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भारत में अब भी बरकरार है बेटे की चाहत, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण से चला पता
- Author, शादाब नज़्मी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
भारत सरकार की ओर से हाल में जारी एक सर्वेक्षण के अनुसार देश के लिंग अनुपात में सुधार हुआ है, लेकिन आबादी का एक बड़ा तबका अभी भी कम से कम एक बेटा होने की ख़्वाहिश रखता है.
2019 से 2021 के बीच आबादी के व्यापक तबकों के बीच किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि सर्वेक्षण में शामिल लगभग 80 फ़ीसदी लोग कम से कम एक बेटा होने की इच्छा रखते हैं.
इस सर्वेक्षण से पता चला कि अभी भी बड़े पैमाने पर लोग बेटियों पर बेटों को तरजीह दे रहे हैं. भारत के पारंपरिक समाज की पुरानी मान्यता रही है कि खानदान का नाम बेटा ही आगे बढ़ाता है और वही बुढ़ापे में अपने मां-बाप की देखभाल करेगा. वहीं बेटियां शादी के बाद अपने घर यानी ससुराल चली जाएगी. साथ ही उसकी शादी में ख़ासा दहेज भी देना पड़ेगा.
इस सोच के ख़िलाफ़ सालों से काम करने वालों का मानना है कि इस सोच के चलते बेटियों के मुक़ाबले बेटों की संख्या ज़्यादा हो जाती है, जो लंबे अरसे से भारत के लिए शर्म की बात रही है.
पिछले क़रीब एक सदी के जनगणना आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या ज़्यादा रही है. 2011 में हुई जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर 1,000 पुरुषों पर महज़ 940 महिलाएं थीं.
2011 में भारत का बाल लिंगानुपात (जन्म से 6 साल तक के बच्चों का अनुपात) तो और भी ख़राब था. आंकड़ों के अनुसार, तब 1,000 लड़कों पर केवल 918 लड़कियां ही थीं. इस चलते कई आलोचक भारत को 'लापता महिलाओं का देश' कहने लगे.
हालांकि एनएफएचएस-5 सर्वेक्षण में भारत के लिंगानुपात में पहली बार सुधार देखा गया है. इसके अनुसार, भारत में अब पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या अधिक हो गई है.
हालांकि आंकड़े ये भी बताते हैं कि भारत में बेटों की 'ऐतिहासिक प्राथमिकता' अब भी बनी हुई है. इसके अनुसार, 16 प्रतिशत पुरुष और 14 प्रतिशत महिला यानी 15 प्रतिशत लोग बेटियों की तुलना में बेटा पैदा होने की ख़्वाहिश रखते हैं. इस चलते बेटे की चाहत में बेटियां पैदा होते जाती हैं.
दिल्ली में लोगों के घरों में घरेलू काम करने वाली तीन बेटियों की मां इंद्राणी देवी ने इस बारे में बीबीसी से बातचीत की. वो बताती हैं कि वो एक 'पूर्ण' परिवार यानी दो लड़के और एक लड़की चाहती थीं, लेकिन भगवान की मर्जी कुछ और ही थी. हर बार उन्हें बेटी ही हुई.
अब वो अपने भाग्य के साथ समझौता कर चुकी हैं और फ़ैसला किया कि वो अब और बच्चे नहीं करेंगी. वो कहती हैं, "मेरे पति बस ड्राइवर हैं. अब हम और बच्चे नहीं पाल सकते."
एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट के अनुसार, इंद्राणी देवी की तरह 15 से 49 साल के बीच की लगभग 65 प्रतिशत विवाहित महिलाओं, जिनके कम से कम दो बेटियां और एक भी बेटा नहीं है, ने बताया कि वे अब और बच्चे नहीं चाहतीं. पिछले सर्वेक्षण यानी एनएफएचएस-4 में यह आंकड़ा 63 प्रतिशत था.
ताज़ा रिपोर्ट में उम्मीद की एक और किरण दिखी है. इसके अनुसार, बेटों के बजाय बेटियां पैदा करने की इच्छा रखने वालों का हिस्सा पिछली रिपोर्ट के 4.96 प्रतिशत से बढ़कर 5.17 प्रतिशत हो गया. हालांकि यह बढ़ोतरी बहुत ज़्यादा नहीं है. लेकिन इससे पता चलता है कि भारत में कुछ लोग बेटों से ज़्यादा बेटियों को चाहते हैं.
जानकारों का मानना है कि इस बात का सीधा संबंध भारत की घटती कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट से है. यह दर महिलाओं के प्रजनन काल में पैदा किए जाने वाले बच्चों की औसत संख्या के बारे में बताती है.
एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट के अनुसार देश के बढ़ते शहरीकरण, बढ़ती महिला साक्षरता और गर्भनिरोधक के बढ़ते इस्तेमाल से भारत की प्रजनन दर घटकर अब 2 हो गई है. मालूम हो कि किसी भी आबादी में यह आंकड़ा जब 2.1 से कम हो जाता है, तो क़रीब तीन दशक बाद जनसंख्या बढ़ना बंद हो जाती है.
देश की क़रीब 140 करोड़ आबादी के लिहाज से यह अच्छी ख़बर है, लेकिन जानकारों का मानना है कि संतुलित आबादी के लिए भारत को विषम लिंगानुपात की समस्या दूर करने पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए.
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