धर्म के नाम पर हिंसा और गोली का सामना करने वाली कलाकार: निलाम्बुर आयशा

निलाम्बुर आयशा

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इमेज कैप्शन, निलाम्बुर आयशा उस वक्त महज़ 18 साल की थीं जब स्टेज में उन पर एक व्यक्ति ने गोली चलाई
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

बात साल 1953 की है. निलाम्बुर आयशा उस वक्त केवल 18 साल की थीं. जिस वक्त वो स्टेज पर एक डायलॉग बोल रही थीं ठीक उसी वक्त एक गोली उनके पास से हवा को चीरती हुई निकल गई.

निलाम्बुर आयशा अब 87 साल की हो चुकी हैं. केरल के निलाम्बुर शहर (ये नाम उन्होंने स्टेज पर अपने नाम के रूप में अपना लिया था) में अपने घर में बैठी वो उस वक्त को याद करती हुई कहती हैं, " मैं उस समय चलते- चलते डॉयलॉग बोल रही थी, इसलिए बच गई, गोली स्टेज के पीछे लगे परदे में लगी थी."

हमलावर के निशाने पर रहे कई लोगों में से आयशा भी एक थीं. उस दौर में धार्मिक रूढ़िवाद से प्रेरित लोगों का मानना था कि मुस्लिम महिलाओं को एक्टिंग नहीं करनी चाहिए. वो आयशा को एक्टिंग करने से रोकना चाहते थे.

वो कहती हैं कि इन सबके बावजूद उन्होंने एक्टिंग करना जारी रखा, उन्होंने ना सिर्फ़ ईंटों और पत्थरों का सामना किया बल्कि उन्हें थप्पड़ भी मारे गए. लेकिन वो तब तक इसे सहती रहीं जब तक वो लोगों का नज़रिया बदलने में कामयाब नहीं हुईं.

बीते महीने आयशा पहली कतार में बैठी उसी नाटक को स्टेज पर देख रही थीं जिसे करने के दौरान दशकों पहले उन पर गोली चली थी. नई पीढ़ी के कलाकार दर्शकों के सामने 'इज्जू नल्लोरू मानसनाकन मोक्कू' (आप अच्छा इंसान बनने की कोशिश करते रहिए) के नए संस्करण का मंचन कर रहे थे.

इस नाटक की शुरूआत आयशा पर गोली चलने की घटना से होती है. फिर आगे इसमें मुसलमानों के बीच धार्मिक कट्टरता को लेकर चर्चा होती है. नाटक का काफी हिस्सा पहले किए गए नाटक की तरह ही था, हालांकि नए संस्करण में असहिष्णुता और धार्मिक कट्टरता, और ख़ास कर महिलाओं के साथ अत्याचार की हाल में हुई घटनाओं को भी शामिल किया गया.

उदाहरण के तौर पर, सप्ताह भर पहले केरल के एक वरिष्ठ मुसलमान नेता ने एक कार्यक्रम के आयोजकों को महिला छात्रों को स्टेज पर बुलाकर पुरस्कार देने के लिए उन्हें डांट दिया. जल्द ही इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया और विवाद खड़ा हो गया.

वीडियो कैप्शन, निलाम्बुर आयशा: धर्म के नाम पर हिंसा और गोली झेलने वाली महिला की कहानी
मुसलमानों के हक के लिए प्रदर्शन

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साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी के चुनाव जीतकर सत्ता में आने के बाद से देश में मुसलमानों पर हमले बढ़े हैं. 20 करोड़ की आबादी वाले मुसलमान देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग है.

लेकिन मामला केवल इतना ही नहीं है. अल्पसंख्यक वर्ग भी राजनीतिक उठापटक के दौर से गुज़र रहा है. यहां उदारवादी आवाज़ों के लिए धार्मिक पहचान के नाम पर रूढ़िवादी प्रथाओं को लेकर बात करना मुश्किल होता जा रहा है.

आयशा कहती हैं कि वो और उनके अधिकतर कम्युनिस्ट साथी 1950 और 60 के दशक में जिस रूढ़िवाद के ख़िलाफ़ लड़े थे, उन्हें डर है कि वो आज के भारत में अपनी जड़ें गहरी करता जा रहा है, और केरल जैसे भारत के तथाकथित प्रगतिशील राज्य समेत ये पूरे भारत में हो रहा है.

वो कहती हैं, "हमने इन बातों को लेकर लोगों का नज़रिया बदलने की कोशिश की थी. लेकिन अब अगर एक छात्रा के स्टेज पर जाने को लेकर आपत्ति है, तो ऐसा लगता है कि हम पुराने दिनों की तरफ लौट रहे हैं."

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ग्रामोफ़ोन से हुई शुरूआत

आयशा का जन्म एक संभ्रांत परिवार में हुआ था. लेकिन पिता की मौत के बाद उनका परिवार ग़रीब हो गया.

वो कहती हैं जब उनका परिवार ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहा उस वक्त समुदाय के नेताओं से उन्हें कम ही मदद मिली.

उनके लिए ज़िंदगी मुश्किल थी लेकिन वो खुश थीं कि उनके पास रहने को एक छत थी. 14 साल की उम्र में उनकी शादी 47 साल के एक व्यक्ति से कर दी गई थी. शादी के चार दिन बाद आयशा शादी तोड़कर वापस अपने घर आ गईं. बाद में जब उन्हें पता चला कि वो गर्भवती हैं तो उन्होंने अपने पति से तलाक ले लिया.

एक दिन जब वो ग्रामोफ़ोन पर गाना सुनते-सुनते गाना गुनगुना रही थीं, उनके भाई अपने एक दोस्त नाटककार ईके अयामु के साथ घर आए. उस वक्त उनके घर में ग्रामोफ़ोन ही एक महंगी चीज़ बची थी.

उस दौर में कम्युनिस्टों की मदद से प्रोग्रेसिव थिएटर ग्रुप राज्यभर में नाटक दिखा कर, राजनीति से जुड़े गीत गाकर लोगों के बीच अपनी जड़ें जमा रहा था. इस ग्रूप ने कई छोटे ग्रूप्स को नाटक लिखने और दिखाने के लिए प्रेरित किया था.

लेकिन उस वक्त स्टेज पर अधिकतर भूमिकाएं पुरुष ही निभाते थे, और तो और महिलाओं की भूमिका भी पुरुष ही निभाते थे.

1957 में ईएमएस नम्बूदिरिपाद भारत के पहले कम्यूनिस्ट मुख्यमंत्री बने और उनके नेतृत्व में केरल में सरकार बनी. उन्होंने एक नाटक का मंचन देखने के बाद ईके अयामु से कहा कि वो नाटक के लिए किसी महिला कलाकार की तलाश करें.

अयामु ने जब आयाशा को गीत गाते हुए सुना उन्होंने उनसे पूछा कि क्या वो एक नाटक में जमीला नाम के एक किरदार की भूमिका करेंगी. उस नाटक में ये एक गृहिणी का किरदार था और चुनौतीपूर्ण था.

वीडियो कैप्शन, केरल में कट्टरवादी सलफ़ी इस्लाम को फैलाने में अरब से लौटे केरल के लोगों का हाथ बताया जाता है.

आयाशा इसके लिए तैयार थीं लेकिन उनकी मां को चिंता थी कि ऐसा हुआ तो धार्मिक नेता उनका बहिष्कार करेंगे.

आयशा कहती हैं, "मैंने मां से कहा कि जब हम मुश्किल में थे तो वो हमारी मदद करने नहीं आए थे. तो फिर अब वो हमें सज़ा कैसे दे सकते हैं?"

वो नाटक हिट साबित हुआ लेकिन उससे कई हलकों में हलचल पैदा हुई.

नाटक में जमीला के बेटे का किरदार निभाने वाले वीटी गोपालकृष्णन बताते हैं, "हम पर कई हमले हुए. कट्टरवादी मुसलमानों का मानना था कि एक महिला का मंच पर नाटक में हिस्सा लेना अल्लाह के अपमान के बराबर है."

जिस दौरान आयशा स्टेज पर होतीं उन पर पत्थर फेंके जाते. यहां तक कि उनको बचाने की कोशिश करने वाले साथियों पर भी कई हमले हुए.

एक बार तो एक व्यक्ति स्टेज के ऊपर चढ़ आया और उसने आयशा को इतनी ज़ोर से थप्पड़ मारा कि उनके एक कान के पर्दे को गंभीर नुक़सान पहुंचा. इस घटना के बाद से उन्हें एक कान से सुनाई नहीं देता. जिस व्यक्ति ने आयशा पर गोली चलाई थी उसे पकड़ा नहीं जा सका.

निलाम्बुर आयशा

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क्या इन हमलों से आयशा डर गईं?

आयशा कहती हैं, "नहीं, बिल्कुल नहीं. इनसे मुझे और ताकत मिली."

वो कहती हैं, "ये इंसानियत को सामने लाने वाला नाटक था जिसमें लोगों की अच्छाई को बाहर लाने और सभी तरह के लोगों से प्यार करने की बात थी. इसी कारण हमारी नाटकमंडली पर कई बार हमले हुए."

वरिष्ठ पत्रकार जॉनी ओके कहते हैं कि आयशा की हिम्मत ने उन्हें केरल के इतिहास में एक ख़ास जगह दी है. वो कहते हैं, "वो कला और संस्कृति के माध्यम से लोगों के जीवन में बदलाव लाने वाले समाज सुधार आंदोलन का हिस्सा रही हैं."

आयशा ने कई नाटकों और फ़िल्मों में काम किया. एक वक्त के बाद उन्हें काम मिलना बंद हो गया.

बाद में घरेलू सहायिका के तौर पर काम करने के लिए वो सऊदी अरब चली गईं. वो कहती हैं, "मैं कितना वक्त वहां थी मुझे याद नहीं."

केरल लौटने के बाद उन्होंने मलयालम फ़िल्मों में काम करना शुरू किया. कुछ फ़िल्मों में अभिनय के लिए उन्हें पुरस्कार भी मिला. अपनी प्रेरणा के बारे में दूसरों को बताने के लिए उन्हें कार्यशालाओं और कार्यक्रमों में भी आमंत्रित किया जाने लगा.

आयशा कहती हैं कि आज वो पीछे मुड़कर अपनी ज़िंदगी को देखती हैं तो उन्हें कोई पछतावा नहीं होता.

वो कहती हैं, "मैंने खुद पर हमलों को भी बर्दाश्त किया है. मैं आज 87 साल की हूं और गर्व से दुनिया के सामने खड़ी हो सकती हूं."

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