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हैंसी क्रोनिए: क्रिकेटर जो पहले हीरो बना, फिर विलेन, मौत के साथ कई राज़ दफ़न
- Author, विमल कुमार
- पदनाम, खेल पत्रकार
जब आप साउथ अफ्रीका के पूर्व कप्तान हैंसी क्रोनिए का ज़िक्र करते हैं तो उस कहानी का अंत हर किसी को पता है. एक दुख़द अंत. कैसे एक रहस्यमय तरीके से क्रिकेट के शानदार कप्तान की मौत हो जाती है, जब उनका हेलीकॉप्टर क्रैश हो जाता है.
क्रोनिए की कहानी जिस तरह से ख़त्म होती है उसे अक्सर हिंदी फ़िल्मों में दुखांत की संज्ञा दी जाती है और ऐसी पटकथा वाली फ़िल्मों के हिट होने की गांरटी बहुत कम होती है. लेकिन, ये तो बस आख़िरी अध्याय था और सिर्फ़ इसके आधार पर क्रोनिए की ज़िंदगी की पूरी किताब को पढ़ना और समझना भूल होगी.
ऐसे में बात आती है शुरुआत की. कहां से क्रोनिए की कहानी शुरू की जाए? चलिए शुरुआत करने से पहले एक बार फिर से आपको उनकी असमायिक मौत के दो साल बाद किए गये एक सर्वे की चर्चा से करता हूं. 2004 में SABC (साउथ अफ़्रीकन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन) ने पूरे देश में इतिहास के 100 महानतम शख़्सियत को लेकर एक सर्वे जनमत संग्रह करवाया.
ये जनमत संग्रह क्रिकेट या खेल की दुनिया से नहीं बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाले लोगों को ध्यान में रखकर किया गया. साउथ अफ्रीका से बाहर के लोगों को इस बात पर अचंभा हुआ कि क्रोनिए इस सर्वे में 11वें नंबर पर आये. लेकिन, अफ्रीकी जनता के इस फ़ैसले ने दिखाया कि तमाम नाकामियों और ग़लतियों के बावजूद उस मुल्क ने अपने एक युवा हीरो को माफ़ कर दिया था और उसकी खूबियों को ही उन्होंने याद रखना ज़्यादा उचित समझा.
क्रिकेट के बेहद सम्मानित लेखकों में से एक पीटर रॉबक ने एक बार लिखा था- किसी इंसान का आकलन उसके पूरे व्यक्तित्व को लेकर होना चाहिए न कि आधे-अधूरे तरीके से उसके चरित्र के अलग-अलग हिस्सों पर अपनी राय देकर. शायद क्रोनिए के चरित्र का आकलन करने के समय रोबक की ये बात सबसे सटीक बैठती है.
पिता और भाई भी क्रिकेट से जुड़े
बहरहाल, क्रोनिए की कहानी की शुरुआत में जो अध्याय हैं उससे उन्हें बेहद भाग्यशाली माना जा सकता है. क्रोनिए का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां उनके पिता खुद उस राज्य (ओरेंज फ्री स्टेट) के लिए फ़र्स्ट क्लास क्रिकेटर थे और रिटायर होने के बाद क्रिकेट संघ में उनकी तूती बोलती थी जिसके चलते साउथ अफ्रीका के बड़े से बड़े क्रिकेट अधिकारियों के बीच उनकी बात को अहमियत मिलती थी.
क्रोनिए के बड़े भाई भी 90 के दशक में घरेलू राज्य के लिए फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट खेल रहे थे और युवा क्रोनिए को क्रिकेट की बारिकियां समझने में न किसी तरह की दिक्कतें हुई और न ही उन्हें राष्ट्रीय टीम का सफ़र तय करने में किसी तरह की अड़चन आई.
आलम ये रहा कि 1991 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दोबारा साउथ अफ्रीका की वापसी हुई तो क्रोनिए एक युवा खिलाड़ी के तौर पर भारत का दौरा करने वाली टीम का हिस्सा थे. 21 साल की उम्र में अपने राज्य की कप्तानी करने वाले क्रोनिए को ठीक तीन साल बाद देश की कप्तानी की ज़िम्मेदारी भी मिल गयी. ग्रेम स्मिथ से पहले क्रोनिए अफ्रीकी क्रिकेट इतिहास के सबसे कामयाब कप्तान थे.
भारत से रिश्ता क्रोनिए के जीवन का अहम हिस्सा
अगर अफ्ऱीका के बाद किसी और देश का नाम क्रोनिए के साथ सबसे ज़्यादा जुड़ा तो वो मुल्क रहा भारत! एक ऐसा मुल्क जिसके साथ क्रोनिए के रिश्ते की चर्चा किये बग़ैर कोई भी आत्म-कथा पूरी नहीं हो सकती. पहली बार क्रोनिए ने भारत में क्रिकेट को लेकर दीवानगी और जूनून के किस्सों को खुली आंखों से देखा और महसूस किया.
अपनी पहली भारत यात्रा के करीब एक दशक बाद इसी मुल्क में क्रोनिए जब टेस्ट कप्तान के तौर पर लौटे तो उन्होंने 2-0 से सीरीज़ जीतकर 1987 से चले आ रहे अभेद किले (भारत 1987 में पाकिस्तान से टेस्ट सीरीज़ हारने के बाद अपनी ज़मीं पर किसी और से हारा नहीं था) के रिकॉर्ड को भी धवस्त कर दिया.
ये वो कमाल था जो मार्क टेलर और स्टीव वॉ जैसे दिग्गज कप्तानों के साथ उस समय की महापराक्रमी टीमें भी नहीं कर पाई थीं.
लेकिन, क्रोनिए की ये असाधारण उपलब्धि भी उनके जीवन की तरह बस क्षणिक ही रही जिसका जश्न वो ठीक से मना भी नहीं पाए.
जल्द ही उस सीरीज़ के ख़त्म होने के बाद ये बात सामने आयी कि क्रोनिए मैच-फिक्सिंग में शामिल थे. दिल्ली पुलिस की टेप रिकॉर्डिंग और उसके बाद के जो सनसनीखेज़ जानकारियां सामने आईं, उससे क्रिकेट को जैसी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, उसे केवल इस लेख में समेटा नहीं जा सकता है.
जून 2000 में क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था आईसीसी पूर्व मेट्रोपोलिटन पुलिस कमिश्नर सर पॉल कॉन्डोन को संस्थान में लेकर आए और पहली बार एंटी-करप्शन यूनिट की स्थापना हुई.
ऐसा नहीं है कि क्रिकेट से भ्रष्टाचार पूरी तरह ख़त्म हो गया है लेकिन पिछले दो दशक में तमाम मुश्किलों के बावजूद आईसीसी ने खिलाड़ियों और बुकी के नेक्सस को तोड़ने के लिए कई कड़े कदम उठाये हैं. अगर आप गहराई से सोचें तो इस पहल की शुरुआत बिना क्रिकेट में क्रोनिए की एंट्री के मुमकिन नहीं थी.
क्रिकेट चाहकर भी क्रोनिए को भुला नहीं सकता है. मैदान पर अपने खेल से शानदार योगदान के लिए पहचाने जाने वाले क्रोनिए ने अंजाने में ही सही, अपने कुकृत्यों के ज़रिये ही सही, खुद को हमेशा के लिए आने वाली हर पीढ़ी के ज़ेहन में कैद कर लिया है.
शायद, क्रोनिए के जीवन और उनके चरित्र को लेकर क्रिकेट और दुनिया कभी भी एकमत नहीं हो पायेगी. उनके मुल्क साउथ अफ्रीका में उनकी ग़लतियों को आसानी से भुला दिया गया और उनके साथी खिलाड़ी जिसमें जोंटी रोड्स, डेरेल कलिनन, जैक कैलिस जैसे दिग्गज भी शामिल रहें, आज भी क्रोनिए की ईमानदारी की कसमें खाने से नहीं हिचकते हैं. वहीं दूसरी तरफ क्रिकेट जगत को इस बात से मायूसी है कि जिस कप्तान और जिस खिलाड़ी के पास इतना कुछ हासिल करने को था वो पैसे के लालच में इतनी तेज़ी से अपना पतन कैसे देख सकता था.
हर कहानी और हर सिक्के की ही तरह क्रोनिए की ज़िंदगी की दास्तां भी इन्हीं दो पहलूओं के बीच जूझती रहती है. ये बात शायद कभी भी किसी को पता नहीं चल पाएगी कि वाकई क्रोनिए इतने ईमानदार थे जो कुछ वक्त के लिए रास्ता भटक गये या फिर वो शुरू से ही लालची किस्म के शातिर ख़िलाड़ी थे जिसका अंत क्रिकेट को एक त्रासदी के तौर पर नहीं देखना चाहिए.
क्रोनिए के बाद भी क्रिकेट ने बड़े से बड़े दिग्गजों को पैसे की चमक के आगे खुद को बेशर्मी से बिकते हुए दिखा है. जब भी किसी को इस बात पर हैरानी हो कि आख़िर क्रोनिए या फिर कोई और क्रिकेटर इतनी सारी सुविधाओं और दौलत हासिल करने के बावजूद भ्रष्ट हो सकता है तो उन्हें पाकिस्तान के जस्टिस क्य्यूम की वो मशहूर पंक्तियां याद करनी चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा था, "जो अपने हीरो को नीचे गिरता देख मायूस होतें हैं उनके लिए सलाह यही है कि इंसान से ग़लतियां होती ही हैं. क्रिकेटर सिर्फ़ क्रिकेटर ही होते हैं."
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