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ममता बनर्जी से पहले भी हुए हैं प्रदेश से देश का नेता बनने के प्रयास
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
जम्मू कश्मीर के अपने हाल के ही दौरे में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि 2024 को होने वाले आम चुनावों में कांग्रेस के लिए 300 सीटें हासिल करना दूर का सपना है. ज़ाहिर है कि उनका इशारा अपनी ही पार्टी यानी कांग्रेस की चुनौतियों को लेकर था जो सांगठनिक कमज़ोरियों से लेकर नेतृत्व को लेकर अंदरूनी रस्साकशी से जूझ रही है.
उनका बयान ऐसे समय में भी आया जब विपक्ष के गलियारों में सवाल उठाये जा रहे है कि क्या सभी विपक्षी दलों को कांग्रेस के साथ लामबंद होना चाहिए या नहीं?
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 'इस धारणा' को ही चुनौती दे डाली और इसकी किसी भी संभावना को ख़ारिज करते हुए कहा कि ऐसा इसलिए नहीं हो सकता है क्योंकि कांग्रेस के नेता विदेश भ्रमण ही ज़्यादा करते रहते हैं.
उन्होंने ये भी कहा कि यूपीए नाम का अब कोई गठबंधन नहीं है. उनके सलाहकार प्रशांत किशोर ने ट्वीट कर 'विपक्ष की एकता' का भी एक फ़ॉर्मूला सुझाया. उनके अनुसार विपक्षी दलों को भी चाहिए कि वो 'लोकतांत्रिक तरीके' से तय करें कि उनका नेतृत्व कौन करेगा.
कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने पलटवार करते हुए सिर्फ़ इतना कहा, "हम सलाहकारों के विचारों पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं."
पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनावों में मिली ज़बरदस्त जीत के जोश पर सवार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पूरे भारत का भ्रमण कर क्षेत्रीय दलों से बातचीत भी कर रही हैं और वो कह रही हैं कि भाजपा को हराने के लिए विपक्ष को एकजुट होना पड़ेगा.
कई राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि ममता ऐसा इसलिए कर रही हैं ताकि ग़ैर भाजपा के दल उन्हें विपक्ष का सर्वमान्य चेहरा मान लें और उनके नेतृत्व में सभी विपक्षी दल एकजुट हो जाएँ.
एनसीपी के नेता शरद पवार ने ममता बनर्जी के साथ अपनी मुलाक़ात के बाद ये ज़रूर माना कि 'भाजपा को हराने के लिए विपक्ष की एकता ज़रूरी है" मगर उन्होंने ये नहीं कहा कि ये एकता कांग्रेस को अलग रख कर बनाई जा सकती है या नहीं.
महाराष्ट्र में एनसीपी, शिव सेना और कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार है.
वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मानते हैं कि ममता जो कर रही हैं वो कुछ अलग नहीं है क्योंकि इतिहास में ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं जब किसी क्षेत्रीय दल ने अपने राज्य में बड़ी जीत हासिल की और फिर उन्हें लगने लगा कि उसकी राजनीति या उसके समर्थन के आधार राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रासंगिक हो जाएगा.
वो कहते हैं कि जब आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस और भाजपा का सफ़ाया कर दिया था, तो पार्टी में इतना उत्साह कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ वाराणसी की लोक सभा सीट से चुनाव भी लड़ लिया.
फिर आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अपने अपने पैर पसारे और उसे इतनी कामयाबी तो मिली कि वो वहां का मुख्य विपक्षी दल बन कर सामने आया. इसके अलावा आम आमी पार्टी गोवा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी अपना राजनीतिक भविष्य तलाश कर रही है.
कुछ इसी अंदाज़ में पश्चिम बंगाल के बाद तृणमूल कांग्रेस ने सबसे पहले पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में अपने पाँव पसारे और मेघालय में तो पूरे के पूरे कांग्रेस विधायक दल के विलय के बाद अब वो वहां का प्रमुख विपक्षी दल बन गया है. उसी तरह गोवा में भी तृणमूल कांग्रेस ने अपनी मौजूदगी दर्ज करने के लिए कई नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करवाया.
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि क्षेत्रीय नेताओं में एक बार तो ये दौर आता ही है जब उन्हें लगने लगता है कि वो 'पीएम मटेरियल' यानी प्रधानमंत्री बनने का माद्दा रखते हैं.
ये दौर, ज़ाहिर है, गुजरात में लगातार जीत के बात नरेंद्र मोदी के सामने भी आया. लेकिन किदवई कहते हैं, चूँकि मोदी एक राष्ट्रीय दल यानी भारतीय जनता पार्टी के नेता है इसलिए प्रधानमंत्री पद तक का उनका सफ़र आसान रहा.
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि क्षेत्रीय दल के नेता उस कुर्सी तक न पहुँच पाए हों.
मोरारजी देसाई, चौधरी हरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और एच डी देवेगौड़ा भी इसका उदाहरण हैं. लेकिन ये सभी उस समय के राजनीतिक जोड़ घटाव और समीकरणों की वजह से प्रधानमंत्री बन पाए.
वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण का मानना है कि व्यक्तिगत आकांक्षाएँ ग़लत नहीं है क्योंकि जो भी राजनीति में आते हैं वो शीर्ष तक जाने का हर प्रयास करते हैं. मगर वो साथ ही कहते हैं कि भारत जैसे राज्य में किसी क्षेत्रीय दल के लिए वो स्थान हासिल करना मुश्किल काम ज़रूर है.
पहले भी हो चुके हैं प्रयोग
राजनीतिक इतिहासकारों के अनुसार ऐसे प्रयोग पहले भी हो चुके हैं जब एनटी रामा राव ने अविभाजित आंध्र प्रदेश में भारी जीत दर्ज की थी. इस जीत के साथ उनकी राष्ट्रीय नेता बनने की महत्वाकांक्षाएँ इतनी जागीं कि उन्होंने अपनी पार्टी का नाम 'भारत देसम पार्टी' रख लिया.
इतिहासकार कहते हैं कि यही समय था जब एनटीआर दिल्ली के सपने देख रहे थे और पीछे से उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने राजनीतिक तख्तापलट कर दिया और फिर भारी जीत दर्ज कर सत्ता हाथ में ले ली.
रशीद किदवई कहते कि जीत के बाद उसी कतार में नायडू भी आ गए जब अपने 'विकास मॉडल' के साथ वो खुद को देश के संभावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने लगे. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के चक्कर में उनके खुद के राज्य में उनके आधार की ज़मीन खिसकती रही.
यही दौर मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक जीवन में भी आया. वो केंद्रीय मंत्रिमंडल तक भी पहुंचे. मगर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने में वो कामयाब नहीं हो सके. एक बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी ऐसे दौर से गुज़रे हैं.
बिना कांग्रेस वाले जिस विपक्ष की एकजुटता की बात ममता बनर्जी कर रही हैं, पहले इसे लेकर हुए प्रयोग कामयाब नहीं हुए.
इसकी मिसाल मिलती है उस प्रयोग में जो वर्ष 1989 में किया गया था जब राष्ट्रीय मोर्चा या 'नेशनल फ्रंट' का गठन हुआ था.
इस मोर्चे ने दो प्रधानमंत्री दिए. पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह और फिर चंद्रशेखर. संयोग से इस मोर्चे के नेता एन टी रामा राव ही थे जिसमें तेलुगु देसम पार्टी के अलावा डीएमके, असम गण परिषद्, और जनता दल शामिल थे जबकि वाम दलों ने इस मोर्चे को बाहर से समर्थन दिया था.
कांग्रेस के बिना सत्ता तक नहीं पहुंच सका तीसरा मोर्चा
वर्ष 1996 के आम चुनाव आने तक जब 'नेशनल फ्रंट' बिखर गया तो एक बार फिर सभी दल एकसाथ आए और नया मोर्चा बना जिसका नाम 'यूनाइटेड फ्रंट' रखा गया. इस मोर्चे को कांग्रेस ने भी समर्थन दिया था.
शुरू में मोर्चे ने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यंत्री ज्योति बासु से पेशकश की कि वो प्रधानमंत्री बन जाएँ.
मगर ज्योति बासु ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया तो फिर मोर्चा ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के सामने ये प्रस्ताव रखा.
उन्होंने भी मोर्चे की पेशकश को ठुकरा दिया. इतना ही नहीं इस कड़ी में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, एम करूणानिधि और जीके मूपनार के नाम भी शामिल थे जिनके इनकार के बाद एच डी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाया गया. लेकिन कांग्रेस ने जब मोर्चे से अपना समर्थन वापस लिया तो देवेगौड़ा को हटना पड़ा और उनकी जगह इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया गया.
राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि इतिहास बताता है कि विपक्षी दलों का कोई भी तीसरा मोर्चा बने, वो सत्ता तक बिना कांग्रेस का समर्थन लिए नहीं पहुँच सकता.
उनका कहना था कि इसकी मुख्य वजह ये है कि लोक सभा में बहुमत के लिए 272 के आँकड़े तक पहुंचना होगा.
वो कहते हैं, "क्षेत्रीय दल अपने प्रदेशों में जितना भी अच्छा प्रदर्शन कर लें, लेकिन अकेले इस आँकड़े तक नहीं पहुँच सकते हैं. इसे लिए उसके बिना विपक्ष की एकता नहीं बन सकती."
राज्य के बाहर प्रभाव नहीं बना पाए क्षेत्रीय दल
किदवई के अनुसार वर्ष 2019 के आम चुनावों में खराब प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस पार्टी का कुल मत प्रतिशत 19.5 था जबकि लोक सभा की 50 प्रतिशत ऐसी सीटें हैं जिनपर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर देखी गई.
वैसे भी कांग्रेस और भाजपा ऐसे दल हैं जिनकी राष्ट्रीय मौजूदगी है और दूसरे पदेशों में या तो इनकी सरकार है या फिर वो प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में हैं. लेकिन जानकार कहते हैं कि कोई क्षेत्रीय दल ऐसा नहीं है जिसका प्रभाव अपने प्रदेश से बाहर प्रभावी हो सकी है. पंजाब में आम आदमी पार्टी को अपवाद कहा जा सकता है.
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने बहुत कोशिश की कि वो निकटवर्ती राज्य बिहार में प्रभाव बनाए लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. उसी तरह राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यूनाइटेड) भी अपने पड़ोसी राज्यों में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाए जिससे कि वो अपने बूते सत्ता में आ पाते.
सत्तर के दशक में भी चौधरी चरण सिंह का प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहा तो चौधरी देवीलाल हरियाणा में मज़बूत राजनेता रहे. लेकिन इन दोनों के दल अपने राज्य के अलावा दूसरे राज्य में प्रभाव नहीं बना सके.
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