संसद का शीतकालीन सत्र: एकजुट मोदी सरकार और बिखरा विपक्ष

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तारीख़: 3 अगस्त. फिर 6 अगस्त.

संसद के मॉनसून सत्र से ठीक पहले विपक्षी दलों की दो बैठक.

इन दोनों बैठकों में विपक्ष के ज़्यादातर दल शामिल हुए और इनमें सबसे प्रमुख नाम रहा तृणमूल कांग्रेस का. ये बावजूद इसके था कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस ने वाम दलों के साथ गठबंधन किया था और तृणमूल कांग्रेस के ख़िलाफ़ आक्रामक प्रचार भी. और इस प्रचार की कमान कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने संभाली थी.

कांग्रेस और वाम दलों के गठबंधन को चुनावों में धूल चटाने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस का विपक्षी दलों की ऐसी बैठकों में शामिल होना जिनका आयोजन कांग्रेस ने तो किया ही, इन बैठकों की अध्यक्षता राहुल गांधी ने की थी.

सिर्फ़ दो महीनों के बाद यानी नवंबर के आख़िरी सप्ताह में बुलाए गए संसद के शीतकालीन सत्र से पहले विपक्ष के दलों के फिर बैठक बुलाई गयी. लेकिन इस बार इस बैठक से तृणमूल कांग्रेस नदारद रही.

बैठक से ठीक पहले के घटनाक्रम को देखा जाए तो मेघालय में कांग्रेस विधायक दल का विलय तृणमूल कांग्रेस में हो गया और ये पार्टी वहां का मुख्य विपक्षी दल बन गई. इससे भी पहले कांग्रेस के कई नेताओं को तृणमूल कांग्रेस ने अपने संगठन में शामिल करने का सिलसिला जारी रखा.

जब सोनिया से नहीं मिलीं ममता

नवंबर में ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिल्ली आईं. लेकिन इस बार उन्होंने कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाक़ात नहीं की जबकि वो न सिर्फ विपक्ष बल्कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से भी मिलीं जिनमें राज्य सभा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी भी शामिल हैं.

पूछे जाने पर ममता बनर्जी ने कहा था, "ज़रूरी नहीं है कि हर बार मैं दिल्ली आऊं और कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मिलने जाऊं."

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ये उनका सिर्फ़ एक बयान मात्र नहीं था, जबकि इस बयान से वो जो संदेश देना चाह रहीं थीं वो स्पष्ट हो गया.

लोक सभा के सांसद और पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी सहित दूसरे वरिष्ठ नेताओं को भी आश्चर्य है कि जो नेता "विपक्ष के सभी दलों की एकता" की बात करती आ रहीं हों, उनका दल संसद के शीतकालीन सत्र से पहले बुलाई गई विपक्षी दलों की बैठक से कैसे नदारद रह सकता है ?

वो भी ऐसे सत्र से पहले जिसमें तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के बिल को सरकार पेश कर रही थी और विपक्ष उसे घेरना चाहता था. विपक्ष चाहता था कि इन बिलों को वापस लेने वाला विधेयक जब लोक सभा के पटल पर रखा जाए तो उसपर बहस भी होनी चाहिए.

सोमवार, यानी 29 नवम्बर को सत्र के शुरू होने से ठीक पहले पत्रकारों से बात करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "सरकार सदन में हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और हर प्रश्न का जवाब देने के लिए भी तैयार है."

सदन में भी दिख रहा है कि सरकार विपक्ष से मुक़ाबले की तैयारी करके आई है. यानी एकजुट है.

लेकिन हुआ क्या? विधेयक लोक सभा के पटल पर 12 बजकर 6 मिनट पर रखा गया और ये 12 बजकर 10 मिनट तक पारित भी हो गया. सदन हंगामे के भेंट चढ़ चुका था और विपक्ष की कोई रणनीति नज़र ही नहीं आई.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्र से ठीक पहले बुलाई गयी विपक्षी दलों की बैठक मे शामिल नहीं होने वाले दलों में सिर्फ़ अकेली तृणमूल कांग्रेस नहीं थी. इस बैठक से कई बड़े और छोटे दलों ने भी खुद को दूर रखा जैसे समाजवादी पार्टी, शिव सेना, आम आदमी पार्टी, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और केरला कांग्रेस.

ये बावजूद इसके है कि जहां महाराष्ट्र में कांग्रेस और शिव सेना के गठबंधन की सरकार चल रही है, वहीं झारखण्ड में भी कांग्रेस सरकार का हिस्सा है.

तो "विपक्ष की एकता" की बात कितनी प्रासंगिक या सच है?

जानकार कहते हैं कि जिन दलों ने मॉनसून सत्र के पहले और शीतकालीन सत्र के पहले होने वाली विपक्षी दलों की बैठक में हिस्सा ही नहीं लिया उनमें पीडीपी, जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस, राजशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), बीजू जनता दल के अलावा असम में बदरुद्दीन अजमल की 'एआईयुडीएफ़' और असदुद्दीन ओवैसी की 'एआईएमआईएम' भी शामिल नहीं हुए.

इससे भी संदेश साफ़ होता है क्योंकि बैठक कांग्रेस की अगुवाई में हो रही थी.

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सर्वमान्य नेता की कमी

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार निर्माल्य मुख़र्जी को लगता कि कांग्रेस पार्टी सबसे पुरानी पार्टी तो है ही और वो अब ख़ुद को प्रमुख विपक्षी दल के रूप में पेश ज़रूर कर रही है, मगर विपक्ष के दूसरे दलों को ये नेतृत्व सर्वमान्य नहीं दिखता.

उनके अनुसार जीत के रथ पर सवार तृणमूल कांग्रेस ने देश भर में अपना प्रभाव बढाने के लिए पाँव ज़रूर पसारने शुरू किये हैं. लेकिन वो मानते हैं कि ऐसे प्रयास अपनी पहली जीत के बाद आम आदमी पार्टी ने भी किए थे. यहाँ तक कि अरविंद केजरीवाल ने तो नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ वाराणसी लोक सभा सीट से चुनाव भी लड़ा था.

ममता बनर्जी भी कहती रहीं हैं कि वो भी वाराणसी की लोक सभा सीट से चुनाव लड़ने में सक्षम हैं.

हाल ही में बातचीत के क्रम में विश्लषण करते हुए वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त का मानना था कि बेशक कांग्रेस पार्टी अंदरूनी कलह के दौर से गुज़र रही हो और उसके नेतृत्व को कमज़ोर माना जा रहा हो, लेकिन है वो राष्ट्रीय दल ही.

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राष्ट्रीय दल बड़ा या जीतने वाला?

उनका ये भी कहना है कि राजनीति में अक्सर ऐसा होता है कि अपने क्षेत्र में ज़ोरदार जीत दर्ज कराने के बाद क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षा बढ़ जाती है और उन्हें लगने लगता है कि देश की राजनीति में उनका क़द भी बहुद बढ़ा है. उन्हें ये भी लगता है कि वो राजनीतिक जोड़ घटाव में निर्णायक भूमिका भी निभा सकते हैं.

इसी वजह से समय समय पर क्षेत्रीय दलों के गठबंधन भी होते रहे और उन्होंने देश में सरकार बनाने में सफलता भी हासिल की. लेकिन जो प्रभाव उनका अपने क्षेत्रों में रहा, वो प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति में नहीं हो सका.

इसलिए गुप्त कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस माने या ना माने या फिर महत्वाकांक्षी हो जाए, मुख्य विपक्ष के रूप में कांग्रेस की जगह लेना थोड़ी टेढ़ी खीर ज़रूर साबित होगा.

राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी हाल ही में कहा, "अगले कई सालों तक भारतीय जनता पार्टी का इसलिए शासन रह सकता है क्योंकि विपक्ष आपस में हमेशा बंटा रहेगा".

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