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अमित शाह बंगाल बीजेपी में जारी भगदड़ को क्या रोक पाएंगे
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
दो मई, दीदी (ममता बनर्जी) गई...........पश्चिम बंगाल में बीते साल हुए विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की चुनावी रैलियों में यह नारा एक अभिन्न हिस्सा बन गया था.
दो मई यानी चुनाव नतीजे के दिन दीदी तो कहीं नहीं गई लेकिन बीजेपी के तमाम केंद्रीय नेता ज़रूर बंगाल का रास्ता भूल गए. उस बात को ठीक एक साल बीत गए हैं. इस बीच, हुगली में पानी बह चुका है. इस दौरान बंगाल में बीजेपी भी लगातर बिखरती रही है.
पार्टी के वरिष्ठ नेता सरेआम एक-दूसरे की पोल खोलने में जुटे हैं और नेताओं में पार्टी छोड़ने की होड़ मच गई है. बीते एक साल के दौरान पार्टी के सात विधायक उससे नाता तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में लौट चुके हैं. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 77 सीटें जीती थीं.
बिखरते कुनबे को एकजुट कर पाएंगे?
ऐसे में केंद्रीय गृह मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता अमित शाह का तीन दिनों का बंगाल दौरा काफ़ी अहम हो गया है. राजनीतिक हलकों में सवाल पूछा जा रहा है कि क्या शाह यहाँ अपने बिखरते कुनबे को एकजुट कर पाने में कामयाब होंगे?
उनके दौरे से ठीक पहले उत्तर 24 परगना ज़िले में बारासात के पंद्रह नेताओं ने एक साथ इस्तीफा दे दिया है. इससे यह सवाल ख़ुद भाजपा में भी उठने लगा है.
प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार मानते हैं कि कुछ मुद्दों पर नेताओं में नाराज़गी हो सकती है. लेकिन ऐसी दिक्क़तों और समस्याओं को पार्टी के भीतर निपटाना चाहिए, सार्वजनिक रूप से नहीं.
अमित शाह का यह दौरा राजनीतिक भी है और सरकारी भी. इस दौरान वो कुछ सरकारी कार्यक्रमों में भी शिरकत करेंगे और पार्टी के भी.
बीते साल विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का उत्साह लगभग ग़ायब है. बीते साल मुकुल राय की टीएमसी में वापसी के साथ पार्टी बीजेपी छोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वो अब तक जारी है. अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग की तर्ज़ पर पार्टी के तमाम नेता अलग-अलग राग अलापते नज़र आ रहे हैं.
बीते एक साल के दौरान, जितने भी चुनाव हुए उन सब में पार्टी को मुँह की खानी पड़ी है. ताज़ा मामला आसनसोल संसदीय सीट का है, जहाँ उपचुनाव में पहली बार टीएमसी ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया.
पार्टी के आम कार्यकर्ताओं का भी अब मोहभंग होता नज़र आ रहा है. एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "बीते साल चुनाव बाद हुई हिंसा में हज़ारों कार्यकर्ताओं को काफ़ी कुछ झेलना पड़ा लेकिन केंद्रीय नेताओं और राज्य नेतृत्व ने उनको उनके हाल पर छोड़ दिया था. इससे कार्यकर्ताओं की नाराजगी और पार्टी से उनका मोहभंग होना लाजिमी है."
बैठक पर टिकी निगाह
अब राजनीतिक हलकों में तमाम निगाहें शाह और बीजेपी नेताओं के बीच छह मई को होने वाली बैठक पर टिकी हैं. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि बैठक में उपचुनावों में पार्टी के लचर प्रदर्शन का मुद्दा उठना तय है. इसके अलावा असंतुष्ट गुट के नेता भी उनके समक्ष अपनी शिकायत रख सकते हैं. इससे प्रदेश नेतृत्व के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है.
केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य के नेताओं को शाह के दौरे से पहले तमाम मतभेदों को सुलझाने का निर्देश दिया था. लेकिन उसकी बजाय सामूहिक इस्तीफे़ हो रहे हैं.
हाल में पार्टी के दो पूर्व प्रदेश अध्यक्षों, तथागत रॉय और दिलीप घोष ने जिस तरह सार्वजनिक रूप से एक दूसरे की लानत मलामत की, उससे पार्टी की साख और ख़राब हुई है. घोष ने राय पर अपने कार्यकाल में पार्टी मुख्यालय को मयखाना में तब्दील करने का आरोप लगाया तो राय ने उनको कम पढ़ा लिखा फिटर या मैकेनिक बताया.
शाह के लिए चुनौती
पार्टी के कई अन्य नेता भी प्रदेश नेतृत्व पर अक्सर सवाल उठाते रहे हैं. ऐसे में यह दौरा शाह के लिए भी एक कड़ी चुनौती है. वे राज्य के विभिन्न ज़िलों के नेताओं के अलावा आरएसएस के वरिष्ठ नेताओं के साथ पार्टी को एकजुट करने और भावी रणनीति तय करने पर विचार विमर्श करेंगे.
राजनीतिक विश्लेषक समीरन पाल कहते हैं, "राज्य में अगले साल पंचायत चुनाव होने हैं. उससे पहले पार्टी में बढ़ते मतभेदों और असंतोष को दूर कर उसमें नई जान फूंकना शाह के लिए आसान नहीं होगा. पंचायत चुनाव एक तरह से 2024 के आम चुनाव का रिहर्सल तमाम दलों के लिए शक्ति परीक्षण का आख़िरी मौक़ा होगा."
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि शाह अपने दौरे के दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं के लगातार गिरते मनोबल को मज़बूत करने का प्रयास करेंगे.
बंगाल बना बीजेपी की प्रयोगशाला
लेकिन पार्टी के एक असंतुष्ट नेता कहते हैं, "बंगाल बीजेपी की प्रयोगशाला बन गया है. यहाँ तरह-तरह के लोगों को पार्टी की कमान सौंपी जाती रही है, लेकिन इससे फ़ायदे की बजाय नुक़सान ही ज़्यादा हुआ है. दिलीप घोष को हटा कर सुकांत मजूमदार को पार्टी की कमान सौंपे जाने के बाद हर चुनाव में पार्टी की दुर्गति ही हुई है."
मजूमदार ने जब राज्य समिति के पुनर्गठन के दौरान कई नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया तो ऐसे लोग बागी हो गए. इसकी सरेआम आलोचना करने पर पूर्व उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजूमदार और रितेश तिवारी को पार्टी से सामयिक तौर पर निकल दिया गया. जय प्रकाश बीते मार्च टीएमसी में शामिल हो गए.
ताजा मामले में बैरकपुर के सांसद अर्जुन सिंह भी राज्य के जूते उद्योग के प्रति कथित उपेक्षा के लिए केंद्र सरकार और जूते आयुक्त की खिंचाई करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रशंसा कर चुके हैं. इससे उनकी भी घर वापसी की अटकलें तेज़ हो गई हैं.
क्या पार्टी में साल भर से बढ़ते मतभेदों, अहम के टकराव और गुटबाज़ी को दूर करने और कार्यकर्ताओं के रसातल में पहुँचे मनोबल को मज़बूत करने में शाह का दौरा संजीवनी का काम करेगा? लाख टके के इस सवाल का जवाब तो शायद आने वाले दिनों में ही मिल सकेगा. लेकिन ख़ुद भाजपा नेताओं को ही ऐसा भरोसा नहीं है.
टीएमसी के प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं, "बीजेपी नए और पुराने नेताओं के बीच संतुलन बनाने में जूझ रही है. शाह को भी पार्टी के अंतर्कलह की जानकारी है. उनके दौरे से भी बंगाल भाजपा की क़िस्मत नहीं बदलेगी."
यहाँ बीजेपी मुख्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक़ शाह बुधवार को कोलकाता पहुँचेंगे. वो अगले दिन यहाँ हिंगलगंज में एक सरकारी कार्यक्रम में शामिल होने के बाद सिलीगुड़ी चले जाएंगे, जहाँ पार्टी की एक जनसभा को संबोधित करेंगे.
उसी दिन वहाँ विभिन्न तबके के नेताओं के साथ भी उनकी मुलाक़ात होनी है.
शुक्रवार को तीनबीघा में एक सरकारी कार्यक्रम में शिरकत करने के बाद वो कोलकाता लौटेंगे और पार्टी के तमाम प्रमुख नेताओं के साथ बैठक करेंगे. यही उनके दौरे के सबसे अहम हिस्सा है. केंद्रीय गृह मंत्री इसके अलावा विक्टोरिया मेमोरियल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे और आरएसएस के कोलकाता दफ्तर का भी दौरा करेंगे.
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