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मोदी को क्लीन चिट के ख़िलाफ़ याचिका ख़ारिज, क्या होगा इस फ़ैसले का असर?
- Author, अर्जुन परमार
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 63 अन्य को एसआईटी की क्लीन चिट को चुनौती देने वाली याचिका शुक्रवार को ख़ारिज कर दी.
अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी में हुए दंगों में कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफ़री समेत कुल 69 लोग मारे गए थे.
अहसान जाफ़री की विधवा ज़किया जाफ़री ने इस मामले में नरेंद्र मोदी और अन्य कथित साज़िशकर्ताओं की भूमिका पर विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा जारी क्लीन चिट की फिर से जाँच की माँग की थी.
इससे पहले, विशेष मजिस्ट्रेट कोर्ट, गुजरात उच्च न्यायालय ने भी एसआईटी की क्लोज़र रिपोर्ट को चुनौती देने वाली ज़किया जाफ़री की याचिका को ख़ारिज कर दिया था.
ज़किया जाफ़री ने आरोप लगाया कि नरोदा पाटिया, नरोदा गांव और गुलबर्ग सोसायटी जैसे मामले एक "बड़ी साज़िश" का हिस्सा थे.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस ए एस खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सीटी रविकुमार की खंडपीठ ने आरोपों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूतों की कमी थी कि पूरी घटना एक बड़ी साज़िश का हिस्सा थी. साथ ही इस मामले में मेरिट की कमी है.
ज़किया जाफ़री अस्वस्थ हैं इसलिए उनकी तरफ़ से सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद अभी तक कोई बयान नहीं आया है. उनके बेटे तनवीर जाफ़री जो अक्सर मीडिया से बात करते हैं, वो इस समय भारत से बाहर हैं. इसलिए इस मामले में उनकी भी प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है.
लेकिन उन्होंने मैसेज के ज़रिए सिर्फ़ इतना कहा, "हम लोग इस फ़ैसले से काफ़ी निराश हैं. पूरे फ़ैसले को पढ़ने के बाद ही हम लोग इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया दे सकेंगे. पूरा फ़ैसला 450 पन्नों का है. मैं इस पर तफ़्सील से अपनी प्रतिक्रिया बाद में दूंगा."
उस दिन गुलबर्ग सोसायटी में क्या हुआ था?
- 2002 में गुजरात में हुए दंगों के दौरान 28 फरवरी को सवेरे दंगाइयों ने गुलबर्ग सोसायटी को घेर लिया.
- यहां कई लोगों को ज़िंदा जला दिया गया. मारे जाने वालों में कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफ़री समेत कुल 69 लोग शामिल थे.
- एहसान जाफ़री की पत्नी ज़किया जाफ़री ने आरोप लगाया था कि उनके पति ने पुलिस और उस वक्त मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की.
- 2006 में उन्होंने गुजरात पुलिस के महानिदेशक से नरेंद्र मोदी समेत कुल 63 लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की अपील की. ये अपील ठुकरा दी गई.
- इसके बाद ज़किया ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. 2007 में हाईकोर्ट ने भी उनकी अपील ख़ारिज कर दी.
- 2008 में ज़किया जाफ़री और ग़ैर-सरकारी संगठन 'सिटिज़ेन्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस' संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे.
- 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने दंगों की जांच के लिए पहले से गठित एसआईटी को मामले की जांच के आदेश दिए.
- 2012 में एसआईटी ने अहमदाबाद की निचली अदालत में अपनी रिपोर्ट सौंप दी. एसआईटी ने नरेंद्र मोदी को ये कहते हुए क्लीन चिट दे दी कि एसआईटी के पास मोदी के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं.
ज़किया जाफ़री की क़ानूनी लड़ाई में हमेशा उनका साथ देने वाली और इस मामले की सह-याचिकाकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने भी अभी तक अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
उन्होंने भी केवल इतना कहा, "हमलोग इस पर अपना आधिकारिक बयान देने की तैयारी कर रहे हैं. इसमें एक से दो दिन लग सकते हैं."
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद सवाल यह है कि-
- क्या अब यह मामला यहीं ख़त्म हो जाएगा?
- क्या वादी के पास अभी भी न्यायिक विकल्प है?
- क्या कथित साज़िशकर्ताओं को अब बरी कर दिया जाएगा?
- ज़किया जाफ़री और नरेंद्र मोदी के लिए कोर्ट के इस रवैये के क्या मायने हैं?
इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी गुजराती ने इस मामले में कुछ जानकारों से बात की.
'शिकायतकर्ता के पास अभी भी पुनर्विचार के लिए आवेदन करने का मौक़ा है'
शीर्ष अदालत ने एसआईटी की क्लोज़र रिपोर्ट के ख़िलाफ़ ज़किया जाफ़री के आवेदन पर अपने अवलोकन में कहा कि आवेदन में मेरिट का अभाव है. एसआईटी की जाँच के दौरान न ही इस बात का कोई सबूत मिले हैं कि इस मामले में उच्चतम स्तर पर कोई साज़िश रची गई या उसे अंजाम दिया गया.
इस बारे में, भारत के पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के. सी. कौशिक कहते हैं , "अदालत की टिप्पणी से आरोपी को फ़ायदा होगा. अदालत ने फ़ैसला सुनाया कि उनके ख़िलाफ़ आरोपों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे. इसलिए यह भारत के प्रधानमंत्री और उनके साथ अन्य आरोपियों के लिए सकारात्मक टिप्पणी है."
"यह शिकायतकर्ता के लिए एक नकारात्मक रवैया है. क्योंकि वे अपने आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी पुख्ता सबूत या मज़बूत दलील पेश नहीं कर सके. या फिर कोर्ट ने उन दलीलों को नहीं माना.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ द्वारा की गई टिप्पणी इस मामले में अंतिम फ़ैसला नहीं है."
वादी के पास उपलब्ध अन्य न्यायिक विकल्पों के बारे में बात करते हुए, के. सी. कौशिक ने कहा, "वादी के पास अभी भी इस मामले को संवैधानिक पीठ में अपील करने का विकल्प है.
तीन जजों की बेंच के बाद वादी मामले में विचार के लिए पाँच जजों की बेंच में आवेदन कर सकता है."
"बिना जांच के कोई साज़िश है या नहीं कैसे पता चलेगा?"
गुजरात उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के. आर कोष्टी ने पूरे मामले पर कहा, "अदालत ने मामले में मेरिट की कमी का हवाला देते हुए याचिका ख़ारिज कर दी.
लेकिन आपको बिना जाँच के कैसे पता चलेगा कि कोई साज़िश तो नहीं हुई?
कोर्ट ने आरोपी के ख़िलाफ निष्पक्ष जाँच की माँग नहीं मानी, लेकिन हक़ीक़त यह है कि महिला ने अपने पति को खो दिया है."
ज़किया जाफ़री के लिए उपलब्ध न्यायिक विकल्पों के बारे में बात करते हुए कोष्टी का कहना है कि अब उन्हें अदालत में अपना आवेदन दाख़िल करने में मुश्किल होगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि योग्यता के आधार पर तय किए गए मामलों में पुनर्विचार के लिए आवेदन करना मुश्किल है.
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने एसआईटी जाँच का बचाव करते हुए वादी के वकील कपिल सिब्बल के आरोपों को निराधार बताया.
मुकुल रोहतगी ने कहा, "अभियोजन पक्ष का यह आरोप कि, लोगों को भड़काने के लिए मृत कारसेवकों के शवों को अहमदाबाद लाने के लिए एक नियोजित रैली अहमदाबाद लाई गई थी, निराधार है."
राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ''सरकार के अपने नियंत्रण में जो कुछ था वो किया है.''
शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने इस मामले को "मोदी के ख़िलाफ़ 20 साल पुरानी साज़िश का हिस्सा" क़रार दिया है.
उन्होंने कहा, "एसआईटी द्वारा सौंपी गई अंतिम रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट ने बरक़रार रखा है."
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इस पूरे मामले में ज़किया जाफ़री की शिकायत के पीछे तीस्ता सीतलवाड़ का हाथ था.
उन्होंने कहा, "मोदी की छवि ख़राब करने और उन्हें ग़लत मामले में फ़िट करने के लिए एक कॉटेज इंडस्ट्री काम कर रही है, जिसकी दुकान अब बंद होनी चाहिए. 2002 के दंगों में मोदी की भूमिका की जाँच के 60 प्रयास किए गए हैं, लेकिन वे हमेशा हारे हैं, चाहे अदालत में हो या जनता के दरबार में."
ज़किया जाफ़री मामले में कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को दूसरों द्वारा प्रोत्साहित और सुझाया गया क़दम माना.
शीर्ष अदालत ने कहा, "प्रोटेस्ट पिटीशन के नाम पर याचिकाकर्ता ने कई अन्य मामलों में अदालत द्वारा दिए गए फ़ैसलों पर भी सवाल उठाए हैं, जिसके कारण उन्हें पता है. वे यह निर्णय किसी और के निर्देश में कर रहे हैं."
"ज़किया जाफ़री द्वारा दी गई दलीलें एसआईटी सदस्यों की नैतिकता और प्रामाणिकता के बारे में सवाल उठाती हैं.
साथ ही यह SIT की सारी मेहनत को नाकाम करने की कोशिश है. यह आवेदन मामले को अशांत रखने का एक प्रयास है. मामले में आगे की जाँच तभी संभव हो पाती, जब किसी बड़ी साज़िश के सबूत अदालत में पेश किए जाते. जो शिकायतकर्ता द्वारा नहीं किए गए हैं. इसलिए अदालत एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट को मंज़ूरी देती है."
क्या था मामला?
- गोधरा हत्याकांड के दूसरे दिन 28 फ़रवरी 2002 को अहमदाबाद में मुस्लिम बहुल गुलबर्ग सोसायटी पर भीड़ ने हमला कर दिया था. इसमें कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफ़री समेत 69 लोग मारे गए थे.
- भीड़ के हमले से बचने के लिए कई मुसलमानों ने अहसान जाफ़री के घर में शरण ली थी.हिंसक भीड़ ने वहां ठहरे सभी को घेर लिया और कई लोगों को ज़िंदा जला दिया गया.
- अहसान जाफ़री की पत्नी ज़किया जाफ़री ने आरोप लगाया कि उनके पति ने पुलिस और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई सांसदों और वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की.
- ज़किया जाफ़री ने जून 2006 में गुजरात पुलिस के पुलिस महानिदेशक से नरेंद्र मोदी सहित कुल 63 लोगों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज करने की अपील की थी.
- ज़किया जाफ़री ने आरोप लगाया कि मोदी सहित सभी ने जानबूझकर दंगों के दौरान पीड़ितों को बचाने की कोशिश नहीं की.
- डीजीपी ने जब उनकी अपील ख़ारिज कर दी तो ज़किया जाफ़री ने गुजरात हाई कोर्ट में एक अर्ज़ी भी दाख़िल की थी.
- 2007 में, उच्च न्यायालय ने उनके आवेदन को ख़ारिज कर दिया.
- मार्च 2008 में, ज़किया जाफ़री और ग़ैर-सरकारी संगठन सिटीजन फ़ॉर जस्टिस एंड पीस ने सुप्रीम कोर्ट में एकसंयुक्त अपील दायर की.
- सुप्रीम कोर्ट ने मामले में प्रशांत भूषण को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया था.
- अप्रैल 2009 में, सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को, जिसे गुजरात दंगों की जाँच के लिए पहले ही नियुक्त किया गया था,इस घटना की जाँच करने का निर्देश दिया.
- एसआईटी ने 2010 की शुरुआत में नरेंद्र मोदी को पूछताछ के लिए बुलाया और मई 2010 में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट कोसौंप दी.
- अक्टूबर 2010 में प्रशांत भूषण को मामले से हटाया गया और सुप्रीम कोर्ट ने राजू रामचंद्रन को एमिकस क्यूरी बनाया.
- राजू रामचंद्रन ने जनवरी 2011 में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी.
- मार्च 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने जाँच दल को आगे की जाँच करने का आदेश दिया क्योंकि एसआईटी द्वारा उपलब्ध कराए गएसबूतों और उसके निष्कर्षों के बीच कोई समन्वय नहीं था.
- मई 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी को गवाहों और एसआईटी अधिकारियों से मिलने का आदेश दिया.
- सितंबर 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने मोदी के ख़िलाफ़ प्राथमिकी का आदेश नहीं दिया और एसआईटी को निचली अदालत कोअपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया.
- मोदी और ज़किया जाफ़री दोनों ने इसे अपनी जीत बताया.
- 8 फ़रवरी, 2012 को एसआईटी ने मामले को बंद करने के लिए एक रिपोर्ट सौंपी.जिसके ख़िलाफ ज़किया जाफ़री ने 15 अप्रैल 2013 को अर्ज़ी दाख़िल की थी.
- ज़किया जाफ़री और उनके एसआईटी वकीलों के बीच पाँच महीने तक बहस चली.
- दिसंबर 2013 में मेट्रोपॉलिटन कोर्ट ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य अधिकारियों को क्लीन चिट दे दी.
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