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अग्निपथ योजना: मोदी सरकार के बड़े फ़ैसले क्यों घिर जाते हैं विवादों में?
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
देश के कई हिस्सों में विरोध के बावजूद भारतीय सेना ने अपनी नई भर्ती योजना अग्निपथ को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया है.
सेना में निचले पदों पर अस्थायी भर्ती अभियान के विरोध को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "अच्छे मक़सद से की गई चीजें राजनीति में फंस जाती हैं. ये देश का दुर्भाग्य है."
लेकिन पिछले आठ साल में मोदी सरकार ने कई ऐसे बड़े नीतिगत फैसले किए हैं, जिनका व्यापक विरोध हुआ है.
हालांकि विरोध के बावजूद दो को छोड़ कर मोदी सरकार ने अपने सभी नीतिगत फैसलों को बरकरार रखा.
आखिर मोदी सरकार अचानक इस तरह के चौंकाने वाले फैसले क्यों लेती है और इनका क्या असर होता है. विश्लेषक इसे किस नजरिये से देखते हैं, आइए जानते हैं.
नोटबंदी
काला धन, टेरर फ़ंडिंग और भ्रष्टाचार खत्म करने के मकसद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर 2016 को रात आठ बजे टीवी पर देश के नाम संबोधन में नोटबंदी का एलान कर दिया. देश में 500 और एक हज़ार रुपये के नोटों पर पाबंदी लगा दी गई.
सरकार के इस चौंकाने वाले फैसले से देश में अफरातफरी फैल गई. बाद में पता चला कि इससे अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई. इस कदम से कितना काला धन सिस्टम में वापस आया इस पर विवाद बना हुआ है.
टेरर फंडिंग में कमी और भ्रष्टाचार के खात्मे का सबूत देता कोई पुख्ता आंकड़ा तो मौजूद नहीं है. आरबीआई की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक 15.41 लाख करोड़ के नोटों की नोटबंदी हुई थी लेकिन 15.30 लाख करोड़ रुपये वापस बैंकिंग सिस्टम में लौट आए थे.
विश्लेषकों का कहना है कि इस फैसले देश का औद्योगिक उत्पादन गिर गया था और जीडीपी में गिरावट आ गई थी. एक अनुमान के मुताबिक 15 लाख नौकरियां खत्म हो गई थीं. हालांकि इस फैसले से डिजिटल ट्रांजैक्शन और कैशलेस ट्रांजैक्शन काफी बढ़ गया था.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विनोद अग्निहोत्री कहते हैं, "हर प्रधानमंत्री की काम करने की अपनी शैली होती है. मोदी जी की भी है. गुजरात का सीएम रहते भी वे अचानक इस तरह के बड़े फैसले करते रहे हैं. मोदी की राजनीतिक शैली में दो चीजें बेहद अहम है. एक गोपनीयता और दूसरा चौंकाने वाला तत्व."
अग्निहोत्री कहते हैं, "अचानक किए गए इन बड़े फैसलों का उनको राजनीतिक लाभ भी मिला है. इसलिए वे इस तरह के फैसले लेते जा रहे हैं. मोदी काफी अच्छे कम्यूनिकेटर हैं और लोगों को अपनी बात समझा ले जाते हैं. इसलिए विवादास्पद फैसले भी वे लागू करवा लेते हैं."
एनआरसी और सीएए
2018 में देश में कथित अवैध आप्रवासियों को दीमक बताते हुए नरेंद्र मोदी सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था केंद्र में दोबारा उनकी सरकार आई तो 'अवैध घुसपैठियों' को देश से बाहर कर दिया जाएगा.
फिर असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) लागू करवाया गया और 20 लाख लोगों को इससे बाहर कर दिया गया.
इनमें पूरी जिंदगी इस देश में रहने वाले कई मुसलमान विदेशी घोषित कर दिए गए. दिल्ली में शाहीनबाग समेत देश में कई जगह कड़े विरोध के बावजूद नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) ले आया गया.
सीएए के तहत मुस्लिम बहुल आबादी वाले देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में उत्पीड़न के कारण भाग कर भारत आए हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है. मुस्लिमों को इससे बाहर रखा गया है.
पूर्वी दिल्ली में इसके विरोध में हिंसा हुई और 53 लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए. इनमें ज्यादातर मुस्लिम थे.
इसके बाद देश में कोविड लॉकडाउन की वजह से इन कानूनों का विरोध धीरे-धीरे दब गया.
वरिष्ठ पत्रकार और 'द हिंदू' की एसोसिएट एडिटर स्मिता गुप्ता कहती हैं, "मोदी सरकार ध्रुवीकरण की नीति और विपक्ष की कमजोरी की वजह से बढ़त बनाए हुए है. नोटबंदी के बाद भी बीजेपी यूपी का चुनाव जीत गई थी. इसके बाद इसने लोकसभा का चुनाव जीता. इस राजनीतिक मजबूती ने मोदी सरकार को इतने बड़े फैसले अचानक लेने के मामले में दुस्साहसी बना दिया है."
कोविड लॉकडाउन
नोटबंदी की तरह ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च 2020 को देश में कोविड लॉकडाउन का एलान कर दिया. यह लॉकडाउन की तैयारी के बगैर किया गया एलान था. इस फैसले ने लाखों लोगों को पैदल अपने घरों को लौटने को मजबूर कर दिया था.
लाखों लोग जहां के तहां फंस गए. कामकाज बंद होने से बड़ी तादाद में लोगों का रोजगार खत्म हो गया था और अप्रैल-जून 2020 के बीच इकोनॉमी में 24.4 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई.
बीबीसी की रिपोर्ट में स्वास्थ्य, वित्त, आपदा प्रबंधन से जुड़े मंत्रालय समेत 240 विभागों को आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर बताया गया था कि मोदी सरकार ने लॉकडाउन लागू करने से पहले किसी सरकारी विभाग, मंत्रालय या विशेषज्ञ से सलाह नहीं ली थी. मोदी सरकार ने कहा है कि कोविड से देश में 5.2 लोगों की मौत हुई है. जबकि डब्ल्यूएचओ का कहना है कि इससे लगभग दस गुना ज्यााद लोगों की मौत हुई है. हालांकि सरकार ने डब्ल्यूएचओ के इस आकलन का विरोध किया है.
भूमि अधिग्रहण कानून की वापसी
मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण संशोधन ( भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, पुनर्स्थापन और उचित मुआवजा और पारदर्शिता) बिल 2015 में लोकसभा में तो पारित हो गया था लेकिन राज्यसभा में ये पास नहीं हो सका.
पहले के बिल में प्राइवेट सेक्टर के भूमि अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी जरूरी थी. पीपीपी प्रोजेक्ट के लिए 70 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी जरूरी थी.
लेकिन नए कानून में ये बाध्यता खत्म कर दी गई. इसके बाद ही इस बिल का विरोध शुरू हो गया.
सत्ता पक्ष ने विधेयक को किसानों के हित में बताते हुए ये तक कह दिया कि लोगों और किसानों में जानबूझकर भ्रम फैलाया जा रहा है. लेकिन भारी विरोध को देखते हुए प्रधानमंत्री ने एक भावुक भाषण देकर यह बिल वापस ले लिया.
कृषि कानून
मोदी सरकार के तीन कृषि कानूनों ( किसान उपज व्यापार और वाणिज्य, कृषक कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार और आवश्यक वस्तुएं संशोधन कानून) के खिलाफ किसानों ने एक साल तक आंदोलन किया.
सरकार इसे वापस न लेकर इसमें कुछ संशोधन करना चाहती थी लेकिन किसानों के डटे रहने की वजह से सरकार ने ये तीनों वापस ले लिए. लेकिन यूपी, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली समेत देश के कई हिस्से में इस कानून के विरोध के बावजूद बीजेपी यूपी, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा का चुनाव जीत लिया था.
विनोद अग्निहोत्री कहते हैं, "सिर्फ भूमि अधिग्रहण और कृषि कानूनों को सरकार को वापस लेना पड़ा है. मोदी सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी, 370, सीएए-एनआरसी जैसे कानूनों को पारित करा लिया. दरअसल लोगों के गुस्से से बीजेपी को कोई राजनीतिक दंड नहीं मिला है. इन मुद्दों पर विरोध के बावजूद बीजेपी ने अपने अधिकतर चुनाव जीते हैं."
"पीएम मोदी को लगता है कि इन फैसलों का विरोध हो सकता है लेकिन वे लोगों को समझा लेंगे. उन्हें लोगों से संवाद करने की अपनी क्षमता पर भरोसा है. उनकी संप्रेषण कला अच्छी है. यही वजह है वो इस तरह अचानक बड़े फैसले लेते हैं."
तीन तलाक़
विपक्ष के संक्षिप्त विरोध के बाद मोदी सरकार ने एक अगस्त 2019 को तीन तलाक बिल पारित करा लिया. बीजेपी लंबे समय से इस बिल को लाने की कोशिश कर रही थी. विपक्ष में रहते हुए भी वह इस मुद्दे को उठाती रही थी. सरकार की ओर से कहा गया कि यह बिल मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाएगा. लेकिन इसे अल्पसंख्यकों के पर्सनल कानून में हस्तक्षेप माना गया.
स्मिता गुप्ता कहती हैं, "बीजेपी के धार्मिक ध्रुवीकरण की नीति बेहद आक्रामक है. इसके साथ ही बड़ी दिक्कत ये है कि विपक्ष कमजोर है. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रहा है. इसके अलावा मोदी विपक्ष को कमजोर करने की अपनी कोशिश में लगातार लगे रहते हैं. ये स्थिति उन्हें इस तरह के विवादास्पद फैसले लेने में मदद करती है."
वन रैंक वन पेंशन
इस साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने वन रैंक वन पेंशन पर सरकार के फैसले को बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि, कोर्ट को वन रैंक वन पेंशन सिद्धांत और 7 नवंबर, 2015 की अधिसूचना पर कोई संवैधानिक दोष नहीं दिखता है. जबकि एक्स सर्विस मैन शुरू से ही इसका विरोध कर रहे थे.
'इंडियन एक्स-सर्विसमैन मूवमेंट' की ओर से एक दाखिल एक याचिका में कहा था सरकार का फैसला मनमाना और दुर्भावनापूर्ण है. आईईएसएम का कहना है कि, यह वर्ग के अंदर एक और वर्ग बनाता है और एक रैंक को अलग पेंशन देता है, दूसरे को अलग.
याचिकाकर्ताओं ने पूर्व सैनिकों के 2014 के वेतन के आधार पर पेंशन की गणना करने की मांग की थी. जबकि सरकार की 2015 की अधिसूचना के अनुसार, पेंशन की समयबद्ध समीक्षा पांच साल और पेंशन 2013 के वेतन के आधार पर तय की गई थी.
अग्निपथ योजना
मोदी सरकार ने सेना में निचले पदों पर अस्थायी भर्तियों के लिए 14 जून को अग्निपथ का एलान किया. योजना का एलान तीनों सेना प्रमुखों की मौजूदगी में खुद राजनाथ सिंह ने किया. लेकिन सेना में अस्थायी नियुक्तियों की इस योजना से देश के कई हिस्सों में युवा विरोध के लिए सड़कों पर उतर पड़े. चार साल के लिए सेना में नियुक्ति की इस योजना को लेकर देश के युवा नाराज़ हैं और सड़कों पर उतर आए हैं.
बिहार, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में युवाओं ने कई रेलगाड़ियों को आग के हवाले किया और कई जगहों पर रेलवे के दफ्तरों में तोड़फोड़ की. शनिवार को करीब 300 ट्रेनें रद्द की गईं. इस नाराजगी को देखते हुए सरकार ने इस योजना में कुछ संशोधन तो किए लेकिन इसे वापस लेने से इनकार कर दिया.
राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी कहते हैं, "मोदी-शाह की सरकार को डायवर्जन में महारत हासिल है. अग्निपथ योजना के एलान से नूपुर शर्मा और पैगंबर मोहम्मद मामले का शोर दब गया. किसी भी मुद्दे को भटकाने के लिए ये सरकार तुरंत अपनी ओर से कोई मुद्दा खड़ा कर देती है."
वह कहते हैं, "पीएम मोदी एक सधी रणनीति पर चलते हैं. इसके मुताबिक मोदी और मोदी सरकार दो अलग-अलग एंटिटी हैं जैसे बिजनेस में प्रमोटर और कंपनी अलग-अलग एंटिटी होती हैं. जब भी सरकार से इस तरह का कोई विवादास्पद फैसला होता है. मोदी खुद को इससे अलग कर लेते हैं. ऐसे किसी भी मामले में मोदी कहते हैं मुझसे गलती हो सकती है लेकिन मेरी नीयत में कोई खोट नहीं है. गलत फ़ैसला ब्यूरोक्रेसी के मत्थे मढ़ दिया जाता है."
तिवारी कहते हैं, "मोदी सरकार के फैसलों में ये साफ दिखता है कि वह मामले अलग-अलग पक्षों यानी स्टेकहोल्डर्स से कोई मशविरा नहीं करती. सीधे फैसला सुनाती है. इससे नाराज़गी तो पैदा होती है लेकिन अभी तक पीएम मोदी को इसका राजनीतिक नुकसान नहीं हुआ है. शायद यही वजह है कि वह अचानक बड़े और विवादास्पद फैसले ले लेते हैं."
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