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उत्तराखंड: स्कूल में बच्चियों के चिल्लाने और बदहवासी के वायरल वीडियो का क्या है मामला
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, देहरादून से
उत्तराखंड के सोशल मीडिया और मेन-स्ट्रीम मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है.
बागेश्वर ज़िले के एक सरकारी स्कूल के इस वीडियो में कुछ स्कूली बच्चियां बदहवास होकर चिल्लाती, परेशान होती नज़र आ रही हैं.
स्थानीय लोग इसे भूत-प्रेत का प्रकोप मान रहे हैं तो प्रशासन बच्चियों की काउंसिलिंग, इलाज की कोशिश कर रहा है.
स्थानीय मीडिया इसे 'मास-हिस्टीरिया' कह रहा है तो मनोवैज्ञानिक इसके पीछे किसी ट्रॉमा की आशंका जताते हुए कहते हैं कि एक-दूसरे को देखकर ऐसा करना अजीब नहीं है.
भूत-प्रेत, मनोविज्ञान, सामाजिक ढांचे और ट्रॉमा की इस कहानी के केंद्र में एक आठवीं में पढ़ने वाली बच्ची है, जिसे संभवतः कोई सदमा लगा है और जो इतनी स्मार्ट भी है कि वह इंस्टाग्राम पर सक्रिय है.
अचानक चिल्लाने लगीं छात्राएं
बागेश्वर ज़िला मुख्यालय से क़रीब 35-36 दूर राजकीय कन्या जूनियर हाईस्कूल रैखोली में कुल 55 छात्र-छात्राएं हैं.
26 तारीख़ को अचानक कुछ लड़कियां चिल्लाने और बदहवास होने लगीं. छठी से आठवीं तक के इस स्कूल में वैसे तो तीन शिक्षक हैं लेकिन उस दिन एक ही मौजूद थीं.
बच्चियों के चिल्लाने की आवाज़ सुनकर गांव के लोग भी स्कूल में पहुंच गए. उनमें से कोई बच्चों के सिर के ऊपर से चावल घुमाने लगे (स्थानीय स्तर पर भूत-प्रेत को तात्कालिक रूप से शांत करने की कोशिश), कुछ बच्चों को संभालने लगे.
एक ग्रामीण ने इस घटना का वीडियो बना लिया, जो वायरल हो गया. स्कूल में अगले दिन भी यही सब हुआ.
उधर, ज़िला मुख्यालय में शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग हरकत में आए और 28 जुलाई को बागेश्वर के मुख्य शिक्षा अधिकारी गजेंद्र सौन, अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी हरीश पोखरिया, एसडीएम हर गिरी और काउंसिलर (मनोवैज्ञानिक सलाहकार) संदीप कुमार स्कूल में पहुंचे.
यहां बच्चों और अभिभावकों की काउंसिलिंग की गई और नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र बोहाला के चिकित्साधिकारी को अगले चार-पांच दिन निगरानी करने के निर्देश दिए गए.
बच्चों में था डर और...
अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने डॉक्टर हरीश पोखरिया ने बीबीसी हिंदी को बताया कि जब वे लोग स्कूल में पहुंचे तो ऐसा लगा कि बच्चे कुछ डरे हुए हैं. ऐसा इसलिए हो सकता है कि दो दिन से यह सब चल रहा था और बहुत सारे लोग वहां पहुंच रहे थे.
डॉक्टर पोखरिया ने कहा कि टीम ने बच्चों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया. उनके साथ हंसी-मज़ाक़ किया, खाना खाया और विटामिन सी की गोलियां दीं ताकि उनका मूड ठीक हो सके.
वह कहते हैं कि बाक़ी बच्चे तो ठीक रहे लेकिन आठवीं क्लास की एक बच्ची का बर्ताव कुछ अलग दिखा. तब भी उसे हिस्टीरिया के दौरे जैसे पड़ रहे थे.
टीम ने उसके परिजनों से कहा कि अगर उसे आगे भी दिक़्क़त हो तो उसे हॉस्पिटल में एडमिट कर उसका ट्रीटमेंट शुरू कर सकते हैं हालांकि परिजन इसके लिए माने नहीं.
डॉक्टर पोखरिया कहते हैं कि ऐसा लगा कि यह बच्ची अपने साथियों के बीच प्रभावशाली है. वह इस बच्ची को कैटेलिस्ट (वह व्यक्ति, घटना या पदार्थ जिसकी वजह से परिवर्तन आए) कहते हैं.
'ट्रीटमेंट शुरू किया जाएगा'
डॉक्टर पोखरिया कहते हैं कि जिसे मास-हिस्टीरिया कहा जा रहा है उसकी शुरुआत भी इसी बच्ची से हुई. उसे देखकर अन्य बच्चे भी (कुल 6 लड़कियां, 2 लड़के) भी वैसी ही हरकत करने लगे.
डॉक्टर पोखरिया को गांव में लोगों से बातचीत के दौरान पता चला कि इस बच्ची का इंस्टाग्राम पर अकाउंट है. प्रशासन की टीम ने उस बच्ची की मां को बुलाकर उनसे बात की और अपनी बेटी पर नज़र रखने को कहा.
इसके बाद उस लड़की के साथ ही दो और अन्य छात्राओं को दो दिन की छुट्टी दे दी गई ताकि वह आराम कर सकें और स्कूल में भी शांति रहे.
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने इस 'कैटेलिस्ट' पर नज़र बनाकर रखने का फ़ैसला किया है. डॉक्टर पोखरिया कहते हैं कि अगर अगले दो दिन में बच्ची की हालत सामान्य नहीं होती तो उसे बागेश्वर में हॉस्पिटल में भर्ती कर ट्रीटमेंट शुरू किया जाएगा.
वह बताते हैं कि बागेश्वर हॉस्पिटल में एम्स के मनोचिकित्सा विभाग की टेली-मेडिसिन सुविधा उपलब्ध है. बच्ची को ऑब्ज़र्वेशन में रखकर उसका एम्स, ऋषिकेश, के डॉक्टरों के मार्ग-निर्देशन में इलाज किया जाएगा.
ट्रॉमा
बागेश्वर के ज़िला पंचायत सदस्य चंदन रावत रैखोली गांव के ही निवासी हैं और स्कूल के नज़दीक ही रहते हैं. रावत फ़ार्मासिस्ट भी हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि जिस बच्ची के कारण यह सब हो रहा है उसकी तबियत गुरुवार को घर में भी ख़राब हो गई थी और वह वैसी ही हरकतें कर रही थी जैसी स्कूल में. उन्होंने जाकर उसकी मदद की.
अब गांववाले अब एक छोटी सी पूजा करवाने की सोच रहे हैं ताकि यह सब शांत हो सके.
रावत बताते हैं कि दो-तीन महीने पहले गांव की एक बुजुर्ग महिला ने स्कूल से करीब 500 मीटर नीचे फांसी लगा ली थी. वह उस बच्ची की रिश्तेदार थी और जहां उसने आत्महत्या की वह जगह बच्ची के घर के पास ही थी.
रावत कहते हैं कि उस बच्ची ने पेड़ पर लटकी महिला की लाश को देख लिया था और संभवतः उसे इसी का सदमा लगा है. वह कहते हैं कि उसने अपनी सहेलियों को यह सब बताया होगा और शायद उस समय भी यही सब सोच रही होगी जब अचानक हाइपर हो गई.
उसे देखकर बाक़ी बच्चियां भी बदहवास हो गईं और एक मास-हिस्टीरिया जैसा माहौल बन गया.
उबासी को देखकर उबासी
लेकिन किसी घटना, सदमे के इतने समय बाद अचानक ऐसे बर्ताव की वजह क्या हो सकती है?
उत्तराखंड के राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण के सदस्य मनोचिकित्सक डॉक्टर पवन शर्मा इसे सामान्य बात कहते हैं.
वह कहते हैं कि पहाड़ों में ऐसी घटनाएं होती हैं कि किसी व्यक्ति को तेंदुआ, भालू, बाघ मिल जाता है तो वह उससे भिड़ जाता है और बाद में आकर जब गांव में इस घटना के बारे में बताते हैं तो तब बेहोश हो जाते हैं.
उनके अनुसार ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस समय वह जानवर से भिड़ रहे होते हैं तब वह घटना में इन्वॉल्व होते हैं. जब वह आकर इसके बारे में किसी को बताते हैं तब उन्हें यह अहसास होता है कि वह एक भयानक स्थिति से गुज़रे हैं, तब उनका दिमाग़ यह बताता है कि वह डर गए हैं और वह बेहोश हो जाते हैं.
तो मास हिस्टीरिया की वजह क्या होगी?
डॉक्टर शर्मा कहते हैं कि किसी एक को देखकर दूसरे का वैसा ही रिएक्शन देना भी अजीब नहीं है, हमारा दिमाग यह करता है. जैसे कि जम्हाई.
वह कहते हैं कि आज तक यह पता नहीं चल सका है कि एक जम्हाई दूसरे तक कैसे पहुंच जाती है? अगर एक आदमी जम्हाई लेगा तो दूसरा भी वही करेगा, चौथा भी और...
दरअसल दूसरों से प्रभावित होकर हमारा दिमाग सब-कॉन्शियसली ऐसी तरंगे छोड़ता है और शरीर ऐसा करना शुरू कर देता है.
जैसे, किसी शोक के माहौल में अगर एक व्यक्ति रोना शुरू करता है तो यह भी चेन रिएक्शन की तरह होता है और बाकी भी रोने लगते हैं.
पहली बार नहीं हुआ ऐसा
बागेश्वर के मुख्य शिक्षा अधिकारी गजेंद्र सौन कहते हैं कि गुरुवार को दो-तीन छात्राओं के स्कूल से जाने के बाद सब शांति से गुज़रा और शुक्रवार को भी सब सामान्य रहा है.
वह कहते हैं कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. पहले भी चमोली, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ समेत कई जगह ऐसी घटनाएं सामने आई हैं. यह सब तीन-चार दिन से ज़्यादा नहीं चलता. फिर सब सामान्य हो जाता है.
सौन कहते हैं अब तो सुविधाएं भी हैं और पहुंचना आसान भी. रैखोली में शिक्षा विभाग, चिकित्सा विभाग और प्रशासन सभी पहुंच गए. बच्चों की जांच भी करवाई गई और काउंसिलिंग भी.
वह आशा जताते हैं कि सोमवार से जब सभी बच्चे स्कूल आने लगेंगे तो भी सब ठीक रहेगा, अब ऐसा कुछ नहीं होगा.
हालांकि डॉक्टर शर्मा कहते हैं कि जो बच्चे ऐसा सदमा झेल चुके हों या ऐसी परिस्थितियों से गुज़र चुके हों वह एक ट्रॉमा की तरह उनके पूरे जीवन पर असर करेगा.
बता दें कि एक रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर, 2021 में उत्तराखंड के 13 में से सिर्फ़ दो ज़िलों में मनोचिकित्सक की तैनाती थी और 11 ज़िलों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं थे. यह स्थिति बदली हो इसके आसार नहीं हैं.
बागेश्वर के दूरदराज़ के गांव में मानसिक सदम से गुज़र रही बच्ची को तो शायद इलाज मिल भी जाए लेकिन ऐसे ज़्यादातर बच्चे भगवान भरोसे ही हैं.
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