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अदालतें ग़लत आदेश जारी कर सकती हैं: मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस के चंद्रू
सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 24 जून के अपने फ़ैसले में 2002 गुजरात दंगे की जांच के लिए बनी एसआईटी या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम की रिपोर्ट पर मुहर लगा दी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 60 से ज़्यादा लोगों को क्लीन चिट दे दी है.
अदालत ने यह आदेश दंगे में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफ़री की पत्नी ज़किया जाफ़री की याचिका को ख़ारिज करते हुए दिया है. मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस के. चंद्रू ने बीबीसी संवाददाता विनीत खरे के सवालों के ईमेल से जवाब दिए हैं.
फ़ैसला पढ़ते हुए इसकी भाषा, एसआईटी रिपोर्ट के समूचे दायरे और इससे जुड़ी बाक़ी चीज़ों को लेकर आपकी पहली राय क्या थी?
अदालतें ग़लत आदेश जारी कर सकती हैं और उनकी आलोचना करना हर किसी का अधिकार है. ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाएं ग़लती नहीं कर सकतीं. मामला सिर्फ़ इतना है कि इसके आदेशों के साथ आख़िरी फ़ैसला, जैसा एक पहलू जुड़ा होता है, लिहाज़ा लोगों को संतोष करना पड़ता है. इनसे संतुष्ट होना पड़ता है.
साफ़-सुथरे रिकॉर्ड और तटस्थ छवि वाले जजों की अध्यक्षता में गठित कई स्वतंत्र ट्रिब्यूनलों ने यह पाया है कि गुजरात में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हुए हमले पूर्वनियोजित थे और उन्हें बिना किसी डर के अंजाम दिया गया.
पहली बात दिमाग़ में यह आती है कि अदालत ने न तो कभी व्यापक लॉबिंग के बाद शुरू किए गए आपराधिक मामलों या विभिन्न स्तरों पर शुरू की गई जांचों की कभी निगरानी नहीं की. सिर्फ़ एक बड़े पुलिस अफ़सर (जिन्हें बाद में एक विदेशी नियुक्ति से पुरस्कृत किया गया) के नेतृत्व में एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) गठित कर देने भर से इतने बड़ा मामला ख़त्म नहीं हो सकता.
इसका एक हालिया उदाहरण सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसी अधिकारी की अध्यक्षता में दी गई एक एसआईटी रिपोर्ट को ख़ारिज करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर स्टेट क्राइम ब्रांच को अपनी जांच जारी रखने का आदेश देने के रूप में दिखा.
अगर केंद्र और राज्य, दोनों ही स्तरों पर कोई प्रतिबद्ध सरकार होती तो नतीजे बिल्कुल उलट आ सकते थे. ऐसे मामलों में जो अकेली बात मायने रखती है, वह है न्यायपालिका का नज़रिया.
गुजरात दंगों में इंसाफ़ के लिए लड़ने वालों को कठघरे में खड़ा करने को आप कैसे देखते हैं?
इस तरह के 'बदले की भाव वाला न्याय' भविष्य में सच के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले ग़ैर-सरकारी संगठनों और व्यक्तियों को असहाय बनाएगा.
अदालत को इस फ़ैसले से प्रभावित होने वाले पक्षों पर किसी कार्रवाई की अनुशंसा करने से पहले उन्हें इस आशय का एक नोटिस तो देना ही चाहिए था. बड़े संदर्भ में देखें तो ऐसा आकलन लोगों में भय और अविश्वास पैदा करेगा और इससे संस्था की प्रतिष्ठा कमज़ोर होगी.
कई न्यायाधीशों ने इस रवैये की तीखी आलोचना की है. लेकिन पुलिस ने जिस तेज़ी से इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की और रातोंरात इन लोगों को गिरफ़्तार कर लिया, उससे ऐसे मामलों में और ज़्यादा संदेह पैदा होता है और किसी बड़ी योजना का अंदेशा बनता है. कम से कम अदालत को इन व्यक्तियों का ट्रैक रिकॉर्ड देखना चाहिए था और मामले को लेकर एक बड़ा नज़रिया अपनाना चाहिए था.
भारत में कोई व्यक्ति अधिकारियों और सरकार को दंड दिलवा सके, ऐसी धारणा ही लेकर हम नहीं चलते. सारी जांचें यहां वर्दीधारी फ़ोर्स पर निर्भर करती हैं, भले ही अपराधों का आरोप उसके ही एक हिस्से पर क्यों न हो.
सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसला लिखने वाले का नाम ज़ाहिर करने की परंपरा रही है. इस मामले में इसको छोड़ क्यों दिया गया?
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. राम जन्मभूमि मामले में भी फ़ैसला सर्वसम्मति से लिया गया था, लेकिन इसके लेखक का नाम नहीं ज़ाहिर किया गया था. शायद बेंच का कोई भी सदस्य फ़ैसले का लेखक होने का दावा करके ख़ुद को अलग-थलग नहीं पड़ने देना चाहता. बाद में जनता की राय, आलोचना या हमले उसे अकेले ही न झेलना पड़े, यह चिंता भी इसके पीछे होती है.
पूर्व पुलिस अधिकारी राहुल शर्मा द्वारा जुटाए गए कॉल डेटा रिकॉर्ड को गुलबर्ग सोसाइटी और नरोदा पाटिया के जनसंहारों में सरकार की मिलीभगत का प्रमाण क्यों नहीं माना गया?
इलेक्ट्रॉनिक डेटा को सबूत के रूप में प्रस्तुत करने में कुछेक प्रक्रिया संबंधी ज़रूरतें पूरी करनी होती हैं. जिन मुक़दमों में सरकार चला रहे लोगों का जुड़ाव किसी आपराधिक कृत्य के साथ होता है, उनमें अदालत के सामने समूचे साक्ष्य को ही प्रस्तुत करना और उसे आश्वस्त करना कठिन होता है. इस तरह के षड्यंत्रों को पहले से मानकर तो हरगिज़ नहीं चला जा सकता. उचित आरोप इस अंतिम रिपोर्ट में ही दर्ज होने चाहिए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने षड्यंत्र वाली बात को इस आधार पर कैसे नकार दिया कि नामित अधिकारियों में मानसिक सहयोजन जैसा कुछ नहीं था, जबकि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुलबर्ग सोसाइटी और नरोदा पाटिया के जनसंहारों के दिन हिंसा पर नज़र रखने के लिए कई सारी बैठकें की थीं?
अगर सुप्रीम कोर्ट सच्चाई को उजागर करना चाहता तो उसको इस पहलू की अतिरिक्त जांच-पड़ताल का आदेश देना चाहिए था. उसको पहले से इकट्ठा किए गए रिकॉर्ड्स के भरोसे नहीं बैठना चाहिए था.
गोधरा में मारे गए लोगों के शवों को विश्व हिंदू परिषद के नेताओं को सौंपने की बात, सुप्रीम कोर्ट की राय में कथित षड्यंत्र के साक्ष्य वाली भूमिका क्यों नहीं निभा पाया?
सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में जो कहना था, वह पहले ही कह चुका है. ऐसी घटनाओं के आधार पर कुछ छूटी-फटकी चीज़ों के लिए अदालत के निष्कर्ष पर सवाल उठाने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है.
सुप्रीम कोर्ट को बेस्ट बेकरी और बिल्क़ीस बानो के मुक़दमे सुनवाई के लिए राज्य के बाहर स्थानांतरित करनी पड़ा था. उनका कोई प्रभाव सर्वोच्च स्तर पर षड्यंत्र वाले आरोप पर क्यों नहीं देखने को मिला?
आपराधिक मुक़दमे में षड्यंत्र एक विशिष्ट तथ्य है, जिसके लिए जिरह करनी पड़ती है और साक्ष्य को उसके साथ नत्थी करते हुए आगे बढ़ना होता है. ऐसे मामलों में किसी तथ्य को पूर्वधारणा की तरह लेकर नहीं चला जा सकता. अदालत जब सारी चीज़ों को एक तरफ़ रखकर षड्यंत्र के सिद्धांत को सिरे से ख़ारिज कर चुकी है तो ऐसी दलीलों का कोई फ़ायदा नहीं है, जिनसे उसके फ़ैसले पर संदेह पैदा होता हो लेकिन फ़ैसला पलटने में जिससे कोई मदद न मिलती हो. वैसे भी, आपराधिक मामलों में फ़ैसले पर पुनर्विचार की कोई व्यवस्था नहीं है.
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