों की ओर लौट रहे थे.
ट्रकों, कार और टेंपों में भरे युवा तेज़ संगीत पर डांस करते हुए सड़कों पर बढ़ रहे थे. उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि वे किसी तीर्थयात्रा के बदले डिस्को पार्टी में हिस्सा ले रहे हैं.
अधिकांश लोगों की छाती खुली हुई थीं और उनमें से कुछ वाहनों के बीच दौड़ भी लगा रहे थे. कुछ जगहों पर सड़क वनवे थी जहां गाड़ियां रेंगती हुई दिखीं.
अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा उत्तर भारत में बिताने के चलते मुझे मालूम है कि हर साल इस वक्त कांवड़ यात्रा होती है. सालों तक मैंने शिव भक्तों को मुश्किलों के साथ कांवड़ यात्रा देखा है, जिसमें वे नंगे पांव या पतली चप्पलों में गढ़वाल के पहाड़ों तक यात्रा करके अपने घर और शहर के मंदिरों में चढ़ाने के लिए पवित्र गंगाजल लाते हैं.
कांवड़ यात्रा की मुश्किलों के सामने उनके दृढ़ संकल्प और भक्ति भाव के लिए मेरे मन में सम्मान है. पैरों में छाले पड़ने और शरीर के हिस्सों में दर्द के बावजूद उनके चेहरों पर खुशी और यात्रा के दौरान सहयोग करने वाले लोगों से आपसी भाईचारे का भाव दिखता है. सेवाभाव भी नज़र आता है. रास्ते में पड़ने वाले लोग कांवड़ियों के लिए आराम करने की जगह और भोजन की व्यवस्था भी करते हैं.
ईश्वर से रिश्ते की यादें
हालांकि, इस साल के कांवड़ यात्रियों के साथ मुझे कांवड़- तीर्थयात्रियों के कंधों पर बाँस से बने कांवड़ और उसके दोनों तरफ गंगाजल से भरे बर्तन नहीं दिखे.
दिल्ली की एक सड़क पर कांवड़ यात्रा को देखते हुए, मैंने खुद को थोड़ा उदास महसूस किया. मानो कि कुछ था और वो खो गया. इस यात्रा में कोई महिला भी नहीं दिखी और कोई बुजुर्ग भी नहीं दिखे. मैं यह भी सोच रही थी कि भगवान के नाम पर कानफोड़ू संगीत और सड़क को घेर कर नृत्य करने का क्या ही मतलब है?
इस यात्रा के दौरान परमेश्वर के साथ मेरे अपने रिश्तों की यादें उभर आयीं.
मैं ईश्वर से अब उतनी बातें नहीं कर पातीं जितनी कभी होती थीं. एक दौर था जब मैं अपने ईश्वर और उनके साथ अपने संबंध में बहुत बातें करती थीं.
ईश्वर जिनमें किसी भी चुनौती को पूरा करने की बुद्धि और शक्ति दोनों है. वही ईश्वर मेरे गुप्त सहयोगी थे. उन्होंने मुझे बनते संवरते देखा है और मुश्किलों में मेरा हाथ थाम कर सहारा भी दिया है. बेशक मैं तब छोटी उम्र की थी, ज़्यादा असुरक्षा का बोध था लेकिन बहुत भरोसा भी करती थी.
ईश्वर से मुलाकात की कहानी भी बताती हूं. यही कोई साढ़े 12 साल की उम्र रही होगी, जब एक एक्सीडेंट के बाद मैं काफ़ी तकलीफ़ में थी. एक सुबह कई चोटों के साथ मुझे अस्पताल के अपातकालीन वार्ड में लाया गया था. मैं अगले तीन हफ्ते तक उस अस्पताल में भर्ती रही. चोटों की तीन बार सर्जरी हुई और खुले जख्मों की कई बार मरहम पट्टी हुई.
मां और पिता को याद करके मैं रोने लगती. जब तकलीफ़ बढ़ती तो मैं अपने भाई और दादा जी से मदद की गुहार लगाती. तकलीफ़ के उन पलों में चाचा-चाची का नाम भी लेती थी. मेरी मां हर पल वहां मौजूद थीं. मेरी तकलीफ़ से उन्हें भी तकलीफ़ होती थी. वह सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब के अध्याय जपजी साहिब की गुरु वाणी को बार बार दोहराया करती थीं.
एक दिन जब मेरी तकलीफ़ और दर्द दोनों काफ़ी बढ़ गए तो मेरी मां ने मेरे हाथ में हनुमान चालीसा थमाते हुए कहा, "इसके छंदों को ज़ोर से बार-बार पढ़ो. हम जो भी भी कर सकते थे, वह सब कर चुके हैं."
मायूसी और लाचारी में मैं हनुमान चालीसा पढ़ने लगी. मुझे याद है कि शुरुआती छंदों को धीरे-धीरे और रुक-रुक कर पढ़ा था.
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहुँ लोक उजागर
रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥१॥
जब तक मैं चालीसा के बीच में पहुँची, देवनागरी लिपि में शब्दों को पढ़ने पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिशों ने दर्द से मेरा ध्यान हटा दिया.
जब मैंने हनुमान चालीसा पूरी पढ़ ली तो मैं उसे फिर से पढ़ने के लिए तैयार थी. अगले कुछ सप्ताह और महीनों में, जब भी दर्द बढ़ता तो हनुमान चालीसा ही मेरा बचाव करती. ऐसा लगा कि इसको पढ़ना मॉर्फिन की हल्की खुराक की तरह असर करने वाला था.
तर्क आधारित सोच क्या कहती है?
उस उम्र तक मैंने दो प्रार्थनाएँ ही सीखी थीं. एक तो पांच साल की उम्र में दादाजी से गायत्री मंत्र और दूसरी प्राइमरी स्कूल में संगीत की कक्षाओं में ईसाई प्रार्थना.
जन्म से तर्क आधारित सोच के चलते मैं उन विचारों को अस्वीकार कर देती थी जो मुझे तार्किक नहीं लगते थे. नियमित रूप से प्रार्थना करने का विचार मुझे कभी नहीं भाया क्योंकि मुझे लगता था कि पहले से ही बहुत भक्तों के लिए काम कर रहे ईश्वर से यह फेवर मांगने जैसा है.
उन दिनों अस्पताल में, मुझे पता चला कि सबसे अच्छे डॉक्टरों और सबसे ज़्यादा प्यार करने वाले माता-पिता के सबकुछ कर लेने के बाद भी, ऐसे कई तरीक़े हैं जिनसे मैं खुद अपने उपचार को बेहतर कर सकती हूं.
मैंने उस शक्ति की खोज कर ली थी जिसे एक तरह से मैं विश्वास मानती थी. अपने से कहीं शक्तिशाली के प्रति विश्वास. उस शक्ति में विश्वास जो मेरे अंदर ही समाहित है और मैं अपनी कल्पना से उसे बुला सकती हूं. ऐसा विश्वास मेरे अंदर था.
जैसे-जैसे अगले कुछ सालों में मैं अपनी शारीरिक और भावनात्मक तकलीफ़ों से उबरी, मैंने भगवान के अपने निजी स्वरूप के साथ मज़बूत रिश्ता बना लिया. मैं उन्हें लिखने लगी. उनसे बात करने लगी और तो और उनको सुनने भी लगी. एक मायने में इसने मुझे अपनी आंतरिक आवाज़ को सुनने और उससे संवाद करने के लिए प्रशिक्षित किया.
तकलीफ़ से उबरने के लिए अपने अहंकार और स्वनियंत्रण की झूठी भावना से मुक्त होने की आवश्यकता होती है. सच्चा उपचार हमें प्रकृति और स्वयं के आंतरिक मन से जोड़ता है. यह हमें अपनी चाहत, जगह और उद्देश्य खोजने में मदद करता है. यह हमें दूसरों को चोट पहुंचाने के बदले उनकी मदद करने के लिए प्रेरित करता है.
अच्छे भविष्य की उम्मीद कायम है
संगठित धर्म और उसमें आपके शामिल होने की मांग तभी होती है जब आप लिंग और जाति आधारित भूमिकाओं को स्वीकार करते हैं और पुरोहितों के बताए सारे कर्मकांड करते हैं, यह पूरी मानवता के लिए हितकर नहीं है.
विचारों और लोगों की विविधता और उनमें मेल मिलाप को नकारना, अपने अध्यात्मिक स्व तक पहुंचने का तरीक़ा नहीं हो सकता. मैं सर्वस्व और सर्वोच्च का भाव और लोगों को बहिष्कृत करने वाले धर्म के प्रारूप को नहीं मानती.
मुझे पता है कि समय बदल रहा है लेकिन इन सब कुछ के बावजूद, मेरी उम्मीद कायम है. कह सकते हैं अच्छे भविष्य की उम्मीद ही मेरा कंफर्ट ज़ोन है. मेरा खुद पर और अपने जैसे अन्य लोगों पर भरोसा है. हम अपने ईश्वर और धर्म की इस भावना पर किसी को काबिज नहीं होने देंगे. हमारा विश्वास मज़बूत है और यह एक बार फिर से शांति और सद्भाव को स्थापित करेगा.
(नताशा बधवार 'माय डॉटर्स मॉम' और 'इमॉर्टल फ़ॉर ए मूमेंट' की लेखिका हैं. वह फ़िल्म मेकर, टीचर और तीन बेटियों की माँ हैं.)
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