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पसमांदा मुसलमानों को रिझाने में बीजेपी सरकार की मुश्किलें
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हैदराबाद में इसी महीने की शुरूआत में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई जिसमें पीएम मोदी की पहल पर बीजेपी ने स्नेह यात्रा निकालने का फ़ैसला लिया था.
बताया जा रहा है कि इस यात्रा के ज़रिए बीजेपी अल्पसंख्यक समुदाय के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को पार्टी के साथ जोड़ने की कोशिश करेगी.
इस पहल में बीजेपी की विशेष नज़र पसमांदा मुसलमानों पर रहेगी, जो मुसलमान समुदाय में पिछड़े माने जाते हैं.
कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ ख़ुद पीएम मोदी ने कार्यकारिणी की बैठक में पसमांदा मुसलमानों का ज़िक्र किया. बैठक में रामपुर और आज़मगढ़ के चुनावी नतीजों का भी ज़िक्र किया गया जिसमें कहा गया कि बीजेपी के लिए जीत का रास्ता पसमांदा मुसलमानों ने साफ़ किया था.
इस वजह से भी बीजेपी की नज़र अब पसमांदा मुसलमानों पर है. रिपोर्ट में रामपुर और आज़मगढ़ लोकसभा चुनाव का ज़िक्र भी करेंगे, लेकिन पहले बात करते हैं पसमांदा मुसलमानों की.
देश भर के पसमांदा मुसलमानों का एक संगठन हैं ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज. बीजेपी की स्नेह यात्रा की ख़बर सुनते ही उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखी है और मांग की है कि पसमांदा मुसलमानों में क़रीब दर्जन भर जातियों को अनुसूचित जाति का दर्ज़ा दिया जाए, जो फिलहाल ओबीसी में आते हैं.
उनकी ये मांग नई नहीं है. लेकिन बीजेपी के पसमांदा मुसलमानों के बीच पैठ बनाने की ख़बरों के बीच उन्होंने एक बार फिर इस मांग को नए सिरे से उठाया है.
उनका दावा है कि अगर सरकार वाकई में पसमांदा मुसलमानों का भला करना चाहती है तो उनकी पुरानी मांग को माना जाए.
जानकारों की मानें तो बिना इस मांग को स्वीकार किए, पसमांदा मुसलमानों का बीजेपी के साथ जाना थोड़ा मुश्किल है. यही मांग बीजेपी और पसमांदा मुसलमानों के बीच दरार बन कर खड़ी है.
कौन हैं पसमांदा मुसलमान?
पसमांदा शब्द उर्दू-फारसी का है, जिसका अर्थ होता है पीछे छूटे या नीचे धकेल दिए गए लोग.
इस वजह से ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज संगठन का मानना है कि 'पसमांदा' हर धर्म में हैं और उसी तरह से मुसलमानों में भी हैं.
भारत में जातिगत जनगणना सालों से नहीं हुई है. एक अनुमान के मुताबिक़ भारत की कुल आबादी में 15 फ़ीसदी मुसलमान हैं, जिनमें से तक़रीबन 80 फ़ीसदी पसमांदा मुसलमान हैं. नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ लगभग 45 फ़ीसदी मुसलमानों को ओबीसी का लाभ मिलता है.
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के अध्यक्ष और पूर्व सांसद अली अनवर कहते हैं, "पसमांदा अब पेशमांदा (आगे रहने वाला) होना चाहता है. पसमांदा मुसलमान भारत के मूल निवासी हैं. हम अकलियत के लोग नहीं बल्कि अकसरियत (बहुजन) में शामिल हैं."
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर हैं तनवीर फ़ज़लबीबीसी से कहते हैं, "पसमांदा मुसलमान एक राजनीतिक नाम है. कोई आधिकारिक रूप से स्वीकार्य शब्द नहीं है. ज़्यादातर पसमांदा ओबीसी के अंतर्गत ही आते हैं. लेकिन ओबीसी में आने वाली कुछ जातियों की मांग है कि उन्हें एससी का दर्जा मिले क्योंकि उनका पेशा वही है जो हिंदू दलितों का है."
बीबीसी से बातचीत में अली अनवर कहते हैं, "पसमांदा मुसलमानों के अंदर क़रीब एक दर्जन जातियां ऐसी हैं जिन्हें अनुसूचित जाति का दर्ज़ा नहीं मिल रहा है. और ये सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के बावजूद है."
वो प्रधानमंत्री मोदी से सवाल करते हैं कि क्या सरकार ऐसी दर्जन भर जातियों को एससी का दर्जा देने को तैयार है? अगर नहीं तो ऐसी स्नेह यात्राओं से पसमांदा मुसलमानों का कोई भला नहीं होने वाला, ये केवल प्रतीकात्मक ही होगा.
पसमांदा मुसलमानों की एससी की लड़ाई
दरअसल मुसलमानों की कुछ जातियों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलता है. पूरे भारत में कहीं-कहीं मुसलमानों की कुछेक जातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला हुआ है.
लेकिन कुछ जातियां, अनुसूचित जाति (एससी) में शामिल होने की मांग सालों से कर रही है. सारा पेंच इसी का है.
बीबीसी से बातचीत में तनवीर फ़ज़ल कहते हैं, "ओबीसी में वो जातियां भले ही शामिल हों, लेकिन एससी में शामिल होने से उन्हें दूसरे राजनीतिक लाभ भी मिलेंगे जैसे विधायक और सांसद चुनाव में एससी सीटों के आरक्षण का लाभ होती हैं. एससी में आने के बाद ओबीसी में आने वाली एडवांस जातियों से उनको कोई राजनीतिक लाभ लेने मुक़ाबला नहीं करना होता है."
अली अनवर कहते हैं, "आए दिन भारत में जगह-जगह बुलडोजर चल रहे हैं, लिंचिंग हो रही है - इसमें जो लोग शिकार हो रहे हैं उसमें ज़्यादातर पसमांदा मुसलमान हैं. अगर एससी का दर्जा मिल जाएगा, तो उनपर अत्याचार करने वालों पर एससी-एसटी एक्ट की धाराएं भी लग जाएंगी. कुछ तो ख़ौफ होगा."
हालांकि पसमांदा मुसलमानों की कुछ जातियों को एससी में शामिल करने की मांग पर सरकार की तरफ़ से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है. सच तो ये है कि सत्ता में आने से पहले भी बीजेपी ने पहले कभी पसमांदा मुसलमानों की इस मांग का समर्थन नहीं किया है.
तनवीर फ़ज़ल कहते हैं, "संविधान के अनुच्छेद 341 के ज़रिए, अनुसूचित जाति को आरक्षण मिलता है लेकिन उसमें राष्ट्रपति का एक आदेश जुड़ा हुआ है. इसके तहत, हिंदुओं में अछूत माने जाने वाली जातियों को ही इसका लाभ मिलेगा. बाद में इसमें दो बदलाव लाए गए, जिसके तहत मज़हबी सिख और बौद्ध धर्म के मानने वाले लोगों को इसमें शामिल किया गया. लेकिन अभी तक इस्लाम और ईसाई धर्म मानने वाली जातियों को इसमें शामिल नहीं किया गया है."
"सरकार आगे भी ये मांग मानेगी, ऐसा नहीं लगता. इसके पीछे एक ही वजह है. बीजेपी को डर इस बात का है कि ईसाई और इस्लाम धर्म मानने वालों में कुछ जातियों को एससी स्टेटस दे दिया गया तो धर्म-परिवर्तन की दर और बढ़ जाएगी. इस वजह से मेरा मानना है कि बीजेपी की राष्ट्रीय रणनीति में ये मांग फिट नहीं बैठती."
बीजेपी को पसमांदा मुसलमानों की याद क्यों आई?
दरअसल जब बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में दूसरी बार सत्ता हासिल की तो दानिश अंसारी को जगह दी गई. दानिश अंसारी भी पसमांदा मुसलमान हैं. वहीं से इस बात की चर्चा शुरू हुई कि बीजेपी अब पसमांदा मुसलमानों को रिझाने में जुटी है.
फिर मोदी कैबिनेट के बड़े मुस्लिम चेहरे मंत्रिमंडल से ग़ायब हो गए, उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया. उससे ये बात और पुख्ता हो गई.
बीजेपी आठ साल से सत्ता में है और इतने दिन बाद उन्हें पसमांदा मुसलमानों की याद क्यों आई, इस पर प्रोफ़ेसर तनवीर फ़ज़ल कहते हैं, "बीजेपी को पहली बार उनकी याद नहीं आई. इससे पहले भी इनका ज़िक्र भी किया था. दरअसल यूपी-बिहार के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से बीजेपी ने सामाजिक न्याय का सोशल एक्सपेरिमेंट किया और कुछ हद तक क़ामयाब दिखे. ख़ास तौर पर ग़ैर-यादव ओबीसी और ग़ैर जाटव दलितों के बीच उन्होंने एक पैंठ बनाई भी. उसी के तहत एक कोशिश पसमांदा मुसलमानों में भी वो करते दिखना चाहते हैं.
तनवीर फ़ज़ल ये भी बताते हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश में पसमांदा मुसलमानों का आंदोलन 21वीं सदी की शुरुआत में तेज़ हुआ था. अली अनवर और एज़ाज अली उसके नेता हुए.
एक वक़्त में नीतीश कुमार ने उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश की. नीतीश कुमार को लगा कि पसमांदा मुसलमान आरजेडी के साथ हैं, उनको अपनी तरफ़ लाना चाहिए. दोनों नेताओं को उन्होंने राज्यसभा भी भेजा.
हालांकि अली अनवर इसमें बीजेपी की दूसरी रणनीति देखते हैं.
वो कहते हैं, "दो जाति धर्म के लोगों को आपस में लड़ाने की बीजेपी की पुरानी रणनीति रही है. यही काम वो मुसलमानों को मुसलमानों से लड़ाकर करना चाहते हैं. पसमांदा मुसलमानों को बाकी के बिरादी से कुछ दिक़्क़तें ज़रुर हैं, लेकिन वो हम आपस में सुलझा लेंगे. पर मोदी सरकार के इस बहकावे में नहीं आएंगे."
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि बीजेपी आजमगढ़ और रामपुर में लोकसभा के उपचुनाव में जीत हासिल की उसके पीछे भी पसमांदा मुसलमानों का हाथ माना जा रहा है.
लेकिन 'सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज' (सीएसडीएस) के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार इस विश्लेषण से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.
उनका कहना है कि आजमगढ़ में बीजेपी की जीत का फ़ासला लगभग 8 हजार वोटों का था. वहाँ बीएसपी उम्मीदवार काफ़ी मज़बूत था और मुक़ाबला त्रिकोणीय हुआ, जिसका फायदा बीजेपी को मिला. रामपुर में भी जीत का मार्जिन बीजेपी के लिए बहुत बड़ा नहीं है.
संजय कुमार कहते हैं, "विधानसभा में और लोकसभा में लोग अलग-अलग सोच के साथ वोट करते हैं. विधानसभा में मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी को वोट किया क्योंकि वो चुनाव राज्य में सरकार बनाने का था. लोकसभा का उपचुनाव सरकार बनाने का चुनाव नहीं था."
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